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इतिहास के आइने में कहानी उस आलू की, जो विटामिन और पोषक तत्वों का है खजाना 

Sat, 04 Apr 2020 12:44 PM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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साल 1957 में फ्रांसीसी दार्शनिक और साहित्यिक आलोचक रोलां बार्थ ने चिप्स को 'देशभक्त' बताया था। एक सदी पहले, आलू में लगी एक बीमारी ने कुछ ही साल में आयरलैंड की आधी आबादी खत्म कर दी थी। आज चीन, भारत, रूस और यूक्रेन आलू के प्रमुख उत्पादक हैं। आलू के साथ इन देशों के अंतरंग और जटिल संबंध हैं। लेकिन इनमें से कोई भी आलू को मूल रूप से अपना नहीं कह सकते। 8,000 साल पहले दक्षिण अमेरिका के एंडीज में आलू की खेती शुरू की गई थी। 1500 के बाद इसे यूरोप लाया गया, जहां से यह पश्चिम और उत्तर की ओर फैला और फिर से अमेरिका पहुंचा।

आलू की कहानी
खाद्य इतिहासकार रेबेका अर्ल कहती हैं कि आलू दुनिया भर में होता है और सभी लोग इसे अपना समझते हैं। वो इसे दुनिया का 'सबसे सफल प्रवासी' मानती हैं। किसान और ग्राहक, कोई भी इसकी उत्पत्ति की जगह पर ध्यान नहीं देता। अमेरिका में इदाहो के किसान और ग्नोची के दीवाने इटली के लोग आलू पर उतना ही दावा करते हैं जितना पेरू के लोग। आलू की कहानी किसी एक देश या भौगोलिक क्षेत्र की नहीं है। इसकी कहानी बताती है कि पिछली कुछ पीढ़ियों में इंसान ने जमीन और खाने के साथ अपना रिश्ता कैसे बदला है।
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potato
आलू कितना जरूरी?
चावल, गेहूं और मक्का के बाद आलू दुनिया की चौथी सबसे अहम फसल है। गैर-अनाजों में इसका पहला नंबर है। आलू की  कामयाबी के पीछे है इसकी पौष्टिकता, खेती में आसानी और जमीन में छिपे रहने की वजह से युद्धों में इसकी सुरक्षा। आलू की उत्पत्ति को समझने की एक सही जगह है इंटरनेशनल पोटैटो सेंटर (CIP), जहां आलू से जुड़े तमाम तरह के शोध होते हैं। पेरू की राजधानी लीमा के एक उपनगर में बनाए गए इस केंद्र में हजारों तरह के आलू के नमूने मिलते हैं।

CIP जीन बैंक के सीनियर क्यूरेटर रेने गोमेज कहते हैं, "चिली से लेकर संयुक्त राज्य अमरीका तक आलू कहीं भी मिल जाएगा लेकिन इसकी आनुवंशिक विविधता एंडीज में ही मिलती है।" आलू की खेती सबसे पहले लीमा से  करीब 1,000 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में टिटिकाका लेक के पास शुरू हुई थी। आलू जल्द ही पहाड़ों पर रहने वाले इंका सहित स्वदेशी समुदायों का अहम खाना बन गया।आलू को फ्रीज करके और सुखाकर बनाया जाने वाला चूनो कई साल तक या कभी-कभी दशकों तक चल जाता था।
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अमेरिका से बाहर
1532 में स्पेन के आक्रमण ने इंका को खत्म कर दिया लेकिन आलू की खेती खत्म नहीं हुई। स्पेन के लोग इसे अटलांटिक के पार ले गए, जैसे वे टमाटर, एवेकाडो और मक्का ले गए थे। इतिहासकार इसे दि ग्रेट कोलंबियन एक्सचेंज कहते हैं। इतिहास में पहली बार आलू अमरीका से बाहर गया। एंडीज से लाई गई शुरुआती किस्मों को स्पेन और यूरोप के मुख्य हिस्से में उगाना आसान नहीं रहा।

