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हिंदी दिवस 2024: पांच श्रेष्ठ कविताएं, सुनकर हिंदी से हो जाएगा प्रेम

Sat, 14 Sep 2024 09:27 AM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

ऐसे में अगर आप भी हिंदी पर गर्व महसूस करना चाहते हैं, यहां कुछ ऐसी कविताएं दी गई हैं, जिसे पढ़कर आपको हिंदी भाषी होने पर अभिमान होगा। साथ ही अपने सभी परिचितों को हिंदी की ये कविताएं पढ़ाकर उन्हें भी हिंदी के प्रति प्रेम की भावना महसूस करा सकते हैं। 
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हिंदी दिवस पर कविता - फोटो : amar ujala
Hindi Diwas 2024 Par Kavita: 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जा रहा है। यह भारत और हिंदी भाषियों के लिए महत्वपूर्ण दिन है। साथ ही विदेश में रहने वाले हिंदी भाषियों को भारत से जोड़ता है। इस दिन को मनाने का उद्देश्य हिंदी के महत्व के प्रति जागरूकता फैलाना और हिंदी के इस्तेमाल को प्रचारित प्रसारित करना है। हिंदी भारत की राजभाषा है। अधिकतर भारतीय हिंदी भाषी हैं, हालांकि अंग्रेजी के बढ़ते चलन के कारण आजकल के युवा और बच्चे हिंदी से दूर होते जा रहे हैं। उन्हें ये अहसास दिलाने के लिए कि हिंदी हमारी और हिंदुस्तान की पहचान है, हिंदी दिवस को राष्ट्रीय स्तर पर मनाते हैं। 

ऐसे में अगर आप भी हिंदी पर गर्व महसूस करना चाहते हैं, यहां कुछ ऐसी कविताएं दी गई हैं, जिसे पढ़कर आपको हिंदी भाषी होने पर अभिमान होगा। साथ ही अपने सभी परिचितों को हिंदी की ये कविताएं पढ़ाकर उन्हें भी हिंदी के प्रति प्रेम की भावना महसूस करा सकते हैं। 
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हिंदी दिवस पर कविता - फोटो : amar ujala
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल


निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल

बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।

अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन

पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।

उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय

निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।

निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय

लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय।

इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग

तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।

और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात

निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।

तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय

यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय।

विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार

सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।

भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात

विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।

सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय

उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।

भारतेंदु हरिश्चंद्र
 
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हिंदी दिवस पर कविता - फोटो : amar ujala

भाल का श्रृंगार

 

माँ भारती के भाल का श्रृंगार है हिंदी

हिंदोस्तां के बाग की बहार है हिंदी।
 

घुट्टी के साथ घोल के माँ ने पिलाई थी

स्वर फूट पड़ रहा, वही मल्हार है हिंदी।
 

तुलसी, कबीर, सूर औ' रसखान के लिए

ब्रह्मा के कमंडल से बही धार है हिंदी।
 

 सिद्धांतों की बात से न होयगा भला

अपनाएँगे न रोज़ के व्यवहार में हिंदी।
 

 कश्ती फँसेगी जब कभी तूफ़ानी भँवर में

उस दिन करेगी पार, वो पतवार है हिंदी।
 

 माना कि रख दिया है संविधान में मगर

पन्नों के बीच आज तार-तार है हिंदी।
 

सुन कर के तेरी आह 'व्योम' थरथरा रहा

वक्त आने पर बन जाएगी तलवार ये हिंदी।
 

-डॉ जगदीश व्योम

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हिंदी दिवस पर कविता - फोटो : amar ujala
गूंजी हिंदी विश्व में


गूंजी हिन्दी विश्व में, स्वप्न हुआ साकार
राष्ट्र संघ के मंच से, हिन्दी का जयकार
हिन्दी का जयकार, हिन्दी हिन्दी में बोला
देख स्वभाषा-प्रेम, विश्व अचरज से डोला
कह कैदी कविराय, मेम की माया टूटी
भारत माता धन्य,स्नेह की सरिता फूटी।

- अटल बिहारी वाजपेयी
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हिंदी दिवस पर कविता - फोटो : amar ujala

 हिंदी हमारी आन-बान-शान

 

हिंदी हमारी आन है, हिंदी हमारी शान है, 

हिंदी हमारी चेतना वाणी का शुभ वरदान है, 

हिंदी हमारी वर्तनी, हिंदी हमारा व्याकरण, 

हिंदी हमारी संस्कृति, हिंदी हमारा आचरण, 

हिंदी हमारी वेदना, हिंदी हमारा गान है, 

हिंदी हमारी आत्मा है, भावना का साज़ है, 

हिंदी हमारे देश की हर तोतली आवाज़ है, 

हिंदी हमारी अस्मिता, हिंदी हमारा मान है, 

हिंदी निराला, प्रेमचंद की लेखनी का गान है, 

हिंदी में बच्चन, पंत, दिनकर का मधुर संगीत है, 

हिंदी में तुलसी, सूर, मीरा जायसी की तान है, 

जब तक गगन में चांद, सूरज की लगी बिंदी रहे, 

तब तक वतन की राष्ट्र भाषा ये अमर हिंदी रहे, 

हिंदी हमारा शब्द, स्वर व्यंजन अमिट पहचान है, 

हिंदी हमारी चेतना वाणी का शुभ वरदान है।

– अंकित शुक्ला

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हिंदी दिवस पर कविता - फोटो : amar ujala
हैं ढेर सारी बोलियां, भाषाओं की हमजोलियां 
फिर भी सभी के बीच, हिंदी का अलग ही ढंग है।
इसका अलग ही रंग है।

मीठी है ये कितनी जबां, इस पर सरस्वती मेहरबां
कविता-कथा-आलोचना हर क्षेत्र में इसका समां।
सब रंक – राजा बोलते, बातों में बातें तोलते
महफिल में भर जाती खनक, हर सिम्त उठती तरंग है।
इसका अलग ही रंग है।

इसमें भरा अपनत्व है, भारतीयता का सत्व है
इसके बिना तो संस्कृति औ सभ्यता निस्सत्व है
इसमें पुलक आतिथ्य की, इसमें हुलस मातृत्व की
मिलती है खुल के इस तरह, जिस तरह मिलती उमंग है।
इसका अलग ही रंग है।


इस बोली में मिलती है लोरियां, इस भाषा में झरती निबोरियां
इस बोली में कृष्ण को छेड़ती गोकुल – बरसाने की छोरियां;
कहीं पाठ चलता अखंड है, कहीं भक्तिमय रस रंग है
कहीं चल रहा सत्संग है, इसका अलग ही रंग है।
इसका अलग ही ढंग है।

- डॉ. ओम निश्चल
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