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Relaxing Coloring Book: तनाव दूर करने के लिए महिलाएं ले रहीं रंगों का सहारा, कर रही हैं ये काम

Thu, 21 Nov 2024 04:01 PM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

एडल्ट कलरिंग बुक्स ने पहली बार 2010 के दशक की शुरुआत में लोगों का ध्यान आकर्षित किया। शुरुआत में इनको बचपन की याद दिलाने वाली किताबें माना गया, जो बड़ों को जीवन की मुश्किलों से निटने में मदद करती थीं।
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कलरिंग बुक का मानसिक स्वास्थ्य पर असर - फोटो : Pexel
अंशु सिंह

कहते हैं कि रंग हमारे विचारों और भावनाओं को भी प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। तभी तो मानसिक सेहत और तनाव को दूर करने के लिए अब महिलाएं भी रंगों का सहारा ले रही हैं। इसमें उनकी साथी बन रही हैं- कलरिंग बुक्स। बचपन में अमूमन हम सभी को रंगों से गहरा लगाव था। ये रंग हमारे बाल मन को अभिव्यक्त करने का एक जरिया होते थे। वो एक ऐसा समय होता था, जब हमें पेंटिंग बनाने और ड्रॉइंग बुक में रंग भरने में बहुत आनंद आता था। मगर एक समय के बाद बहुत कम लोग होते हैं, जो रंगों से जुड़े रहते हैं, वह भी केवल शौक या व्यवसाय के रूप में। हालांकि इन दिनों लोग फिर से रंगों के साथ रिश्ता बनाने लगे हैं, जिसका सबसे बड़ा सुबूत है एडल्ट कलरिंग बुक्स का लोकप्रिय होना।

आज के समय में जैसे-जैसे जीवन की आपाधापी में जिम्मेदारियां बढ़ती जा रही हैं, बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए लोग इसमें रुचि लेने लगे हैं। असल में, किताबों में रंग भरना न केवल मजेदार होता है, बल्कि बच्चों और बड़ों, दोनों के लिए किसी थेरेपी से कम नहीं है, जो उन्हें तनावमुक्त करता है। सुरभि शर्मा को भी बचपन से कलरिंग करने में बहुत खुशी और शांति मिलती थी। तितली, फूल या इंद्रधनुष को अपनी पसंद के अनुसार चमकीला और सुंदर बनाने में बहुत मजा आता था। वह जब भी रंग भरती तो हर चीज के बारे में सोचना बंद कर देती, उसकी सारी चिंताएं दूर हो जाती और उसका समूचा ध्यान सिर्फ रंग भरने पर रहता था।
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कलरिंग बुक का मानसिक स्वास्थ्य पर असर - फोटो : Pexel
कलरिंग बुक्स का रोचक सफर

एडल्ट कलरिंग बुक्स ने पहली बार 2010 के दशक की शुरुआत में लोगों का ध्यान आकर्षित किया। शुरुआत में इनको बचपन की याद दिलाने वाली किताबें माना गया, जो बड़ों को जीवन की मुश्किलों से निटने में मदद करती थीं। फिर विशेषज्ञों ने इनकी चिकित्सकीय क्षमता को पहचाना और मनोवैज्ञानिकों तथा चिकित्सकों ने रंग भरने को कला चिकित्सा के रूप में प्रचारित करना शुरू किया, जो तनाव को कम करने और मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद साबित हुआ। नतीजतन, एडल्ट कलरिंग बुक्स में महत्वपूर्ण बदलाव हुए। अब इनकी थीम और फॉर्मेट में बदलते समय की झलक दिखती है। डिजाइन ज्यादा विविधतापूर्ण होने लगे हैं, जिनमें अमूर्त पैटर्न से लेकर यथार्थवादी दृश्य तक शामिल हैं, जो रुचियों की एक विस्तृत शृंखला को पूरा करते हैं।

बच्चों के लिए कलरिंग बुक्स के सरल डिजाइन्स और पैटर्न्स की तुलना में एडल्ट कलरिंग बुक्स में प्रकृति एवं वन्यजीव से प्रेरित डिजाइन्स (फूल, पशुओं के चित्र), आर्ट वर्क (सांस्कृतिक एवं आर्टिस्टिक मूवमेंट्स), माइंडफुलनेस एवं मेडिटेशन से प्रेरित डिजाइन्स (मंडाला, जेन), लैंडस्केप्स, मैजिक गार्डन, शहर, समुद्री जीवन से जुड़े चित्र आदि होते हैं। इनको रंगने के लिए जब आप खास रंगों के चयन एवं बारीकियों पर ध्यान देती हैं तो चिंताएं और बेचैनी दूर होने लगती है। तस्वीरों या कलर आर्ट में नई जान आने से अंतर्मन को भी खुशी एवं सुकून का अनुभव होता है।
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रंग भरने से एकाग्रता और नींद पर असर - फोटो : Freepik
अच्छी नींद और एकाग्रता

