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Parenting Tips: जब घर में आए दूसरा बच्चा, तो पहले बच्चे को ऐसे संभालें

Wed, 21 Sep 2022 01:28 PM IST
स्वाति शैवाल लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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बड़ी जिम्मेदारी है बच्चे का जीवन में आना - फोटो : Pixabay
परिवार को पूर्णता देते हैं बच्चे। बच्चे का जन्म पूरे घर को खुशियों और उत्साह से भर देता है। घर में सभी अतिरिक्त व्यस्तता से भर जाते हैं। नन्हा मेहमान कई सारी जिम्मेदारियां भी लाता है। बढ़ते हुए काम और जिम्मेदारियों में माता-पिता का व्यस्त हो जाना स्वाभाविक है लेकिन मुश्किल तब ज्यादा बढ़ जाती है जब घर में पहले से एक बच्चा मौजूद हो। नवजात के साथ ही घर में मौजूद छोटे बच्चे की भी पूरी देखभाल एक बड़ा टास्क होता है। अक्सर जिन घरों में दो बच्चे होते हैं वहां दोनों बच्चों के बीच उम्र का फासला 2-8 साल तक का हो सकता है। यह कई स्थितियों पर निर्भर करता है। छोटे बच्चे का आना बड़े बच्चे के लिए एक कड़ी चुनौती की तरह भी हो सकता है। ऐसे में माता-पिता की जिम्मेदारी यह भी बनती है कि वे पहले बच्चे को अच्छे माहौल और सकारात्मक सोच के साथ इस चुनौती के लिए तैयार करें। आखिर दोनों बच्चों को दुनिया में लाने का फैसला तो आपका ही है। इसलिए आपको शुरुआत से पहले बच्चे को अपने भाई या बहन के साथ मजबूत रिश्ता बनाने और स्थितियों से सामंजस्य बनाने की सीख देनी होगी। जानिए कैसे कुछ बातें कर सकती हैं मदद। 
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पहले बच्चे की स्थिति को समझें - फोटो : Pixabay
न होने दें एहसास कि सबकुछ बदल गया 

अब तक घर में एकमात्र छोटे सदस्य के रूप में सबका लाड़-प्यार पा रहे बच्चे के लिए चीजें अचानक बदलने लगती हैं। चाहे आपने उसे नए बच्चे के आने के पहले सबकुछ बताया हो, पूरे नौ महीने उसे इस बात के लिए तैयार किया हो लेकिन जब बच्चा घर में आ जाता है तो पहले बच्चे के लिए उतनी सहजता से उसे स्वीकारना आसान नहीं होता। इस समय पहला बच्चा अनिश्चिंता, संशय और असमंजस के भंवर में झूल रहा होता है कि शायद अब उसे पहले की तरह प्रेम और सुविधाएँ नहीं मिल पाएंगी और इस सब को वह गुस्से, चिड़चिड़ाहट, बात बात पर रोना, जिद करना आदि भावों से व्यक्त करता है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि यदि इस समय बच्चे को सही तरीके से समझाया न जाए तो यह स्वभाव और भी आक्रामक हो सकता है और आगे भी उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बना रह सकता है। इसलिए सबसे पहली कोशिश करें बच्चे के साथ सहज रहने की। न तो उसे पहले से अधिक बेवजह का दुलार और लाड़ दें, जो कि अक्सर पैरेंट्स गिल्ट में भी करते हैं। न ही उससे पूरी तरह ध्यान हटाएँ। सहजता से जैसे पहले उससे व्यवहार करते रहे हैं, वैसे ही करें। 
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बच्चे में विकसित करें जिम्मेदारी का भाव - फोटो : Pixabay
जिम्मेदारियां समझाएं 

दूसरी प्रेग्नेंसी की शुरुआत के कुछ महीनों बाद बच्चे को धीरे धीरे उसके आने वाले भाई या बहन से जोड़ें। उसे बताएं कि वह बड़ी दीदी या बड़ा भैया बनेगा तो उसकी जिम्मेदारियां भी बढ़ेंगी। कई काम उसकी मदद के बिना मम्मी-पापा अकेले नहीं कर पायेंगे और उसे कई बार बेबी का ध्यान भी रखना पड़ेगा। बच्चे को यह एहसास करवाएं कि नया बेबी आने के बाद भी उसकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आएगा लेकिन हां घर में उसकी मदद की जरूरत सबको पड़ेगी। बच्चे के मन में एक बार यह बात बैठ गई कि सबकुछ पहले जैसा ही रहेगा लेकिन उसकी भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगी तो वह खुद खुशी-खुशी थोड़े बहुत सामान्य बदलाव भी अपना लेगा।

छोटे छोटे काम जैसे भूख लगने पर बताना और अगर बच्चा 6 साल से बड़ा है तो सामने रखा खाना प्लेट में ले लेना, स्कूल से आने पर कपड़े बदल लेना और हाथ धोना, अपनी चीजें/खिलौने जगह पर रखना, नए बेबी के लिए रूम तैयार करने या आपके किसी काम में मदद करना आदि जैसे काम आप बच्चे को पहले से सिखा सकते हैं। अगर चौथे महीने से भी यह आपने शुरू किया तो दूसरे बच्चे के जन्म तक उसे इसकी आदत हो जाएगी और तब यह आपके लिए बहुत मददगार साबित होगा। 

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मिलकर क्वालिटी टाइम बिताएं - फोटो : Pixabay
बच्चे के साथ बॉन्डिंग बढ़ाएं 

