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जानना जरूरी: टाइप-1 और टाइप-2 के बाद क्या है टाइप-3 सी डायबिटीज? कहीं आप भी तो नहीं हैं शिकार

Thu, 15 Oct 2026 02:30 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

What Is Type 3C Diabetes: टाइप-3 सी डायबिटीज पैंक्रियाज को नुकसान पहुंचने के कारण होती है। लंबे समय तक सूजन, पैंक्रियाज के कैंसर या सर्जरी के कारण ये परेशानी बढ़ सकती है। क्या आपको टाइप-3 सी डायबिटीज के बारे में जानकारी है?
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डायबिटीज की समस्या - फोटो : Amarujala.com/AI
डायबिटीज गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, जो पूरे शरीर को प्रभावित करने वाली हो सकती है। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सभी इसका शिकार देखे जा रहे हैं। इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन के अनुसार, दुनियाभर में 20-79 वर्ष की आयु के लगभग 58.9 करोड़ वयस्क डायबिटीज का शिकार हैं।

डायबिटीज का नाम आते ही सबसे पहले हमारे दिमाग में टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज का ख्याल आता है। अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट में हमने डायबिटीज लाडा 1.5 के बारे में बताया था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि डायबिटीज का एक प्रकार टाइप-3 सी भी है?

टाइप-3सी डायबिटीज को कई बार टाइप-2 डायबिटीज समझ लिया जाता है, जिससे इसके सही पहचान और इलाज में देरी हो सकती है। आइए जानते हैं कि टाइप-3 सी डायबिटीज क्यों होती है, इसके लक्षण क्या हैं और इससे सेहत को किस तरह के नुकसान हो सकते हैं?
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डायबिटीज की समस्या - फोटो : Adobe Stock
मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि टाइप-3 सी डायबिटीज अग्न्याशय (पैंक्रियाज) में होने वाली दिक्कतों के कारण हो सकती है। पैंक्रियाज शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो इंसुलिन बनाने के साथ पाचन में मदद करने वाले एंजाइम भी बनाता है। इंसुलिन हार्मोन ब्लड शुगर यानी खून में ग्लूकोज के स्तर को नियंत्रित करता है।

जब पैंक्रियाज किसी बीमारी, इंजरी या सर्जरी के कारण ठीक से काम नहीं कर पाता, तो शरीर में इंसुलिन की कमी हो सकती है और ब्लड शुगर बढ़ने लगता है। ये स्थिति टाइप-3सी डायबिटीज का खतरा बढ़ाने वाली हो सकती है।

टाइप-3 सी डायबिटीज कैसे अलग है?

डायबिटीज के कारण शरीर में ब्लड शुगर का स्तर बढ़ जाता है। 
 
  • टाइप-1 डायबिटीज में इम्यून सिस्टम गलती से इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने लगता है।
  • जबकि टाइप-2 डायबिटीज में शरीर इंसुलिन का सही इस्तेमाल नहीं कर पाता या पर्याप्त इंसुलिन नहीं बनता। 
  • गर्भावस्था के दौरान होने वाली डायबिटीज को जेस्टेशनल डायबिटीज कहते हैं।
  • वहीं टाइप-3 सी डायबिटीज को पैंक्रियाज से जुड़ी बीमारी के कारण होने वाला डायबिटीज कहा जाता है। इसमें पैंक्रियाज को नुकसान पहुंचने से इंसुलिन का उत्पादन कम हो सकता है साथ ही, पाचन के लिए जरूरी एंजाइमों का उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है। इसी वजह से इसमें ब्लड शुगर के साथ पाचन संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं। 
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पैंक्रियाज की समस्याएं - फोटो : Amarujala.com/AI
टाइप-3 सी डायबिटीज क्यों होती है?

टाइप-3 सी डायबिटीज का मुख्य कारण पैंक्रियाज में होने वाली दिक्कतों या किसी डैमेज को माना जाता है।  इसके पीछे कई बीमारियां और कारण हो सकते हैं।
 
  • पैंक्रियाटाइटिस वाले लोगों में भी टाइप 3सी का खतरा हो सकता है। इसमें पैंक्रियाज में सूजन रहने के कारण कोशिकाओं को नुकसान पहुंचने लगता है।
  • पैंक्रियाज में कैंसर के कारण  इंसुलिन बनाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
  • बीमारी या किसी अन्य कारण से पैंक्रियाज का कुछ हिस्सा या पूरा अंग निकालने के बाद भी डायबिटीज होने का खतरा रहता है।
  • सिस्टिक फाइब्रोसिस और हीमोक्रोमैटोसिस जैसी स्थितियां भी पैंक्रियाज को प्रभावित करके डायबिटीज का खतरा बढ़ाने वाली हो सकती हैं।
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डायबिटीज के कारण होने वाली दिक्कतें - फोटो : Adobe stock
टाइप-3 सी डायबिटीज की पहचान क्या है?

टाइप-3 सी डायबिटीज में भी डायबिटीज के सामान्य लक्षणों के साथ पाचन संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं। अगर आपको पहले से पैंक्रियाज में सूजन रही है और अब ब्लड शुगर बढ़ने के साथ वजन घट रहा है या पाचन की समस्या हो रही है, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है। 
 
  • बार-बार प्यास लगना और पेशाब आना।
  • थकान और कमजोरी महसूस होना।
  • बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन कम होना।
  •  पेट में दर्द, गैस और पेट फूलने की समस्या।
  •  बार-बार दस्त होना।
  •  ब्लड शुगर का कम हो जाना (हाइपोग्लाइसीमिया)

इससे क्या समस्याएं हो सकती हैं और इलाज कैसे होता है?

टाइप-3 सी डायबिटीज में ब्लड शुगर को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है। पैंक्रियाज से इंसुलिन के अलावा ग्लूकागॉन हार्मोन का उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है। ग्लूकागॉन ब्लड शुगर बहुत कम होने पर उसे बढ़ाने में मदद करता है। इसकी कमी और पाचन संबंधी दिक्कतों के कारण शुगर का स्तर ऊपर-नीचे हो सकता है।
 
  • लंबे समय तक ब्लड शुगर नियंत्रित न रहने पर आंखों, किडनी, नसों और हृदय को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। पोषक तत्वों का सही अवशोषण न होने से वजन और पोषण की समस्या भी हो सकती है।


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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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