domestic violence
'बेटे की चाह से जुड़ गई थी मेरी ज़िंदगी'
मुझसे मारपीट, मेरे कमाए पैसों से शराब और बिस्तर में शैतान की तरह मेरे ही शरीर का इस्तेमाल, सब जारी रहा। पर मैं चुप रही। औरत के साथ ये सब होता है। मां ने बताया था। चौथी बार जब मैं पेट से थी तो 20 की हो गई थी।अधमरे से मेरे शरीर को जब मैडम (जिनके घर मैं काम करती थी) ने फिर फूलते देखा तो नाराज़ हो गईं। पूछा, पैदा कर पाओगी? इतना ख़ून भी है शरीर में? मैंने कहा, हो जाएगा। सोचा बड़े घर की ये औरत क्या समझेगी मेरी ज़िंदगी को। बेटा पैदा होने तक मुझे ये सब झेलना ही था।बैंक में पैसे जमा करने की सलाह और मदद एक बात थी पर घर-परिवार की ये बारीक़ी नहीं समझा सकती थी उन्हें। मन करता था कि सब चुपचाप हो जाए। किसी को पता ना चले कि मैं पेट से हूं, मेरा शरीर ना बदले, मेरी ज़िंदगी की कहानी भरे चौराहे पर ना ला दे। मुझे यक़ीन था कि बेटा हो जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा। मारपीट, शराब, बिस्तर का वो मनहूस सिलसिला टूट जाएगा और इस बार बेटा ही हुआ!