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तेज टाइपिंग करने वाले लोगों में ऐसा क्या जादू होता है

Wed, 13 Feb 2019 05:51 PM IST
मंजू ममगाईं बीबीसी हिंदी
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जिन लोगों की टाइपिंग की रफ़्तार धीमी होती है, उन्हें की-बोर्ड पर दूसरों की थिरकती उंगलियां देखकर रश्क हो जाता है।धीमी टाइपिंग करने वाले सोचते हैं कि काश! हमारी भी टाइपिंग स्पीड ऐसी ही होती।लेकिन क्या होता है तेज टाइपिंग सीखने का नुस्खा? माना जाता है कि ऑनलाइन गेमिंग के शौकीनों की टाइपिंग की रफ़्तार सबसे ज़्यादा होती है।फिनलैंड की ऑल्टो और ब्रिटेन की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने दुनिया भर में करीब 1 लाख 68 हजार लोगों की टाइपिंग के तरीके पर बारीकी से गौर किया।उन्होंने पाया कि गेम खेलने वाले अक्सर 'रोलओवर टाइपिंग' करते हैं। इसका मतलब ये कि ये लोग पिछली की छोड़ने से पहले ही बाद वाले अक्षर का बटन दबा देते हैं।

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typewriter

बात रोलओवर टाइपिंग की

ज़्यादातर गेम खेलने वाले बाएं हाथ से की-बोर्ड को कंट्रोल करते हैं और दाहिने हाथ से माउस चलाते हैं।ऐसे लोग टाइप करते वक़्त अपने खेल के खिलाड़ियों को एक हाथ से ही काफी रफ़्तार से भगा लेते हैं या कमांड देते हैं।तेज टाइपिंग के लिए जरूरी है कि की-बोर्ड पर अगला बटन दबने से पहले पिछला बटन छूट जाए।वरना गलत कमांड चली जाती है।ऐसा हुआ तो, सारा किया-धरा बेकार हो सकता है।फिनलैंड की ऑल्टो यूनिवर्सिटी के रिसर्चर एंती ओलसविर्ता कहते हैं कि रॉलओवर टाइपिंग आम तौर पर क़ुदरती होती है।इसे सीखा नहीं जा सकता है, हो सकता है कि टाइपिंग के वक़्त आप ये तरीका इस्तेमाल करते हों और आपको इसके बारे में पता ही न हो।

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एक मिनट में 108 शब्द

ओलसविर्ता का कहना है कि हर टाइप करने वाला अपने हिसाब से अपनी तकनीक सीखता है और रफ़्तार बढ़ाता है।इस रिसर्च के मुताबिक, आप जिस उंगली से कोई बटन दबाते हैं, उसी से हमेशा वो बटन दबाना चाहिए।लेकिन, तेज टाइपिंग का अवॉर्ड जीत चुके शॉन व्रोना कहते हैं कि ऐसा नहीं है।हर शब्द के साथ बटन दबाने का तरीका बदल जाता है।शॉन दस साल की उम्र में ही एक मिनट में 108 शब्द टाइप कर लेते थे।वो कहते हैं कि आम तौर पर जो बटन आपकी उंगली के करीब होती है, उसी उंगली से आप फलां बटन को दबाते हैं।रोलओवर टाइपिंग अगर सीख नहीं सकते तो फिर तरीका क्या है?

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क्या तेज टाइपिंग के फायदे होते हैं?

जिस टाइपिंग स्पीड को लेकर हम इतने फिक्रमंद हैं, उसकी शायद जरूरत ही खत्म हो जाए।डिजिटल एक्सपर्ट बेन वुड कहते हैं कि 2022 तक लोग आवाज से कमांड देकर ज़्यादा सर्च करने लगेंगे और ये टाइपिंग कमांड की जगह ले लेगा।हालांकि इसका ये मतलब नहीं है कि टाइपिंग की जरूरत ही खत्म हो जाएगी।ये जरूर है कि इसकी रफ़्तार के मुकाबले उतने दिलचस्प नहीं रह जाएंगे, क्योंकि तेजी से टाइपिंग की जरूरत अब कम होती जा रही है लेकिन, तेज टाइपिंग से किसी आदमी की ही नहीं, उसकी कंपनी की, उसके देश की प्रोडक्टिविटी भी बढ़ जाती है।

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सिर्फ टाइपिंग की रफ़्तार से काम चलेगा?

टाइपिंग का मुकाबला जीतने वाले शॉन व्रोना मानते हैं कि तेज टाइपिंग ऐसी खूबी है जो बहुत काम आ सकती है। हालांकि वो इसे इतना अहम भी नहीं मानते।व्रोना कहते हैं कि बहुत कम लोग हैं जो अपने विचारों को फटाफट टाइप कर सकें।आज जरूरत है कि लोग 30-40 शब्द प्रति मिनट की रफ़्तार को बढ़ा कर 60-80 शब्द प्रति मिनट की टाइपिंग स्पीड तक ले आएं।ये रफ़्तार विचारों को तुरंत टाइप करने के लिए जरूरी है।इससे ज़्यादा रफ़्तार सिर्फ बड़बोले लोगों के काम आती है, जो ये दावा कर सकें कि वो सब से तेज टाइप करते हैं।उत्पादकता बढ़ाने के लिए सिर्फ तेज टाइपिंग से काम नहीं चलेगा।

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प्रोडक्टिविटी पर असर

ब्रिटेन के प्रोडक्टिविटी एक्सपर्ट क्रिस ब्यूमोंट कहते हैं कि प्रोडक्टिविटी बेहतर करने के लिए टाइपिंग के अलावा दूसरे हुनर भी जरूरी हैं।वो कहते हैं कि हम दिन भर टाइपिंग तो करते नहीं जो इससे हमारी उत्पादकता बढ़ जाए।हम मीटिंग करते हैं, प्रेजेंटेशन तैयार करते और देते हैं।सामान की आवाजाही का इंतजाम करते हैं।इनकी रफ़्तार का हमारी प्रोडक्टिविटी पर ज़्यादा असर होता है।ब्यूमोंट कहते हैं कि हमारी बुद्धि की धार हमारी प्रोडक्टिविटी बढ़ाने में ज़्यादा अहम रोल निभाती है टाइपिंग नहीं।तो, फिर कभी अगर कोई तेजी से टाइप करता दिखे, तो उसको अक़्ल से मात देने की सोचिएगा अपनी टाइपिंग स्पीड बढ़ाकर नहीं।

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