लक्ष्मी कुमारी
तरुणा बालकनी में आराम से बैठकर चाय पी रही थी और सोच रही थी कि साल भर होने को है, नींद हराम हो चुकी है। नींद ही नहीं, एक तरह से जिंदगी ही बर्बाद हो चुकी है। दफ्तर में दिन भर रहने के बाद रात में बेटी रो-रोकर तंग कर देती है। कब उठना पड़े, कब रात भर जागना पड़े, कुछ पता नहीं। ऑफिस में भी नींद आती है, कोई टारगेट समय से पूरा नहीं कर पाती और अब तो बॉस ने भी मुझसे उम्मीद रखना छोड़ दिया है। पति फिर भी कभी-कभार जागकर थोड़ी-बहुत मदद करा देते हैं और फिर सो जाते हैं। कितना समय हो गया ढंग से बातचीत भी नहीं हुई उनसे। जब से बेटी का जन्म हुआ है, तब से कभी उनके पास समय नहीं तो कभी मेरे पास समय नहीं होता। सोचा भी नहीं था, घर में बच्चा आने के बाद हम दोनों के रिश्ते इतने बदल जाएंगे कि हम एक-दूसरे से ही दूर हो जाएंगे।
घर में बच्चे का जन्म पति-पत्नी के लिए एक नए और रोमांचकारी सफर की शुरुआत होता है और रिश्ते के लिहाज से एक महत्वपूर्ण बदलाव का दौर। बच्चा अपने साथ बहुत-सी खुशियां लाता है, लेकिन साथ में भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक बदलावों की एक शृंखला भी, जो आगे चलकर कई पति-पत्नी के रिश्ते को कमजोर कर देती है। इस दौरान दोनों अक्सर पहचान और जिम्मेदारी में बदलाव का अनुभव करते हैं, जो उनके रिश्ते में झलकने लगता है।