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बुजुर्गों के लिए मिलेगा थ्री डी खाना

Thu, 21 May 2020 09:31 AM IST
अपराजिता शुक्ला लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : Pixabay
बुजुर्गों को खाने का बहुत ख्याल रखना पड़ता है। हर चीज को नरम करके खाना पड़ता है। अब जिंदगी है तो जीनी ही पड़ेगी। ऐसे में बुजुर्गों को उनकी पसंद का खाना खिलाना, उन्हें खुश रखना, उनकी देखभाल करना नौजवानों की जिम्मेदारी है। और इसी जिम्मेदारी को रचनात्मक तरीके से निभा रही है जर्मनी की कंपनी बायोजून। ये कंपनी बुजुर्गों के लिए 3D प्रिटेंड खाना तैयार कर रही है। 3D प्रिंटेड खाने का नाम सुनकर हो गए ना आप भी हैरान। माजरा क्या है चलिए आपको बताते हैं। बायोजून नाम की कंपनी ने बुजुर्गों के लिए थ्री-डी तकनीक की मदद से खाना तैयार करने का फॉर्मूला तैयार किया है। यानी कंप्यूटर की मदद से बुज़ुर्गों की उम्र का ख्याल करते हुए मसाले और सभी पोषक तत्व सम्मिलित करके पहले खाने का एक ब्लू प्रिंट तैयार किया जाता है। फिर उन्हीं मसालों और सामग्री का इस्तेमाल करके रसोई में खाना तैयार होता है। मिसाल के लिए इस कंपनी ने 3D तकनीक से पहले गोभी से रोस्टेड चिकन जैसी ड्रम स्टिक की एक तस्वीर तैयार की और फिर इसे रसोई में तैयार किया।

 
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- फोटो : pixa
संतुलित भोजन
आखिर बुजुर्गों का भी तो मन करता ही होगा चिकन स्टिक खाने का। लेकिन ना तो चिकन स्टिक चबाने के लिए उनके मुंह में दांत होते हैं और ना ही उसे निगलने की क्षमता। यही नहीं चिकन का प्रोटीन पचाने की क्षमता उम्र बढ़ने के साथ काम हो जाती है। पर ब़ुजुर्ग साहेबान मायूस न हों। अब उनके लिए गोभी से बनी मगर चिकन ड्रम स्टिक के स्वाद वाला व्यंजन तैयार है। ये है तो गोभी का लेकिन स्वाद में चिकन ड्रमस्टिक से कम नहीं है। इस प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों की कोशिश है कि बुजुर्गों को अलग-अलग स्वाद वाले संतुलित भोजन मिलते रहें जिसे वो खुशी से खा सकें। इस दिशा में काम करने वालों को बहुत हद तक कामयाबी भी मिली है। बायोजून कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मैतियास क्युक का कहना है कि तजुर्बे के दौरान इस प्रोजेक्ट में हिस्सा लेने वाले बुजुर्गों का एक किलो 700 ग्राम तक वजन बढ़ गया था। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2050 तक दुनिया में हर छठवें इंसान की उम्र 65 साल होगी। यूरोप और अमरीका में तो हर चौथा इंसान 65 साल का होगा। 80 साल के बुजुर्गों की संख्या तो 2050 में लगभग 43 करोड़ होगी। जबकि, 2019 में दुनिया भर के कुल 80 साल या इससे ज्यादा उम्र वाले लोगों की संख्या
14 करोड़ से कुछ ही ज्यादा थी।

 
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- फोटो : Pixabay
बढ़ती उम्र के साथ
वर्ष 2050 तक सौ साल या इससे अधिक उम्र वाले बजुर्गों की संख्या तो 37 लाख तक पहुंच जाएगी। बढ़ती उम्र के साथ इंसान का पूरा शरीर कमजोर पड़ने लगता है। शरीर को सुचारु रूप से चलाने के लिए संतुलित भोजन खाना ही एक मात्र विकल्प है। बुजुर्ग चाहकर भी इस विकल्प का भरपूर इस्तेमाल नहीं कर सकते। 
2009 में बेल्जियम में की गई एक रिसर्च के मुताबिक 75-80 वर्ष की उम्र वाले बुजुर्गों को खाना निगलने में तकलीफ थी। बढ़ती उम्र के साथ बुजुर्गों में सूंघने की शक्ति भी कमजोर पड़ने लगती है। इस वजह से भी वो खाने की खूशबू महसूस नहीं कर पाते। तभी तो खाना देखने या सूंघने के बाद भी खाने का मन नहीं होता। इसी वजह से बुजुर्ग कुपोषण या बेवजह मोटापे का शिकार हो जाते हैं। फिर दवाओं के नकारात्मक प्रभाव भी अपनी जगह काम करते हैं। एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में यूरोप में 50 वर्ष के उम्र वाले कुल आबादी का पांचवां हिस्सा मोटापे का शिकार था। और अमरीका में यही आंकड़ा 30 फीसदी आबादी का था।

