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Relationship Tips: बच्चा आने से कपल के जीवन में आती हैं ये समस्याएं, इन बदलावों से संभाल सकते हैं रिश्ता

Mon, 04 Nov 2024 03:53 PM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

घर में बच्चा आने के बाद आपकी पूरी जीवन-शैली बदल जाती है। ऐसे में कई बार आपके रिश्ते में दूरी आने लगती है। जानकार कहते हैं कि ऐसी स्थिति में आपको कुछ बदलाव करने जरूरी होते हैं।
 
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बच्चे के जन्म के बाद पति-पत्नी के बीच कई समस्याएं आने लगती है - फोटो : Adobe
लक्ष्मी कुमारी

तरुणा बालकनी में आराम से बैठकर चाय पी रही थी और सोच रही थी कि साल भर होने को है, नींद हराम हो चुकी है। नींद ही नहीं, एक तरह से जिंदगी ही बर्बाद हो चुकी है। दफ्तर में दिन भर रहने के बाद रात में बेटी रो-रोकर तंग कर देती है। कब उठना पड़े, कब रात भर जागना पड़े, कुछ पता नहीं। ऑफिस में भी नींद आती है, कोई टारगेट समय से पूरा नहीं कर पाती और अब तो बॉस ने भी मुझसे उम्मीद रखना छोड़ दिया है। पति फिर भी कभी-कभार जागकर थोड़ी-बहुत मदद करा देते हैं और फिर सो जाते हैं। कितना समय हो गया ढंग से बातचीत भी नहीं हुई उनसे। जब से बेटी का जन्म हुआ है, तब से कभी उनके पास समय नहीं तो कभी मेरे पास समय नहीं होता। सोचा भी नहीं था, घर में बच्चा आने के बाद हम दोनों के रिश्ते इतने बदल जाएंगे कि हम एक-दूसरे से ही दूर हो जाएंगे।

घर में बच्चे का जन्म पति-पत्नी के लिए एक नए और रोमांचकारी सफर की शुरुआत होता है और रिश्ते के लिहाज से एक महत्वपूर्ण बदलाव का दौर। बच्चा अपने साथ बहुत-सी खुशियां लाता है, लेकिन साथ में भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक बदलावों की एक शृंखला भी, जो आगे चलकर कई पति-पत्नी के रिश्ते को कमजोर कर देती है। इस दौरान दोनों अक्सर पहचान और जिम्मेदारी में बदलाव का अनुभव करते हैं, जो उनके रिश्ते में झलकने लगता है।
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दोनों को बदलावों और जिम्मेदारियों के लिए तैयार रहना चाहिए - फोटो : Freepik.com
बदलाव और जिम्मेदारियां

रात में जागना, खाने का शेड्यूल और नई दिनचर्या के बदल जाने से जिंदगी की गति बदल जाती है। इसके अलावा पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दबाव भी सामने आने लगते हैं, जो कार्यों और कर्तव्यों को प्रभावित करते हैं। इससे भावनात्मक अंतरंगता भंग होने लगती है, क्योंकि शारीरिक-मानसिक थकावट और तनाव आम हो जाते हैं, जो आपस में बातचीत और संबंध, दोनों को प्रभावित करते हैं।

वहीं बच्चा आने के बाद परवरिश की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को संतुलित करना पति-पत्नी के लिए नए जीवन की गतिशीलता को समायोजित करने का एक महत्वपूर्ण पहलू है। साथी होने से लेकर माता-पिता बनने तक के बदलाव में दोनों को सही संतुलन की आवश्यकता होती है, जो कि चुनौतीपूर्ण हो सकती है।

इसलिए बातचीत करना, जिम्मेदारियों को बांटना और एक साझी दिनचर्या स्थापित करना बेहद महत्वपूर्ण है। कहने का मतलब यह कि जैसे-जैसे कार्य बढ़ते हैं, दोनों पार्टनर्स को एक-दूसरे की शक्ति और योगदान को पहचानते हुए सहयोग करना चाहिए। इससे असमान जिम्मेदारियों से उत्पन्न होने वाली नाराजगी की भावना कम हो जाती है और आपसी प्रेम बना रहता है।
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बच्चा उनके रिश्ते पर असर डालता है, जिसे सकारात्मक बनाने के लिए कुछ प्रयास जरूरी हैं - फोटो : Adobe
रिश्ते पर असर

परिवार में नवजात शिशु का आगमन दोनों के लिए गहन भावनात्मक बदलाव भी लेकर आता है, जो कई मामलों में तनाव और चिंता पैदा करता है। ऐसे में कई माता-पिता के लिए बच्चे का स्वागत करने की खुशी जिम्मेदारी के भारी बोझ के तले दब जाती है, जो अक्सर पति-पत्नी के बीच बहस या अलगाव की भावनाओं के रूप में प्रकट होती है।

इसके अलावा पति-पत्नी का रिश्ते को संवारने से ध्यान हटकर मुख्य रूप से बच्चे की जरूरतों को पूरा करने पर चला जाता है। इससे व्यक्तिगत जुड़ाव के लिए बहुत कम समय बचता है। वहीं इस समय अगर सावधानी से काम न लिया जाए तो उपेक्षा या नाराजगी की भावनाएं रिश्ते को खराब कर सकती हैं।