आनुवंशिकी के वैज्ञानिक हर्नन ए। बर्बानो का कहना है कि एंडीज में आलू के पौधों को दिन में 12 घंटे सूरज की रोशनी मिलती थी। यूरोप में गर्मी के लंबे दिनों ने आलू के पौधों को भ्रमित कर दिया और गर्म महीनों में वे बढ़ नहीं पाए।

पतझड़ और बर्फीले मौसम में आलू के पौधों का जिंदा रहना भी मुश्किल था। यूरोप में आलू की खेती का पहला दशक ना कामयाब रहा। आयरलैंड में आलू को बेहतर मौसम मिला। यहां के ठंडे लेकिन बर्फ-रहित मौसम में फसल तैयार होने का पर्याप्त समय मिला।

किसानों ने यहां आलू की ऐसी किस्म तैयार की जो गर्मियों की शुरुआत में तैयार हो जाती थी। यहीं से आलू किसानों की प्रमुख फसल बन गया। आलू की फसल किसी बीमारी की वजह से खराब हो जाने के बाद आयरलैंड में अकाल पड़ गया था, कहा जाता है कि इस अकाल की वजह से आयरलैंड की आबादी कुछ सालों में आधी होकर रह गई थी

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पौष्टिक खाना
किसानों ने आलू को अहमियत दी क्योंकि प्रति हेक्टेयर उनको बेजोड़ पौष्टिकता मिलती थी। आयरलैंड में किराये की जमीन पर खेती होती थी और जमीन मालिकों ने किराया बढ़ा दिया था। किसान ऐसी फसल लेने को मजबूर थे जो कम जमीन में ज्यादा पैदावार दे। समाजशास्त्री जेम्स लैंग के मुताबि क प्रति एकड़ जमीन में आलू से ज्यादा पैदावार किसी और फसल की नहीं थी। इसमें मेहनत कम थी और फसल को रखना आसान था। विटामिन ए और डी को छोडकर आलू में सभी प्रमुख विटामिन और पोषक तत्व मिलते हैं। जीवन बचाने की जो खूबी आलू में है वह किसी और फसल में नहीं।

छिलके वाले आलू के साथ दूध के कुछ उत्पादों को मिला दें तो स्वस्थ मानव आहार तैयार होता है। आलू के हर 100 ग्राम में दो ग्राम प्रोटीन मिलता है। 16वीं सदी के आयरलैंड में उपभोग के कुछ अनुमानों पर य कीन करें तो प्रति वयस्क प्रति दिन साढ़े पांच किलो आलू की आपूर्ति थी।

17वीं और 18वीं सदी में एक एकड़ जमीन पर आलू की खेती और एक गाय के दूध से 6 से 8 लोगों के परिवार को पूरे साल का भोजन मिल जाता था। किसी भी दूसरी फसल से यह संभव नहीं था। आयरलैंड और ब्रिटेन के किसानों का आलू से अटूट नाता बन गया। ब्रिटिश द्वीपों से आलू पूरब की ओर बढ़ा और उत्तरी यूरोप तक फैल गया। 1650 तक आलू बेल्जियम, नीदरलैंड और लक्जमबर्ग तक पहुंच गया। 1740 तक वह जर्मनी, प्रूशिया और पोलैंड तक और 1840 तक रूस पहुंच गया। किसानों ने अपने-अपने देश की जलवायु के हिसाब से किस्में छांटीं और आलू फलता-फूलता गया। 
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आलू के फायदे
ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार के युद्ध और (इंग्लैंड-फ्रांस) सात साल के युद्ध के दौरान किसानों को आलू में एक और फायदा दिखा। इस पर टैक्स लगाना और इसे युद्ध में नष्ट करना मुश्किल था। अर्ल कहती हैं, "गेहूं की खड़ी फसल को छिपाया नहीं जा सकता।" टैक्स अधिकारी खेत का आकार और फसल देखकर टैक्स अनुमान लगाते थे और फसल तैयार होने पर वसूली के लिए आ जाते थे। लेकिन भूमिगत आलू में यह संभव नहीं था। जरूरत होने पर उसे धीरे-धीरे निकाला जा सकता है। लैंग ने लिखा है, "इस तरह की कटाई फसल को टैक्स अधिकारियों से छिपाकर रखती है और युद्ध के समय किसानों की खाद्य आपूर्ति बचाकर रखती है।" 

