अगर इस दुनिया में चॉकलेट न रहे तो? चॉकलेट को पसंद करने वालों की शायद दुनिया ही बदल जाए। जिंदगी में खुशियों के हजारों मौकों पर चॉकलेट की मौजूदगी स्वाद के साथ-साथ दोस्ती की उस संस्कृति में मिठास घोलती रही है, जिसकी हमेशा जरूरत रही है लेकिन बिगड़ते पर्यावरण को देखते हुए विशेषज्ञ मानने लगे हैं कि चॉकलेट के पौधों पर खतरा मंडरा रहा है।
विज्ञापन
2 of 4
chocolate
चॉकलेट उन चुनिंदा खाद्य पदार्थों में शुमार है, जो सारी दुनिया में इतने बड़े स्तर पर खाई और पसंद की जाती है। त्योहारों और खास मौकों में मिठास घोलने के लिए इसका इस्तेमाल अलग-अलग तरीकों से किया जाता है। कहीं-कहीं तो कुछ परंपराएं और त्योहार सिर्फ चॉकलेट के चारों ओर सिमटे हुए हैं, लेकिन लोगों की पसंदीदा चॉकलेट के लिए एक बुरी खबर है। एक अनुमान के मुताबिक, अगले 30 सालों में चॉकलेट के पौधों के अनुकूल पर्यावरण नहीं बचेगा।
आज के हालातों को देखते हुए यह माना जा रहा है कि चॉकलेट के सर्वाधिक उत्पादन वाले मुख्य भागों में तापमान चॉकलेट की पैदावार के लिए जरूरी तापमान से अधिक हो जाएगा और साथ ही इन इलाकों को सूखा भी झेलना पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन कारणों से अगले तीस वर्षो में चॉकलेट की फसलों को फलने-फूलने के लिए के लिए अनुकूल पर्यावरण नहीं होगा। केकाओ पेड़ से कोको बींस मिलती हैं, जिससे चॉकलेट बनाई जाती है। ये केवल ह्यूमिड वर्षा वनों में उगाए जा सकते हैं।
विज्ञापन
3 of 4
chocolate
तेजी से बदलते पर्यावरण के कारण पैदा होती बीमारियों और मिट्टी में कम होती नमी के कारण 2050 तक कई हिस्सों में इनकी खेती लगभग नामुमकिन हो जाएगी। अभी दो दक्षिण अफ्रीकी देश आइवरी कोस्ट और घाना दुनिया का आधे से ज्यादा कोकोआ उगाते हैं।
अनुमान के अनुसार, इन देशों को भी गर्म तापमान और सूखे की मार झेलनी पड़ेगी। ऐसी स्थिति में किसानों को इसकी खेती के लिए ऊंचें स्थानों की ओर जाना पड़ेगा। लेकिन यह जगह भी सीमित है और यहां अधिकांश ऊंचे स्थान जंगली जानवरों के लिए संरक्षित हैं। पहले ही चॉकलेट की भारी मांग पूरी करना मुश्किल है। यूरोप, दक्षिण और उत्तर अमेरिका की ही तरह अब एशिया में भी चॉकलेट की मांग पिछले कुछ सालों में काफी बढ़ी है।
हार्डमैन एग्रिबिजनेस फर्म के प्रमुख डग हॉकिंग्स का कहना है कि अधिकांश कोको की पैदावार गरीब किसान करते हैं, जो खाद और कीटनाशक खरीदने में सक्षम नहीं हैं। डग के अनुसार, ये सभी घटक इस ओर इशारा कर रहे हैं कि कुछ ही सालों में हम चॉकलेट की पैदावार में हर साल 100,000 टन की कमी देखेंगे।
आधुनिक खेती की तकनीकें ही सिर्फ चॉकलेट की खेती को बचा सकती हैं, लेकिन ये कितनी कारगर होंगी, यह समय के साथ ही पता लगाया जा सकता है। चॉकलेट की बड़ी कंपनी मार्स द्वारा वैज्ञानिकों को इस समस्या का समाधान निकालने के लिए एक बड़ी धनराशि दी गई। इन वैज्ञानिकों ने केकाओ पेड़ों का एक जेनेटिक कोड खोज निकाला है। अब ये वैज्ञानिक एक ऐसे जेनेटिकली मोडिफाइड कृत्रिम हाईब्रिड को बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जो गर्म और खुश्क मौसम में भी अच्छी क्वालिटी की कोको पैदा कर सकें।