जब पति-पत्नी, माता-पिता के रूप में अपनी बदलती भूमिकाओं को निभाते हैं और पार्टनर के रूप में अपनी पहचान बनाए रखने की कोशिश करते हैं तो भावनात्मक संबंध बहुत जरूरी हो जाते हैं। इसके लिए खुला संचार जरूरी है। ईमानदारी और सहानुभूति के साथ भावनाओं को साझा करने से गलतफहमियों को कम करने में मदद मिलती है। इसलिए जब भी संभव हो, अंतरंगता के पल तलाशने चाहिए, भले ही यह सिर्फ एक साधारण बातचीत या साझा कार्य ही क्यों न हो, जो बंधन को मजबूत कर सकते हैं।

धैर्य और समझ के साथ इन बदलावों को अपनाने से बच्चे के जन्म के बाद रिश्ते के लिए एक नई और मजबूत नींव स्थापित करने में मदद मिल सकती है। इसके साथ ही आपको हमेशा एक ऐसा माहौल बनाने पर ध्यान देना चाहिए, जिसमें प्रत्येक को सुना और समझा जाए। इसके लिए आप दोनों को ही साझा अनुभवों को संजोने का प्रयास करना चाहिए।

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पर्सनल स्पेस की बात - फोटो : istock
पर्सनल स्पेस की बात

बच्चा आने के बाद पति-पत्नी के रिश्ते का परिदृश्य अक्सर महत्वपूर्ण परिवर्तनों से गुजरता है, खासकर शारीरिक अंतरंगता के मामले में। शारीरिक स्पर्श जो कभी रोमांस और इच्छा से जुड़ा होता था, नई जिम्मेदारियों और नवजात शिशु की देखभाल की मांगों के साथ समन्वय बनाने में उड़ जाता है। नींद की कमी, हार्मोन का उतार-चढ़ाव और खिलाने तथा डायपर बदलने का कभी न खत्म होने वाला चक्र थकावट का कारण बन जाता है, जिससे अंतरंगता साझा आनंद के बजाय एक कठिन काम और जिम्मेदारियों का बोझ महसूस होती है।

स्नेह के लिए छोटे-छोटे पल ढूंढना और दोनों भागीदारों के लिए अंतरंगता का क्या अर्थ है, इसे फिर से परिभाषित करना निकटता की भावना को बहाल कर सकता है।
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बाहरी मदद में हिचकिचाहट कैसी - फोटो : istock
बाहरी मदद में हिचकिचाहट कैसी

अगर आपस में तालमेल गड़बड़ा गया है। एक–दूसरे को समझने का वक्त नहीं या जरूरत महसूस नहीं करते तो बात बिगड़ जाएगी। इसलिए जरूरत पड़ने पर बाहरी सहायता लेने में हिचकिचाएं नहीं। यह बाहरी सहायता न केवल व्यावहारिक सहायता होगी, बल्कि विभिन्न नजरियों से भी परिचित कराएगी। आप दोनों टीमवर्क पर जोर देकर और शुरू की गई आपसी यात्रा को पहचान कर इस परिवर्तनकारी सफर का आनंद उठा सकते हैं। ऐसा करके आप माता-पिता बनने की चुनौतियों और इन खुशियों के बीच एक मजबूत तथा खूबसूरत बंधन को बनाए रख सकते हैं।
 
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धैर्य और प्रेम का व्यवहार - फोटो : istock
धैर्य और प्रेम का व्यवहार

स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अनिका श्रीवास्तव कहती हैं, प्रसव के बाद का समय, जिसे प्रसवोत्तर अवधि कहा जाता है, माता-पिता, दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। इस दौरान कई महिलाएं प्रसवोत्तर अवसाद से जूझती हैं, जिसका एक कारण हार्मोन के स्तर में गिरावट, तो एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन और थायराइड होता है।

यह अवसाद, चिंता और अत्यधिक थकान का कारण बनता है। इसके लक्षणों में थकान, चिड़चिड़ापन, नींद की समस्या और आत्मग्लानि शामिल हो सकती है। इस स्थिति में परिवार का सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण होता है तो पति को पत्नी की भावनात्मक स्थिति को समझने और उसे सहारा देने की जरूरत होती है। इसके अलावा घर के कामकाज में हाथ बंटाना, बच्चे की देखभाल में मदद करना और उसे उचित पोषण देने में मदद करना उसे मानसिक एवं शारीरिक रूप से सहयोग देता है।
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आज का परिदृश्य अलग है - फोटो : adobe
आज का परिदृश्य अलग है

समाजशास्त्री डॉ. सृष्टि कहती हैं, वैसे तो आज के परिदृश्य में देखा जाता है कि पुरुष भी घर के कामों में योगदान देते हैं और पत्नी की मदद करते हैं। यह सकारात्मक बदलाव शहरी दंपत्तियों में अधिक दिखाई देता है। ऐसे में जीवन-साथी का सहयोग न केवल मनोवैज्ञानिक कल्याण को बढ़ाता है, बल्कि एक महिला के सामाजिक कल्याण में भी योगदान देता है, जिससे एक स्वस्थ परिवार बनता है। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में गर्भावस्था के तुरंत बाद महिलाओं पर काम का बोझ बढ़ जाता है, जिससे उनका समग्र स्वास्थ्य प्रभावित होता है और बच्चे का पालन-पोषण भी सही तरह से नहीं हो पाता है। कई अध्ययन इस बात की पुष्टि करते हैं कि ऐसी स्थिति में  पति-पत्नी के बीच एक अच्छा बंधन उनके रिश्ते को संवार सकता है।
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