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प्राचीन भारत में सेक्स को लेकर खुले विचार रखते थे लोग, कामसूत्र में कही गई हैं ये बातें

Sat, 01 Feb 2020 09:30 PM IST
नवनीत राठौर लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
'कामसूत्र' के रचयिता वात्स्यायन से कई सौ साल पहले यूनानी साहित्य में काम की अवधारणा पर व्यापक चर्चा हुई थी। प्लेटो का मानना था कि 'काम किसी पर अधिकार जमाने की आकांक्षा है'। 'सिम्पोजियम' में यूनानी नाटककार अरिस्टोफैंस ने भी एक ऐसे समय का जिक्र किया था जब मानव अपने आप में परिपूर्ण हुआ करता था और उसे किसी दूसरे की जरूरत नहीं पड़ती थी।

नतीजा ये हुआ कि वो बहुत शक्तिशाली हो गया और देवताओं तक को चुनौती देने लगा। लेकिन देवताओं के राजा जायस ने इससे निपटने का एक तरीका निकाला और मानव को पुरुष और स्त्री दो भागों में बांट दिया। जिसका नतीजा ये हुआ कि मानव सीधा खड़ा होने लगा, दो पैरों पर चलने लगा और ऐसा लगने लगा कि उसके सामने के अंग विभाजित हो गए।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
बकौल प्लेटो हमारी अपूर्णता ने हमें दूसरे भाग की चाहत के लिए मजबूर किया। प्लेटो सेक्स की पूर्णता की मांग के तौर पर व्याख्या करते हैं। हम हर उस चीज से प्यार करते हैं जो हमारी अपनी नहीं है। लेकिन फिर एक ऐसा समय भी आया जब सेक्स के बारे में कहा जाने लगा कि ये बेकार की चीज है। सेक्स गंदा है और इसे करना पाप है।

325 ईस्वी में कैथलिक चर्च ने जब अपने कायदे कानून बनाए तो उसमें साफ कहा गया कि 'शरीर एक खराब चीज है। शारीरिक सुख फिजूल है और इसको पाने की इच्छा रखना पाप है।' उनका मानना था कि सेक्स का एकमात्र उद्देश्य सिर्फ संतान को जन्म देना है। लेकिन लगभग उसी समय वात्स्यायन गंगा के तट पर बैठ कर कामसूत्र लिख रहे थे और बता रहे थे कि वास्तव में यौनिक आनंद बहुत अच्छी चीज है और इसे किस तरह और बढ़ाया जा सकता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
सेक्स में खुलापन
प्राचीन भारतीय वास्तुकला में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो बताते हैं कि प्राचीन समय में सेक्स के बारे में लोगों की सोच कितनी खुली हुई थी। ओडीशा के कोणार्क के सूर्य मंदिर को ही लें जहाँ तराशी हुई नग्न मूर्तियाँ देखने को मिलती हैं। इसी तरह बौद्ध धर्म से जुड़ी अजंता और एलोरा की गुफाओं में भी युवतियों की नग्न मूर्तियां दिखाई देती हैं। अजंता के गुफा चित्र ईसा से दो सदी पहले बनाए गए थे। वहीं एलोरा की कलाकृतियां पांचवीं से दसवीं सदी के बीच की बताई जाती हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
भारत में सेक्स का खुला चित्रण मध्य प्रदेश के खजुराहो के मंदिरों में भी देखने को मिलता है। ये मंदिर करीब एक हजार साल पुराने हैं। इन्हें चंदेल राजाओं ने 950 से 1050 ईस्वी के बीच बनवाया था। उस दौरान कुल 85 मंदिर बनाए गए थे। लेकिन आज इनमें से सिर्फ 22 ही बचे हैं। यूनेस्को ने इन्हें 1986 में विश्व की धरोहर घोषित किया था। इन मंदिरों में यौन संबंधों का हर रूप देखने को मिलता है। दीवारों पर हर सेक्स आसन को चित्रित किया गया है। यहां पर तीन लोग एक साथ यौन संबंध बनाते हुए देखे जा सकते हैं।