लूटमार करने वाले सैनिक अनाज के गोदामों पर धावा बोलते हैं, लेकिन वे खेत खोदकर फसल नहीं निकालते। कुलीनों और सैन्य रणनीतिकारों ने यह खूबी पहचान ली थी। प्रूशिया के राजा फ्रेडरिक ने आलू की खेती करने के निर्देश बंटवाए थे। वह चाहते थे कि ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार युद्ध में अगर दुश्मन सेनाएं हमला करती हैं तो किसानों के पास खाना रहे। दूसरे देशों ने भी ऐसा किया। संयुक्त राष्ट्र के फूड एंड एग्रीकल्चर एसोसिएशन (FOA) के मुताबि क 1800 के दशक की शुरुआत में नेपोलियन कालीन युद्ध शुरू होने तक आलू यूरोप का सुरक्षित आहार बन गया था। इतिहासकार विलियम मैकनील के मुताबि क 1560 के बाद यूरोप में जितने भी युद्ध हुए उनके बाद आलू का रकबा बढ़ता गया। इनमें दो विश्व युद्ध भी शामिल हैं।
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potato - फोटो : अमर उजाला
पोषण और ताकत
खाद्य इतिहासकारों का मत है कि आलू के पोषक गुणों ने पारंपरिक लोगों को इसे अपनाने के लिए प्रेरित किया। अर्ल का तर्क है कि यूरोप में किसानों ने आलू को अपनाया। उनको किसी तरह से मनाने की जरूरत नहीं पड़ी। कुलीनों ने कोई नई फसल ईजाद नहीं की थी। उनको बस ये पता था कि सेहतमंद खाना क्या था। यूरोपीय खाने में कोई सुपरफूड पेश करने की बजाय उन्होंने पोषण पर ध्यान दिया। आलू इसमें पूरी तरह फिट था। 18वीं सदी में देश की आबादी की सेहत को राज्य की ता कत के राजनीतिक नजरिये से देखा गया जिसने आलू की किस्मत बदल दी।

तंदुरुस्त और ताकतवर लोग औद्योगिक उत्पादन और सैन्य शक्ति के लिए अहम थे और राज्य को यह समझना था कि उनके खाने में पोषक तत्वों को कैसे संतुलित किया जाए। अर्ल का कहना है कि भोजन और राज्य के बीच संबंध के बारे में यूरोपीय विचारों से आलू का आकर्षण बढ़ा। इस मामले में आलू बेजोड़ था। दि वेल्थ ऑफ नेशन्स में एडम स्मिथ ने लिखा था, "आलू के खेतों में पैदा होने वाला खाना गेहूं के खेतों में पैदा होने वाले खाने से कहीं ज्यादा अच्छा है। कोई भी खाना पौष्टिकता और इंसान की सेहत के लिए उपयुक्त होने के बारे में इससे निर्णायक प्रमाण नहीं दे सकता।"

