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World Heart Day: क्या 1 साल से कम उम्र के बच्चों को भी हो सकती है हृदय की बीमारी? कैसे करें इसकी पहचान

Mon, 29 Sep 2025 11:30 AM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • शोध बताते हैं कि हर 1000 नवजातों में लगभग 8-10 बच्चे जन्मजात हृदय दोष के साथ पैदा होते हैं। इसका मतलब है कि लाखों बच्चे जन्म से ही दिल की समस्या के खतरे में हैं। 
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बच्चों में हृदय रोगों का बढ़ता खतरा - फोटो : Freepik.com
Heart Disease: हृदय की बीमारियां दुनियाभर में तेजी से बढ़ती जा रही हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, आनुवांशिक विकारों के साथ लाइफस्टाइल और खान-पान में गड़बड़ी इन बीमारियों का कारण बनती है। आमतौर लोग सोचते हैं कि हृदय रोग केवल बड़ों को होने वाली समस्या है, लेकिन अब यह छोटे बच्चों और नवजात शिशुओं में भी देखी जा रही है। ऐसे में सवाल ये है कि क्या एक साल से कम उम्र के शिशु भी इसका शिकार हो सकते हैं? क्या बच्चों में भी हृदय रोगों का खतरा रहता है?

शोध बताते हैं कि हर 1000 नवजातों में लगभग 8-10 बच्चे जन्मजात हृदय दोष के साथ पैदा होते हैं। इसका मतलब है कि लाखों बच्चे जन्म से ही दिल की समस्या के खतरे में हैं।  दिल की बीमारी सिर्फ जन्मजात नहीं होती, बल्कि कुछ बच्चों में यह बाद में भी किसी संक्रमण या इम्यून प्रतिक्रिया के कारण हो सकती है। 

हृदय संबंधी रोगों (सीवीडी) के बारे में वैश्विक जागरूकता बढ़ाने और बेहतर खानपान-व्यायाम के माध्यम से हृदय स्वास्थ्य को ठीक रखने के उद्देश्य से हर साल 29 सितंबर को वर्ल्ड हार्ट डे (विश्व हृदय दिवस) मनाया जाता है।

आइए जानते हैं कि एक साल से कम उम्र के बच्चों में दिल की बीमारियां क्यों होती हैं और किन बच्चों में इसका खतरा अधिक होता है?
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शिशुओं में हार्ट की बीमारी - फोटो : Freepik.com
बच्चों में दिल की बीमारियां

हृदय रोग विशेषज्ञ कहते हैं, बच्चों में हृदय रोग के मुख्य कारणों में जन्मजात दोष, वायरल संक्रमण, रूमेटिक हार्ट डिजीज जैसी समस्याएं शामिल हैं। शोध बताते हैं कि जिन बच्चों में डाउन सिंड्रोम की समस्या होती है ऐसे लगभग 40-50% बच्चों में कोई न कोई हृदय दोष होने का खतरा अधिक हो सकता है। रूमेटिक हार्ट डिजीज भी भारत में एक बड़ी चुनौती है।

बच्चों में जन्मजात हृदय रोग के बारे में जानना जरूरी है।
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बच्चों में दिल की बीमारियां - फोटो : Freepik.com
जन्मजात हृदय दोष का खतरा

जन्मजात हृदय रोग वह स्थिति है जब बच्चे का दिल जन्म से ही पूरी तरह सामान्य रूप से विकसित नहीं होता। इसमें दिल की संरचना जैसे दिल की दीवारें, वाल्व या रक्त वाहिकाएं प्रभावित हो सकती हैं। जिन परिवारों में पहले से किसी को जन्मजात हृदय रोग रहा है उनमें बच्चे में भी इसका जोखिम बढ़ जाता है।

गर्भावस्था के दौरान मां को डायबिटीज, रूबेला जैसी वायरल इंफेक्शन या थायरॉयड जैसी बीमारियां हों तो भी यह खतरा सकता है। इतना ही नहीं गर्भावस्था में अल्कोहल, धूम्रपान या हानिकारक दवाओं का सेवन भी शिशु के दिल की संरचना को प्रभावित कर सकता है।

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हृदय से संबंधित समस्याएं - फोटो : Adobe stock photos
बच्चों के दिल में छेद की समस्या

आपने भी अपने आस-पास के किसी न किसी बच्चे के दिल में छेद होने की समस्या के बारे में जरूर सुना होगा। ये दिक्कत दुनियाभर के बच्चों में देखी जा रही है। आंकड़े बताते हैं कि देश में हर घंटे दिल में छेद की समस्या के साथ करीब चार बच्चे जन्म ले रहे हैं। 

दिल में छेद होने की समस्या को मेडिकल की भाषा में वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट (वीएसडी) के नाम से जाना जाता है। ये एक जन्मजात दोष है जिसके कारण हृदय के लोवर चैंबर (निचले कक्षों) के बीच असामान्य रूप से ओपनिंग (सामान्य बोलचाल की भाषा में छेद) हो जाती है। यह शिशुओं में सबसे आम हृदय दोष है।
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बच्चों के दिल की जांच कराएं - फोटो : Freepik.com
कैसे जानें आपका बच्चा भी तो नहीं है शिकार?

डॉक्टर बताते हैं, बच्चों में दिल की बीमारियों के कुछ शुरुआती संकेत होते हैं जिनपर माता-पिता को गंभीरता से ध्यान देते रहना चाहिए।

दूध पीते समय जल्दी थक जाना या बहुत अधिक सांस फूलना, बच्चों के होंठ या नाखून नीला होना, बार-बार छाती में इंफेक्शन की समस्या के अलावा खेल-कूद के दौरान बच्चों का कुछ ही मिनटों में थक जाना या अक्सर बेहोशी होना संकेत हो सकता है बच्चों के दिल में कोई समस्या है।

बच्चों में इस तरह की किसी भी जोखिमों को कम करने के लिए गर्भावस्था में सावधानी और नियमित चेकअप जरूरी है। जिन लोगों के परिवार में पहले से किसी को ये दिक्कत रही है उन्हें और भी सावधानी बरतनी चाहिए।



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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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