एक अनोखी बात यह है कि भारत में जहां समलैंगिकता अभी तक कानूनन अपराध था उसी देश के प्राचीन मंदिर में समलैंगिकता को मूर्तियों के द्वारा समझाया गया है। 13 वीं सदी में माउंट आबू के पास बनवाए गए दिलवाड़ा मंदिरों में भी अंतरंग दृश्यों को संगमरमर में उकेरा गया है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
समलैंगिकता की स्वीकार्यता
वैसे समलैंगिकता दुनिया के दूसरे देशों में अपनी पहचान के लिए लड़ती रही लेकिन प्राचीन भारत में इसे सामाजिक मान्यता प्रदान की गई। अमर दास विल्हेम की किताब 'तृतिया- प्रकृति : पीपुल ऑफ द थर्ड सेक्स: अंडरस्टैंडिंग होमोसेक्शुएलिटी, ट्रांसजेंडर आइडेंटिटी थ्रू हिंदुइज्म' में मध्यकालीन और संस्कृत ग्रंथों के शोध के बाद साबित किया गया है कि समलैंगिकता और 'तीसरा लिंग' भारतीय समाज में हमेशा मौजूद था।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
इस पुस्तक में कामसूत्र को उद्धृत करते हुए कहा गया है कि एक जमाने में महिला समलैंगिकों को 'स्वारानी' कहा जाता था। ये महिलाएं दूसरी महिलाओं से शादी करती थीं। उन्हें 'थर्ड जेंडर' और सामान्य समाज के बीच आसानी से स्वीकार किया गया था। इसी किताब में समलैंगिक पुरुषों को 'क्लीव' का नाम दिया गया है। उन्हें नपुंसक पुरुष कहा गया है जो अपनी समलैंगिक प्रवृत्ति के कारण महिलाओं में रुचि नहीं रखते थे।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
विवाहेत्तर संबंधों की बात
प्राचीन भारत में स्त्री या पुरुष का किसी अन्य स्त्री या पुरुष से विवाहेत्तर संबंध बनाना भी अपराध नहीं होता था और इसको सामाजिक मान्यता मिली हुई थी। राधा-कृष्ण के प्रेम का वर्णन इस बात की मिसाल है कि समाज में बहुत खुलापन था, और प्रेम को शर्म से नहीं जोड़ा जाता था।

सूरदास के शब्दों में -
"अपनी भुजा स्याम भुज ऊपरि स्याम भुजा अपने उर धरिया।
यों लपटाइ रहे उर-उर ज्यों, मरकत मणि कंचन में जरिया"।

विद्यापति ने भी राधा के सौन्दर्य का वर्णन करते समय अपना हृदय उड़ेल दिया है, वे राधा को एक सामान्य नायिका की तरह चित्रित करते हैं, हालांकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि राधा-कृष्ण पूज्य हैं, आराध्य हैं। उनके काव्य में राधा कहती हैं-
"हंसि हंसि पहु आलिंगन देल
मनमथ अंकुर कुसुमित भेल
जब निवि बन्ध खसाओल कान
तोहर सपथ हम किछु जदि जान।"

कृष्ण के साथ कहीं भी उनकी पत्नियों की तस्वीर या मूर्ति नहीं मिलती। हर जगह कृष्ण के साथ राधा ही नजर आती हैं, यह समाज में प्रेम की स्वीकृति का उदाहरण है।

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जमीन-आसमान का अंतर
वैसे तो प्राचीन भारत में सेक्स पर कई ग्रंथ लिखे गए लेकिन कामसूत्र ने पहली बार इस मिथक को तोड़ा कि सेक्स में नारी का आनंद उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना पुरुष का। पहले ये धारणा थी कि महिला को अपने चरम सुख यानी 'ऑर्गाज्म' के लिए पुरुष पर निर्भर रहना पड़ता है। वात्स्यायन ने पहली बार कामसूत्र में बताया कि महिलाओं के चरम सुख के लिए पुरुषों का होना तक जरूरी नहीं है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
एक प्रेमी के रूप में भी मर्द और औरत में बहुत फर्क होता है और उनकी यौनिकता यानि 'सेक्शुएलिटी' के स्रोत में भी जमीन आसमान का अंतर होता है। वात्स्यानन कहते हैं, 'पुरुष की सेक्स इच्छाएं आग की तरह हैं जो उसके जननांगों से उठ कर उसके मस्तिष्क की तरफ जाती है। आग की तरह वो बहुत आसानी से भड़क उठते हैं और उतनी ही आसानी से बुझ भी जाते हैं। इसके विपरीत औरत की सेक्स इच्छाएं पानी की तरह हैं जो उसके सिर से शुरू हो कर नीचे की तरफ जाती हैं। उनको जगाने में पुरुषों की अपेक्षा अधिक समय लगता है।'
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