स्मिथ ने आलू की खूबियों को सही पहचाना था, लेकिन यूरोप के खेतों और बगानों को आलू से भरने का काम किसानों ने किया था, कुलीन वर्ग ने नहीं। सवाल है कि 18वीं सदी में स्मिथ और उनके समकालीनों ने पौष्टिकता को कैसे मापा होगा?
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वारविक यूनिवर्सिटी में इतिहास विभाग की विभागाध्यक्ष रेबेका अर्ल का कहना है कि उन दिनों तक वैज्ञानिक विटामिन, प्रोटीन और खनिजों की भाषा पर सहमत नहीं हुए थे। इसकी जगह वे कहते थे, "उनको देखो जो आलू खाते हैं। वे अधिक मजबूत हैं। दूसरी चीजें खाने वालों की बनिस्पत वे अधिक ऊर्जावान हैं।"

आलू के प्रशंसक गलत नहीं थे। 1700 के बाद पैदा हुए फ्रांसीसी सैनिकों के मिलिट्री रिकॉर्ड्स से पता चला कि आलू खाने से लोग थोड़े लंबे हो गए थे। जो गांव आलू की पैदावार के लिए उपयुक्त थे, वहां इसकी खेती ने वयस्कों की लंबाई औसतन करीब आधे ईंच बढ़ा दी।

यह भी दावा किया जाता है कि आलू के विस्तार के बाद यूरोप और एशिया में जनसंख्या विस्फोट हुआ। 1700 से 1900 के बीच दुनिया की आबादी में हुई करीब एक-चौथाई बढ़ोतरी और शहरीकरण आलू के कारण हुआ। मैकनील ने लिखा है, "तेजी से बढ़ती आबादी का पेट भरकर आलू ने 1750 से 1950 के बीच कुछ यूरोपीय देशों को बाकी दुनिया पर प्रभुत्व जमाने में मदद की।"

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Potato - फोटो : अमर उजाला
एंडीज में वापस
1845 से 1849 के बीच आयरलैंड में पड़े भीषण अकाल ने आलू की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया। फसल खराब होने और लंदन की सरकार की अनदेखी के कारण 10 लाख लोग मारे गए। करीब 10 लाख लोग अमरीका पलायन कर गए और 20 लाख लोग दूसरी जगह चले गए। कुछ ही दशकों में आयरलैंड की आबादी आधी हो गई। अकाल के बाद देखा गया कि आलू से देश में 80 फीसदी कैलोरी की आपूर्ति थी जबकि इसकी कुछ किस्में ही उपलब्ध थीं। आनुवंशिक विविधता खत्म होने से आलू में बीमारियां लगने का खतरा बहुत बढ़ गया था। 1750 के दशक में यूरोप में कुछ किस्मों का मिश्रण हो चुका था।

बर्बानो उस टीम का हिस्सा थे जिसने यूरोपीय आलुओं के जीन्स का अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला था कि एंडीज की प्राचीन किस्मों को दक्षिण-मध्य चिली से लाई गई किस्मों से मिलाया गया था। ये आलू दक्षिणी गोलार्ध पर होने वाले लंबे दिनों के अनुकूल थे। कृषि वैज्ञानिक पिछले कई साल से आलू किसानों के लिए खाद्य सुरक्षा बेहतर करने के तरीके ढूंढ रहे हैं। प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिकों ने जंगली किस्मों को भी देखा। बर्बानो उन प्रजातियों की ओर इशारा करते हैं जो एंडीज की पहाड़ी श्रृंखलाओं में अब भी मिलती हैं।

वहां आलू की कुल 151 किस्में ज्ञात हैं। वे सदियों से इंसान की भूख मिटाते-मिटाते आनुवंशिक विविधता खो देने वाले आलुओं के पूर्वज हैं। 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में वैज्ञानिकों ने मुख्यधारा के आलुओं के जीन्स को जंगली आलुओं के साथ मिलाना शुरू किया। वे पैदावार भी बढ़िया रखना चाहते थे, साथ ही प्रतिरोधी क्षमता भी सुधारना चाहते थे। आज उगने वाले ज्यादातर आलू ऐसे ही परीक्षणों के परिणाम हैं।