बच्चे को बताएं कि जब वह दुनिया में आने वाला था तब भी आपने इसी तरह तैयारी की थी। हो सके तो उसे पुराने फोटो दिखाएँ। ताकि उसे यह एहसास हो कि आप उससे भी उतने ही जुड़े हैं जितने नए आने वाले बेबी से। जब भी समय मिले, बच्चे के साथ बैठकर पुराने फोटोग्राफ्स देखें, उसे उसके बचपन के बारे में बताएं।

नवजात के आने के बाद भी यह जिम्मेदारी माता-पिता दोनों मिलकर बांटें और पहल बच्चे के साथ भी समय गुजारें। हालाँकि हर डिलीवरी और हर जन्मा बच्चा थोड़ा अलग हो सकता है लेकिन दूसरे बच्चे के जन्म की सबसे सकारात्मक बात यह होती है कि आपको उसकी देखभाल से जुड़ी कई सारी बातें पता होती हैं। इसलिए पहले वाली घबराहट, असमंजस और डर नहीं होते। इससे आपकी ऊर्जा और समय दोनों में बहुत बचत होती है और इसका फायदा आप पहले बच्चे के साथ समय बिताकर उठा सकते हैं। इसके लिए आपको अपने रूटीन में थोड़ा बहुत फेरबदल करना पड़े तो भी करें। 
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छोटे बच्चों के साथ एक्टिविटी से जुड़ें - फोटो : Pixabay
बहुत छोटे बच्चों को ज्यादा समझाएं नहीं 

अगर 2 या 3 साल के एक बच्चे से आप उम्मीद करेंगे कि वह तुरंत सारी स्थितियां समझ जाएगा तो यह नामुमकिन है। नवजात शिशु के साथ ही इतने छोटे पहले बच्चे को भी आपका सारा अटेंशन और देखभाल चाहिए होती है। इसलिए अपने रूटीन को दोनों बच्चों के हिसाब से बदलें। इस समय दोनों ही पैरेंट्स को और हो सके तो परिवार या मित्रों की भी मदद से ऐसा रूटीन तैयार करना चाहिए जिससे दोनों बच्चों के साथ ही आपको भी आराम का पर्याप्त मौका मिल सके।

इसका एक सबसे अच्छा तरीका है, दोनों बच्चों के खाने, सोने आदि जैसे कामों के लिए एक जैसा समय तय करें। इसके लिए शुरुआत में थोड़ा समय लगेगा लेकिन कुछ ही दिनों में यह समय सैट हो जायेगा और दोनों बच्चों के साथ आपको भी आराम का समय मिलेगा। साथ ही इससे दोनों बच्चों को संभालने की एनर्जी भी आप में रहेगी। बहुत छोटे बच्चे को हर बात कहकर समझाने की जरूरत नहीं। दिनभर में कई बार उसको गले लगाने, उसके साथ कार्टून देख लेने, कोई स्टोरी बुक पढ़ने, उसके खिलौनों से खेलने, उसके साथ मिलकर बेबी के लिए गाने ढूंढने/बनाने, उसका होमवर्क करवाने, जैसी एक्टिविटीज़ में जुड़े रहें। ये काम पैरेंट्स को मिलकर करना है। 
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बच्चे की जिज्ञासा को समझें - फोटो : pixabay
नजरअंदाज न करें

नए बच्चे के आने के बाद सबसे बड़ा डर इसी बात का होता है। चाहे पहला बच्चा छोटा हो या बड़ा, अगर आपका एकतरफा ध्यान सिर्फ नवजात की ओर होगा तो पहले बच्चे के मन में यह बात आएगी ही कि उसकी तरफ आपका ध्यान नहीं है। इस विचार का परिणाम बच्चे के गुमसुम रहने, चिड़चिड़ा होने, उसके व्यक्तित्व पर बुरा असर पड़ने से लेकर उसके आक्रामक होने और दूसरे बच्चे को नुकसान पहुंचाने तक के रूप में सामने आ सकता है। पहले बच्चे को यह जताना कि आप उससे प्यार करते हैं, उसकी तरफ भी आपका ध्यान है, इसकी पूरी कोशिश करें, चाहे दिनभर में 10 मिनिट ही सही और चाहे इसके लिए आपको अपने आराम में थोड़ी कटौती करनी पड़े तब भी। 
 
 
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प्रश्नों को लेकर बच्चे को डांटें नहीं - फोटो : Istock
बच्चे के हर सवाल का जवाब 

एक और महत्वपूर्ण बात। पहला बच्चा किसी भी उम्र का हो, उसके मन में इस नई स्थिति को लेकर कई सारे सवाल होंगे और वह आपसे पूछेगा भी। उसके सवालों का जवाब अगर आपके पास उस समय न भी हो तो भी उसे टालें या उस पर चिढ़ें नहीं। इसकी बजाय उसे यह भरोसा दिलाएं कि आप उसके प्रश्न का जवाब जल्द देंगे/देंगी। इसके बाद शांति से उसके सवाल का जवाब सोचें और फिर उसे बताएं। इससे बच्चे का भरोसा आप पर हमेशा बना रहेगा और वह हर बात आपसे शेयर करना भी सीखेगा। इस प्रक्रिया में हो सकता है कि कुछ प्रश्न ऐसे भी हों जिनके उत्तर बच्चे की उम्र के लिहाज से अधिक जटिल हों, ऐसे में उन प्रश्नों को लेकर बच्चे को डांटें नहीं, न ही आप तनाव लें। बल्कि उन प्रश्नों के कितने हिस्से की जानकारी आप आसान और सही तरीके से दे सकते हैं, यह सोचें। क्रिएटिव तरीकों से बच्चे के प्रश्नों के जवाब दें, जैसे किसी कहानी, कविता या गाने के रूप में। 
 
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