वटवृक्ष कई दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण है, सबसे पहले यह वृक्ष अपनी विशालता के लिए प्रसिद्ध है। दार्शनिक दृष्टि से देखा जाए तो यह वृक्ष दीर्घायु का प्रतीक है, क्योंकि इसी वृक्ष के नीचे राजकुमार सिद्धार्थ ने बुद्धत्व को प्राप्त किया और भगवान बुद्ध कहलाए। बोध ज्ञान को प्राप्त करने के कारण इस अक्षय वटवृक्ष को बोधिवृक्ष भी कहते हैं, जो गया तीर्थ में स्थित है। इसी तरह वाराणसी में भी ऐसे वटवृक्ष हैं जिन्हें अक्षयवट मानकर पूजा जाता है।वटवृक्ष वातावरण को शीतलता व शुद्धता प्रदान करता है और आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह अत्यंत लाभकारी है। अत: वट सावित्री व्रत के रूप में वटवृक्ष की पूजा का यह विधान भारतीय संस्कृति की गौरव-गरिमा का एक प्रतीक है और इसके द्वारा वृक्षों के औषधीय महत्व व उनके देवस्वरुप का भी ज्ञान होता है।