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World Pneumonia Day 2025: हर साल लाखों मासूमों की जान ले रही है निमोनिया, इन लक्षणों पर दें गंभीरता से ध्यान

Wed, 12 Nov 2025 10:04 AM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • मेडिकल रिपोर्ट्स के मुताबिक निमोनिया दुनियाभर में बच्चों की मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक बना हुआ है। रोकथाम और उपचार की उपलब्धता के बावजूद यह हर साल किसी भी अन्य संक्रामक रोग की तुलना में सबसे ज्यादा बच्चों की जान लेता है।
     
  • निमोनिया फेफड़ों का गंभीर  संक्रमण है, जो वायरस, बैक्टीरिया या फंगस से होता है। इससे बच्चे को तेज बुखार, खांसी, सांस लेने में दिक्कत, और सीने में दर्द जैसी समस्याएं होती हैं।
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बच्चे - फोटो : Freepik.com
हाल के वर्षों में कई प्रकार की घातक बीमारियों का खतरा बच्चों में भी तेजी से बढ़ता हुआ देखा गया है। मेडिकल साइंस की प्रगति और प्रभावी उपचारों के चलते पहले की तुलना में अब बाल मृत्यु दर में कमी तो आई है पर कुछ बीमारियां अब भी गंभीर चिंता का कारण बनी हुई हैं। बच्चों में निमोनिया की समस्या उनमें से एक है।

मेडिकल रिपोर्ट्स के मुताबिक निमोनिया दुनियाभर में बच्चों की मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक बना हुआ है। रोकथाम और उपचार की उपलब्धता के बावजूद यह हर साल किसी भी अन्य संक्रामक रोग की तुलना में सबसे ज्यादा बच्चों की जान लेता है।

यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार, निमोनिया से हर साल पांच वर्ष से कम उम्र के 7 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत हो जाती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ सभी लोगों को इस बीमारी से बच्चों को बचाए रखने के उपाय करते रहने के लिए माता-पिता को सावधान करते हैं।निमोनिया के खिलाफ लड़ाई में दुनिया को एक वार्षिक मंच प्रदान करने के उद्देश्य से हर साल 12 नवंबर को वर्ल्ड निमोनिया डे मनाया जाता है।
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निमोनिया की समस्या - फोटो : Adobe Stock
बच्चों में निमोनिया का खतरा

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल दुनिया भर में 50 लाख से अधिक बच्चे पांच वर्ष की आयु से पहले ही बीमारियों के कारण अपनी जान गंवा देते हैं, जिनमें सबसे बड़ा कारण निमोनिया है। भारत भी इस चिंता से अछूता नहीं है।

डॉक्टर कहते हैं, बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं होती, जिससे वे संक्रमणों का शिकार जल्दी बन जाते हैं। बदलती जलवायु, बढ़ता वायु प्रदूषण, असंतुलित आहार और अस्वच्छ वातावरण इस समस्या को और गहरा रहे हैं। बड़े शहरों में वायु प्रदूषण का स्तर बच्चों के फेफड़ों के लिए बेहद हानिकारक साबित हो रहा है।
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निमोनिया के कारण होने वाली दिक्कतें - फोटो : Freepik.com
बच्चों में निमोनिया और इसका जोखिम

निमोनिया फेफड़ों का एक गंभीर संक्रमण है, जो वायरस, बैक्टीरिया या फंगस तीनों के कारण हो सकता है। इससे बच्चे को तेज बुखार, खांसी, सांस लेने में दिक्कत, और सीने में दर्द जैसी समस्याएं होती हैं। अगर समय पर इलाज न मिले, तो यह ऑक्सीजन की कमी और फेफड़ों के फेल होने का कारण बन सकता है।

डॉक्टर्स का कहना है कि ठंड के मौसम में निमोनिया के मामले सबसे ज्यादा बढ़ते हैं। छोटे बच्चे, कुपोषित बच्चे या जिनकी इम्युनिटी कमजोर है, उनमें यह खतरा कई गुना बढ़ जाता है। भारत में अभी भी कई परिवार ऐसे हैं जहां बच्चे का टीकाकरण अधूरा रहता है, जिससे संक्रमण का खतरा और बढ़ जाता है।

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निमोनिया और इसके लक्षण - फोटो : Freepik.com
निमोनिया के लक्षणों के बारे में जानिए

निमोनिया के लक्षण, संक्रमण के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं। 5 साल से कम उम्र के बच्चों में तेज सांस लेने या घरघराहट की दिक्कत हो सकती है। चूंकि यह फेफड़ों को प्रभावित करने वाली स्थिति है ऐसे में इसमें सांस की दिक्कत होना सबसे आम लक्षण है।
  • बलगम के साथ खांसी और बुखार की दिक्कत।
  • सांस की तकलीफ जो सामान्य गतिविधियों को करते समय अधिक होती है।
  • सीने में दर्द जो सांस लेने या खांसने पर और बढ़ जाता है।
  • थकान और भूख कम लगना।
  • मतली या उल्टी। 
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बच्चों को निमोनिया से कैसे बचाएं - फोटो : Freepik.com
निमोनिया का इलाज और बचाव के तरीके

निमोनिया के लक्षणों की स्थिति में ब्लड टेस्ट, छाती के एक्स-रे की मदद से इसकी पुष्टि की जाती है। निमोनिया के कारणों के आधार पर इसका इलाज होता है। अगर यह बैक्टीरियल संक्रमण के कारण है तो इसमें एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा निमोनिया के लक्षणों को कम करने के लिए कुछ घरेलू उपचार विधियों जैसे गरारे, गुनगुना पानी पीने से भी लाभ मिल सकता है।

निमोनिया से बचाव के लिए टीके उपलब्ध हैं। इसके अलावा जीवनशैली को ठीक रखकर भी आप इसके जोखिम को कम कर सकते हैं। बच्चे को साफ-सुथरा और प्रदूषण से मुक्त वातावरण में रखना चाहिए। इसके अलावा बच्चों को स्तनपान कराती रहें जिससे उनके शरीर को पौष्टिक तत्व प्राप्त हों। ठंड के दिनों में बच्चों को सुरक्षित रखना और भी जरूरी हो जाता है।



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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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