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जलवायु परिवर्तन
हाल के अध्ययन से पता चला है कि कार्बन का उत्सर्जन बढ़ने से 2085 ईस्वी तक आलू की वैश्विक पैदावार में 26 फीसदी की कमी आ सकती है। जंगली प्रजातियों के आनुवांशिक गुण ठंड, सूखा या तापमान में बढ़ोतरी जैसे हालात का सामना करने में सहायक हो सकते हैं।

यूरोप, अमरीका और एशिया के वैज्ञानिक वर्षों से ऐसे प्रतिरोधी क्षमता वाले आलू विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं। इन्हीं प्रयासों का फल है कि 20वीं सदी में आलू सच्चे मायनों में वैश्विक फसल बना। दुनिया के 20 सबसे बड़े आलू उत्पादकों में से केवल तीन (संयुक्त राज्य अमरीका, पेरू और ब्राजील) ही उस ऐतिहासिक श्रृंखला से जुड़े हैं।

लेकिन हर देश इससे अपना संबंध बना रहे हैं। चीन सरकार आलू को आक्रामक रूप से बढ़ावा दे रही है। वह इसे प्रमुख फसल और प्रमुख भोजन बनाना चाहती है। चीन के नेता 18वीं सदी के यूरोपीय कुलीन वर्ग की रणनीति अपना रहे हैं। वे सरकार के स्वामित्व वाली मीडिया, लोकप्रिय शख्सियतों और विज्ञान की लोकप्रिय पुस्तकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। भारत में आलू सैकड़ों तरह से तैयार किए जाते हैं और किसान यह मानने को तैयार नहीं होते कि यह स्थानीय फसल नहीं है।
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राष्ट्रीय गौरव
आलू को लेकर पेरू और चिली में एक होड़ भी मची है। दोनों देश आलू पर अपना दावा पेश करते हैं। पेरू का दावा है कि आलू की खेती सबसे पहले वहीं शुरू हुई। चिली के एक मंत्री ने 2008 में दावा किया था कि दुनिया में आलू की जितनी भी किस्में हैं उनमें से ज्यादातर चिली की हैं। इंटरनेशनल पोटैटो सेंटर के रिसर्चर चार्ल्स क्रिसमैन ने 2008 में न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे के एक लेख में लिखा था, "हजार साल पहले राष्ट्रीय-राज्यों की अवधारणा से पहले आलू की कहानी शुरू हो गई थी। लेकिन आलू की खेती सबसे पहले उस जगह शुरू हुई थी जहां आज का पेरू है।"

पेरू ने 1971 में इंटरनेशनल पोटैटो सेंटर बनाया और पहाड़ों पर रहने वाले स्वदेशी समुदायों के साथ मिलकर आलू की आनुवंशिक विरासत को संरक्षित किया। पेरू के एंडीज पहाड़ों पर कुस्को के पोटैटो पार्क में आलू का एक जिंदा संग्रहालय है।

यहां का प्राकृतिक वातावरण याद दिलाता है कि आलू कहां से आया और यह कहां जा सकता है। जिन किस्मों की खेती नहीं होती, उनके आनुवंशिक गुण इसके आगे का रास्ता तैयार कर सकते हैं, क्योंकि वे जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने में सक्षम हैं। कुस्को से दो घंटे की दूरी पर आलू के वर्तमान और भविष्य की नई तस्वीर दिखती है। 12 हजार फीट की ऊंचाई पर बने मिल रेस्तरां में आप पेरू के आलू की लगभग 5,000 प्रजातियों को चख सकते हैं।

फिर भी कुछ चीजें एंडीज के इन पहाड़ों पर नहीं मिलतीं। क्या वह भारतीय करी है? ईस्ट लंदन के पब में मिलने वाली मछली और चिप्स है? इदाहो के ओवन में ताजा ताजा निकलने वाला बेक्ड पोटैटो है?

आलू की वैश्विक बहुमुखी प्रतिभा को देखते हुए इसकी संभावनाएं अनंत हैं।
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