बेस्ट सेलिंग लेखिका और कई सम्मानों से नवाजी जा चुकीं तनीषा मैकीन घूमने की शौकीन हैं। दुनिया भर में घूमते हुए अपने गाइड, ब्लॉग एवं शो के जरिये लोगों के साथ अपने अनुभव साझा करती रहती हैं। तनीषा ने बच्चों की कलरिंग बुक के अलावा बड़ों के लिए भी कलरिंग बुक्स की एक पूरी शृंखला तैयार की है, जिसमें यात्रा और आर्ट थेरेपी के आनंद को खूबसूरती से बयां किया गया है।

ट्रैवल हील्स : कलर योर वे टू वेलनेस’ में तनीषा ने खूबसूरत इमेजरी के साथ प्रेरक यात्रा उद्धरण दिए हैं, जो आपके घूमने-फिरने की इच्छा और आराम को जगाते हैं। इनकी दूसरी एडल्ट कलरिंग बुक ‘वांडरलस्ट सिस्टर्स’ एक सशक्त कलरिंग बुक है, जो दुनिया भर में अश्वेत महिलाओं के रोमांच का जश्न मनाती है। तनीषा के अनुसार, रंग भरने के फायदों और इनके मानसिक स्वास्थ्य पर होने वाले सकारात्मक प्रभावों को लेकर अनगिनत वैज्ञानिक शोध हुए हैं, जो दावा करते हैं कि इससे शरीर रिलैक्स होता है, नींद अच्छी आती है, अवसाद, तनाव एवं बेचैनी जैसी समस्याएं दूर होती हैं।

सच भी है कि कलरिंग के समय दिमाग का पूरा फोकस सिर्फ रंग भरने पर होता है। इस एकाग्रता के कारण दूसरी चिंताएं, परेशानियां स्वत: समाप्त हो जाती हैं। लोगों के अनुभव बताते हैं कि रंग भरने के दौरान वे भूतकाल और भविष्य की फिक्र को भूल जाते हैं तथा उनका समूचा ध्यान सिर्फ वर्तमान पर केंद्रित रहता है।

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मंडाला आर्ट का मानसिक स्वास्थ्य पर असर - फोटो : instagram
मंडला आर्ट से संतुलन

इन दिनों आम जीवन में जिस तरह से तनाव का स्तर बढ़ता जा रहा है, महिलाएं अलग-अलग ध्यान प्रक्रियाओं को सीखने पर जोर दे रही हैं। अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय चुराकर मेडिटेशन एवं माइंडफुलनेस का अभ्यास कर रही हैं, लेकिन एक शिकायत फिर भी बनी रहती है कि ‘ध्यान नहीं लगता’ या ‘मन को एकाग्र नहीं कर पातीं’। ऐसे में महिलाओं के लिए किताबों में रंग भरना एक अच्छा विकल्प हो सकता है, क्योंकि यह मन को शांत करता है। इसमें मंडला या मंडाला आर्ट काफी लोकप्रिय हो चली है।

नई पीढ़ी के बच्चे भी इसमें खासी दिलचस्पी ले रहे हैं। इस कला में निपुण निहारिका जैन का कहना है कि मंडला चित्र बनाना न सिर्फ एक कलात्मक गतिविधि है, बल्कि मेडिटेशन करने जैसा है। आमतौर पर मंडला एक बिंदु के इर्द-गिर्द केंद्रित होते हैं। गोलाकार होने के कारण उनमें एक संतुलन रहता है। जब कोई मंडला बनाता है, तो उसके अंदर यह विचार विकसित होता है कि उसके आस-पास एवं जीवन में भी सब कुछ संतुलन में है। इस दौरान मंडला बनाना वाला वर्तमान में रहता है और उसका आनंद लेता है।

इतना ही नहीं, मंडला बनाने के क्रम में आपका पूरा ध्यान समरूपता बनाए रखने पर होता है। आप पैटर्न में डूब जाती हैं और ध्यान केंद्रित करके रचना करती हैं। आपके अंदर धैर्य का विकास होता है। दिमाग अत्यधिक समन्वित रहता है और आप संतुष्टि का अनुभव करती हैं।
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मानसिक स्वास्थ्य में सुधार - फोटो : istock
मानसिक सेहत में सुधार