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- फोटो : Pixabay
मांसपेशियां मजबूत करने के लिए
बढ़ती उम्र के साथ वैसे भी हमारे खाने की आदतें बदलने लगती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि खाने की बदलती आदतें हमें ज्यादा बीमारियों की तरफ धकेल देती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार किसी भी बुजुर्ग के खाने में प्रोटीन, विटामिन, खास तौर से विटामिन-बी कॉम्पलेक्स और विटामिन-डी प्रचुर मात्रा में होना चाहिए। ये बुजुर्गों में हड्डियां और मांसपेशियां मजबूत करने के लिए जरूरी हैं। इसके अलावा, फाइबर, खनिज-लवण, ओमेगा-थ्री फैट भी उचित मात्रा में देना चाहिए। ज्यादा बेहतर प्रोटीन के लिए मछली और सीपदार मछली भी दी जा सकती है। यूरोपीय देशों में हुए एक अध्ययन पता चलता है कि अक्सर 64 या उससे ज्यादा उम्र का हर पांचवां इंसान विटामिन-डी, फ़ोलिक एसिड, कैल्शियम, आयोडीन और सेलेनियम लेता ही नहीं। बुजुर्ग वैसे भी एक छोटे बच्चे के समान होते हैं। उन्हें खाने के लिए मनाना और खिलाना दोनों ही एक चुनौती भरा काम है।



 
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- फोटो : pixa
थ्री-डी प्रिंटिंग में लाल रंग का इस्तेमाल
अब ऐसे में इन लोगों को पोषक तत्वों से भरपूर खाना कैसे खिलाया जाए। जानकार कहते हैं कि बुजुर्गों को अक्सर पतला खाना दिया जाता है जो देखने में एक जैसा लगता है। इसलिए जरूरी है कि खाना परोसने के अंदाज में बदलाव किया जाए। बायोजून कंपनी ने इसके लिए थ्री-डी प्रिंटिंग में लाल रंग का इस्तेमाल किया। और फिर जब खाना बनाया तो उसमें प्यूरी का इस्तेमाल करके वही रंग दिया। इससे वो व्यंजन दिलकश लगने लगा। स्वीडन में भी कुछ लोग थ्री-डी तकनीक के साथ बुजुर्गों के लिए खाना बनाने का काम कर रहे हैं। ये कंपनी ब्रॉकली, चिकन और रोटी को मिलाकर प्रोटीन का ऐसा मिक्सचर तैयार करते हैं, जिसे ओवन में गर्म करके खाया जा सकता है। एशिया में सिंगापुर पॉलीटेक्नीक और मेसी यूनिवर्सिटी ने मिलकर थ्री-डी चिकन राइस बनाया। इसमें ब्रॉकली प्यूरी का इस्तेमाल किया गया। इसी की मदद से चिकन ड्रमस्टिक भी तैयार की जो कि हरी, और सफेद रंग की थी। देखने में अच्छी लग रही थी। 3D तकनीक से कई कंपनियां बुजुर्गों के लिए दुनिया के मशहूर पकवान तैयार कर रही हैं। हालांकि अभी ये सभी प्रयास शुरुआती दौर में हैं। कोशिश की जा रही है कि इसे कामयाबी के साथ बाजार में उतारा जाए। ताकि ज्यादा से ज्यादा बुजुर्गों को उनकी पसंद और जरुरी पोषक तत्वों से भरपूर खाना मिलता रहे। साथ ही खाने की पैकेजिंग पर खास ध्यान दिया जा रहा है। ताकि अकेले रहने वाले बुज़ुर्ग भी आसानी से खाना गर्म करके खा सकें।
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