प्रतीकात्मक तस्वीर
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विवाहेत्तर संबंधों की बात
प्राचीन भारत में स्त्री या पुरुष का किसी अन्य स्त्री या पुरुष से विवाहेत्तर संबंध बनाना भी अपराध नहीं होता था और इसको सामाजिक मान्यता मिली हुई थी। राधा-कृष्ण के प्रेम का वर्णन इस बात की मिसाल है कि समाज में बहुत खुलापन था, और प्रेम को शर्म से नहीं जोड़ा जाता था।
सूरदास के शब्दों में -
"अपनी भुजा स्याम भुज ऊपरि स्याम भुजा अपने उर धरिया।
यों लपटाइ रहे उर-उर ज्यों, मरकत मणि कंचन में जरिया"।
विद्यापति ने भी राधा के सौन्दर्य का वर्णन करते समय अपना हृदय उड़ेल दिया है, वे राधा को एक सामान्य नायिका की तरह चित्रित करते हैं, हालांकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि राधा-कृष्ण पूज्य हैं, आराध्य हैं। उनके काव्य में राधा कहती हैं-
"हंसि हंसि पहु आलिंगन देल
मनमथ अंकुर कुसुमित भेल
जब निवि बन्ध खसाओल कान
तोहर सपथ हम किछु जदि जान।"
कृष्ण के साथ कहीं भी उनकी पत्नियों की तस्वीर या मूर्ति नहीं मिलती। हर जगह कृष्ण के साथ राधा ही नजर आती हैं, यह समाज में प्रेम की स्वीकृति का उदाहरण है।