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World IVF Day 2026: इनफर्टिलिटी ने बढ़ा दी है आईवीएफ की मांग, पर आईसीएसआई क्या है जानते हैं आप?

Sat, 25 Jul 2026 04:44 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

हाल के वर्षों में भारत में भी आईवीएफ की मांग तेजी से बढ़ी है। इसके पीछे केवल बांझपन ही नहीं, बल्कि देर से शादी, करियर प्राथमिकता, बढ़ती उम्र में परिवार शुरू करना, कैंसर उपचार के बाद प्रजनन क्षमता की समस्या और पुरुष बांझपन जैसे कारण भी शामिल हैं।
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आईवीएफ और आईसीएसआई - फोटो : Amarujala.com/AI
माता-पिता बनना दुनिया के सबसे खूबसूरत एहसासों में से एक है। हालांकि जिस तरह से लोगों की जीवनशैली-खानपान गड़बड़ होती जा रही है, पर्यावरण में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है इन सभी का असर लोगों के इस खूबसूरत सपने पर स्पष्ट तौर पर देखा जा रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में करोड़ों लोग किसी न किसी रूप में इनफर्टिलिटी की समस्या से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती उम्र, मोटापा, धूम्रपान-शराब की आदत और तनाव ने इस खतरे को और भी बढ़ा दिया है। लिहाजा लोगों के लिए प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करना कठिन होता जा रहा है। 

इनफर्टिलिटी की बढ़ती समस्याओं के बीच इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) की मांग तेजी से बढ़ती जा रही है। आईवीएफ ऐसी चिकित्सा प्रक्रिया है जिसमें महिला के अंडे और पुरुष के शुक्राणु को शरीर के बाहर प्रयोगशाला में मिलाया जाता है। यह बांझपन से पीड़ित दंपतियों को गर्भधारण करने में मदद करती है।

आईवीएफ ने दुनियाभर में लाखों कपल्स को नई उम्मीद दी है। पर क्या आप जानते हैं कि जहां आईवीएफ से लाभ नहीं मिलता है वहां इंट्रासाइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजेक्शन (आईसीएसआई) की मदद ली जाती है? आइए इस बारे में विस्तार से समझते हैं।
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आवीएफ की प्रक्रिया - फोटो : Adobe Stock
भारत में बढ़ती आईवीएफ की मांग

साल 1978 में इन विट्रो फर्टिलाइजेशन से पैदा हुई पहली बच्ची, लुईस ब्राउन के जन्म की याद में हर साल 25 जुलाई को 'वर्ल्ड आईवीएफ डे' मनाया जाता है। यह दिन विज्ञान, मेडिकल टीमों और परिवारों के योगदान का सम्मान करता है। अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट में हमने विशेषज्ञ की सलाह के आधार पर बताया था कि आईवीएफ की जरूरत कब पड़ती है और किन कपल्स के लिए ये मददगार है?

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, हाल के वर्षों में भारत में भी आईवीएफ की मांग तेजी से बढ़ी है। इसके पीछे केवल बांझपन ही नहीं, बल्कि देर से शादी, करियर की प्राथमिकता, बढ़ती उम्र में परिवार शुरू करना और पुरुषों में बढ़ता बांझपन प्रमुख कारण हैं।

हालांकि आईवीएफ और आईसीएसआई को अक्सर एक ही तकनीक समझ लिया जाता है, जबकि दोनों का तरीका अलग होता है।
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आईवीएफ से गर्भधारण - फोटो : Adobe Stock
पहले जानिए आईवीएफ की जरूरत कब पड़ती है? 

डॉक्टर कहते हैं, यदि 35 वर्ष से कम उम्र के दंपती यदि एक वर्ष तक नियमित असुरक्षित यौन संबंध के बाद भी गर्भधारण नहीं कर पाते तो विशेषज्ञ से जांच कराना जरूरी हो जाती है। 
 
  • डॉक्टर दवाइयां, ओव्यूलेशन इंडक्शन जैसी तकनीकों की मदद से गर्भधारण की प्रक्रिया को आसान बनाते हैं हालांकिे जब ये तरीके सफल नहीं होते या समस्या गंभीर होती है, तब आईवीएफ की सलाह दी जाती है।
  • आईवीएफ में महिला के अंडाणुओं और पुरुष के शुक्राणुओं का निषेचन शरीर के बाहर नियंत्रित प्रयोगशाला वातावरण में कराया जाता है। 
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आईसीएसआई के बारे में जान लीजिए - फोटो : Adobe Stock
आईसीएसआई क्या है? 

डॉक्टर कहते हैं, आईसीएसआई को आईवीएफ की ही एक उन्नत तकनीक है। इसमें माइक्रोस्कोप और विशेष माइक्रोमैनिपुलेटर की सहायता से शुक्राणुओं में से एक स्वस्थ शुक्राणु को चुनकर सीधे अंडाणु के साइटोप्लाज्म में इंजेक्ट किया जाता है। इस तकनीक का इस्तेमाल पुरुषों में बांझपन की स्थिति में किया जाता है। 

डॉक्टर कहते हैं, आईवीएफ और आईसीएसआई वैसे तो दोनों एक ही हैं लेकिन इनकी निषेचन की प्रक्रिया में अंतर है।
 
  • आईवीएफ में अंडाणु और हजारों शुक्राणुओं को एक साथ रखा जाता है। इनमें से सबसे सक्षम शुक्राणु स्वयं अंडाणु में प्रवेश कर निषेचन करता है।
  •  दूसरी ओर आईसीएसआई में विशेषज्ञ केवल एक स्वस्थ शुक्राणु चुनकर उसे सीधे अंडाणु के भीतर इंजेक्ट करते हैं। इसलिए आईसीएसआई विशेष रूप से पुरुष बांझपन के मामलों में उपयोगी मानी जाती है।
  • यदि पुरुष के शुक्राणु सामान्य हैं और समस्या मुख्य रूप से महिला से जुड़ी है, तो पारंपरिक आईवीएफ पर्याप्त हो सकता है।


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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें। 
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