- 'गुड टच-बैड टच', मासिक धर्म, शरीर में होने वाले बदलावों, सेक्स और सुरक्षित सेक्स के बारे में होने वाली हर बातचीत में लड़कों और लड़कियों को एक साथ शामिल किया जाना चाहिए।
- स्कूलों में बच्चों को प्रेम और आकर्षण जैसी बेहद बुनियादी मानवीय भावनाओं से परिचित कराया जाए।घरों में माता-पिता भी बच्चों के सामने एक दूसरे को गले लगाने या एक-दूसरे से प्यार जाहिर करने से न कतराएं।इससे बच्चों के मन में इंसानी सम्बन्धों को लेकर गलत धारणाएं बनने से बचेंगी।
- बदलते वक़्त को देखते हुए स्कूलों में सेक्स एजुकेशन की शुरुआत जल्दी हो।किताबी भाषा ज़्यादा आसान बनाई जाए और शिक्षकों को भी ऐसे विषयों को पढ़ाने के लिए खास तौर से प्रशिक्षण दिया जाए।
- सेक्स एजुकेशन के साथ ही बच्चों को उनकी सुरक्षा, सहमति, यौन संक्रामक बीमारियों और सुरक्षित यौन सम्बन्ध के साधनों के बारे में बताया जाए।इमर्जेंसी पिल्स के बारे में बताया जाए तो उनके साइड इफेक्ट्स के बारे में भी बताना न भूला जाए।
- सेक्स सिर्फ पुरुष और महिला के बीच नहीं होता, बच्चों को अलग-अलग सेक्शुअलिटी और जेंडर डायवर्सिटी के बारे में भी बताया जाए।उन्हें समलैंगिकता के बारे में भी बताया जाए और असेक्शुअलिटी के बारे में भी।