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World Hemophilia Day 2026: मामूली सी चोट भी बन सकती है जानलेवा, हीमोफीलिया का शिकार हैं तो हो जाएं सावधान

Fri, 17 Apr 2026 08:03 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

World Hemophilia Day 2026: हीमोफीलिया एक दुर्लभ लेकिन गंभीर आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें खून का थक्का बनने की प्रक्रिया सही तरीके से नहीं होती। इस बीमारी के कारण कई बार बहुत ज्यादा खून बह जाता है जोकि जानलेवा तक हो सकता है।
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हीमोफीलिया की समस्या - फोटो : Amarujala.com/AI
आपने भी महसूस किया होगा कि जैसे ही चोट लगती है या फिर शरीर में कहीं कट जाए तो तुरंत खून निकलना शुरू हो जाता है। हालांकि छोटी चोट या कट में खून का ये बहाव कुछ समय में कम या बंद भी हो जाता है। ये हमारे शरीर का मैकेनिज्म है, पर क्या हो अगर खून बहना बंद ही न हो?

ये छोटा सा अंतर आपके लिए जानलेवा तक हो सकता है। हीमोफीलिया ऐसी ही समस्या है जिसमें रक्तस्राव को कंट्रोल करना बहुत मुश्किल हो जाता है।

हीमोफीलिया की समस्या में शरीर का ब्लड क्लॉटिंग सिस्टम ठीक से काम नहीं करता। इस बीमारी के कारण खून का थक्का नहीं बन पाता जिससे खून बहता ही रहता है। इसके शिकार लोगों में छोटी-छोटी चोटें भी गंभीर रूप ले सकती हैं।

हीमोफीलिया की समस्या अक्सर जन्मजात होती है, ये एक प्रकार का खून से संबंधित रोग है जिसके बारे में जानना और खतरे को समझना बहुत जरूरी है।


(ये भी पढ़िए- क्यों बनता है ब्रेन में क्लॉट, क्या हैं इससे खतरे? पूर्व क्रिकेटर विनोद कांबली हो गए हैं शिकार)
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खून की समस्या - फोटो : Adobe Stock
इस ब्लीडिंग डिसऑर्डर के बारे में दुनिया भर में जागरूकता फैलाने और लोगों को सावधान करने के लिए हर साल 17 अप्रैल को वर्ल्ड हीमोफीलिया डे मनाया जाता है। इस साल 2026 की थीम है- समय पर समस्या का पता चलना, देखभाल की ओर पहला कदम।

कई बार लोगों में ये बीमारी तो होती है पर इसका तब तक पता नहीं चल पाता जब तक उन्हें कोई चोट न लगी हो या भारी मात्रा में ब्लीडिंग न हुई हो। खास बात यह है कि यह बीमारी ज्यादातर पुरुषों में पाई जाती है, महिलाओं में इसके मामले कम देखे जाते हैं।


हीमोफीलिया की समस्या के बारे में जान लीजिए

सामान्यतः जब शरीर में चोट लगती है, तो खून में मौजूद क्लॉटिंग फैक्टर्स यानी कुछ प्रकार के प्रोटीन मिलकर ज्यादा खून बहने से रोकते हैं। लेकिन हीमोफीलिया में ये फैक्टर्स या तो कम होते हैं या ठीक से काम नहीं करते।
 
  • हीमोफीलिया मुख्य रूप से आनुवंशिक कारणों से होती है। यह बीमारी X-क्रोमोसोम से जुड़ी होती है।
  • पुरुषों में केवल एक X-क्रोमोसोम होता है, इसलिए यदि उसमें खराब जीन हो, तो इस बीमारी का खतरा बढ़ जाता है।
  • महिलाओं में दो X-क्रोमोसोम होते हैं, इसलिए यदि एक में खराबी हो, तो दूसरा सामान्य जीन उसकी भरपाई कर देता है। इसी कारण महिलाओं में ये दिक्कत कम होती है।

हीमोफीलिया के कारण आपमें इंटरनल ब्लीडिंग का भी खतरा हो सकता है। ऐसी स्थिति में आपके अंगों और ऊतकों को नुकसान पहुच सकता है जिस जानलेवा भी माना जाता है।
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खून से संबंधित बीमारियों का खतरा - फोटो : Adobe Stock Images
कैसे जानें कहीं आपको ये बीमारी तो नहीं?

हीमोफीलिया के लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं, यह आपके क्लॉटिंग फैक्टर के स्तर पर निर्भर करता है। अगर आपके क्लॉटिंग फैक्टर का स्तर थोड़ा कम है, तो आपको सर्जरी या चोट के बाद ब्लीडिंi की दिक्कत होती है। वहीं अगर आपकी समस्या गंभीर है, तो आपको बिना किसी वजह के भी ब्लीडिंग की दिक्कत हो सकती है। हीमोफीलिया के संकेतों पर गंभीरता से ध्यान दिया जाना चाहिए।
 
  • कटने-चोट लगने या सर्जरी के बाद बहुत ज्यादा खून बहना।
  • शरीर पर कई बड़े या गहरे नीले निशान दिखाई देना।
  • टीका लगवाने के बाद असामान्य रूप से खून बहना
  • जोड़ों में दर्द, सूजन या अकड़न होना
  • पेशाब या शौच से खून आना
  • बिना किसी कारण के नाक से खून बहना

जिन लोगों को गंभीर हीमोफीलिया की समस्या होती है, उनके सिर में हल्की सी चोट लगने से भी दिमाग में ब्लीडिंग का खतरा हो सकता है। ऐसी स्थिति में लंबे समय तक रहने वाला सिरदर्द, बार-बार उल्टी होने, डबल विजन, अचानक कमजोरी जैसी दिक्कतें भी हो सकती हैं।
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हीमोफीलिया का खतरा कैसे कम करें? - फोटो : Adobe stock
हीमोफीलिया से कैसे बचें?

हीमोफीलिया एक आनुवंशिक बीमारी है, इसलिए इसे पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन इसके जोखिम को कम किया जा सकता है।
 
  • यदि परिवार में किसी को हीमोफीलिया रही है तो डॉक्टर से सलाह लेकर जांच जरूर करा लें। 
  • प्रेग्नेंसी से पहले जेनेटिक काउंसलिंग कराएं। इससे यह पता चलता है कि बच्चे में इस बीमारी का खतरा कितना है।
  • ऐसे मरीजों को चोट से बचाव करना चाहिए। 
  • डॉक्टर की सलाह से नियमित रूप से क्लॉटिंग फैक्टर थेरेपी लेना जरूरी होता है, जिससे ब्लीडिंग कंट्रोल में रहती है।
  • दांतों और शरीर की सफाई का खास ध्यान रखना चाहिए, ताकि किसी तरह की ब्लीडिंग न हो। 
  • एस्पिरिन जैसी दवाइयों से बचना चाहिए जो खून को पतला करती हैं और ब्लीडिंग बढ़ा सकती हैं।



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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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