बचपन से ही रंगों के साथ खेलने वाली पेंटर निशात का मानना है कि रंगों के बिना जीवन वीरान है। प्रकृति में जितने भी रंग घुले-मिले हैं, वे सभी हमारे ऊपर कुछ न कुछ सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। हरा रंग विशेषकर नई ताकत का अहसास कराता है और हमारी सोच को सकारात्मक बनाता है। यह आशावाद, नई शुरुआत, स्वास्थ्य एवं ताजगी का भी प्रतीक है। जब हम कोई चित्र बनाते या उसमें रंग भरते हैं तो उस दौरान खुद के संग समय बिताने का अवसर मिलता है। निशात कलरिंग बुक्स की बढ़ती लोकप्रियता को मानसिक सेहत के प्रति आ रही जागरूकता से जोड़कर देखती हैं।

कहती हैं, “जब एक महिला किताबों में दर्ज रेखा चित्रों और आकृतियों में रंग भरती है तो मन के अंदर की तमाम रुकावटें खत्म हो जाती हैं और वे एकाग्रता के साथ रचनात्मक कार्य कर पाती हैं। यह उन सभी इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों से दूरी बनाने में भी मदद करता है, जो आज मन-मस्तिष्क के रोगों का एक प्रमुख कारक बने हुए हैं। दरअसल, हम जब आकृतियों के लिए रंगों का चुनाव करते हैं और देखते हैं कि वे कैसे काम करते हैं तो सीखने का एक अलग अनुभव होता है। सबसे अच्छी बात यह है कि इसके लिए महंगी चीजें, पेंट आदि खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती।
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दीवार की पेंटिंग - फोटो : freepik
रंग तैयार करते हैं मन का गीत

चित्रकार निधि भाटिया बताती हैं, रंग एवं रोशनी का मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव रहा है। इनकी वजह से ही मैं पेंट करती हूं। कई बार सीधे ही हाथों से कैनवास पर पेंट करती हूं, जिससे बहुत संतुष्टि मिलती है। मुझे अपने आस-पास बिखरे कई रंगों को कैनवास पर उकेरना अच्छा लगता है। एक पेंटर होने के नाते मैं बता सकती हूं कि जब मूड अच्छा होता है तो कैनवास पर रंग भी वैसे ही बिखरते हैं, जो मन को शीतलता और सुकून देते हों। रंग वो माध्यम है, जिससे हर प्रकार के भाव को अभिव्यक्त किया जा सकता है।

हम अपने कमरों को हल्के हरे, नीले या सफेद रंग में इसलिए पेंट कराते हैं, ताकि मन शांत रहे। असल में, रंगों में वह ताकत है, जिससे कविता रची जा सकती है। जब अनेक रंग आपस में मिलते हैं, तो एक गीत तैयार होता है। वे किसी मधुर राग की भांति होते हैं। इस प्रकार जब कोई पेंटिंग तैयार होती है तो उसमें जीवन होता है, जो अपनी भाषा में विचार को अभिव्यक्त कर पाती है।

खुशी और संतुष्टि के रंग

गंगाराम अस्पताल, दिल्ली की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट आरती आनंद कहती हैं, अपने भावों को अभिव्यक्त करने के लिए खास रंगों का उपयोग किया जाता है, यानी रंगों के जरिये हम अपनी भावनाएं प्रकट कर सकते हैं। किसी भी चीज में रंग भरते या आकृति बनाते समय हम जजमेंटल नहीं होते, किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखते, कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती, सिर्फ अपनी खुशी एवं संतुष्टि के लिए रंग भरते हैं। इससे मन और मस्तिष्क रिलैक्स होता है।

अमूमन कलरिंग को शौक के तौर पर देखा जाता है और शौक वह होता है, जिसमें हम खो जाते हैं। यह नहीं सोचते कि जीत हो रही है या हार, सिर्फ वर्तमान क्षण का आनंद लेते हैं। इससे तनाव दूर होता है। इसके अलावा कलर करते समय दिमाग के जिस हिस्से का उपयोग होता है, उससे फोकस और एकाग्रता, दोनों बढ़ती हैं। आप व्यर्थ बातों से खुद को डिस्कनेक्ट कर पाती हैं।
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