दो आख़िरी ख़्वाहिशें
मेरी माँ अपने अंतिम दिनों में कहा करती थी, "बेटा मत पड़ इन चक्करों में, जवानी के साथ सब चला जायेगा। घर महिला से ही चलता है। तू सबसे छोटा है। मेरे मरने के बाद तुझे कोई नहीं पूछेगा।" अब उसकी बात सही लगने लगी है। हालांकि उस वक़्त मैंने उन्हें कहा था, "माँ ये दिल की लगी है, नहीं छूट रही..."
माँ के जाने के बाद घर में किसी ने मुझसे सीधे मुँह बात नहीं की। वो ये कहकर मुझे डराते ज़रूर हैं कि जैसे-जैसे बुढ़ापा आयेगा, जीवन मुश्किल होता जायेगा। मैं प्यार करता हूँ निशा से, सच्चा प्यार, मैं इसके साथ ही पूरी लाइफ़ बिता दूंगा। मुझे इससे मतलब नहीं है कि ये लड़का है, लड़की है या किन्नर। मेरा इससे दिल मिलता है। बस यही है।