Women Health Tips: पीएमओएस यानी पॉलीएंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवेरियन सिंड्रोम महिलाओं से जुड़ी एक हार्मोनल और मेटाबॉलिक स्थिति है। इसे पहले पीसीओएस यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम के नाम से जाना जाता था। पीएमओएस को समझने में एलएच और एफएसएच जैसे हार्मोन की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। ये दोनों हार्मोन महिलाओं के मासिक धर्म चक्र, अंडाशय में फॉलिकल्स के विकास और ओव्यूलेशन यानी अंडे के रिलीज होने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाते हैं।
पीएमओएस से जूझ रही कुछ महिलाओं में एलएच और एफएसएच के स्तर में बदलाव देखा जा सकता है। हालांकि, केवल एलएच या एफएसएच की रिपोर्ट के आधार पर पीएमओएस का पता नहीं लगाया जाता है। ऐसे में महिलाओं के लिए यह समझना जरूरी है कि एलएच और एफएसएच क्या हैं, शरीर में इनका क्या काम है और पीएमओएस में इनका महत्व क्यों होता है। अगर आप भी पीएमओएस से जुड़ी समस्या से परेशान हैं, तो इन हार्मोन्स के बारे में जानना आपके लिए उपयोगी हो सकता है।
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PMOS में LH और FSH का क्या रोल है?
- फोटो : AI
एलएच क्या है?
एलएच यानी ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन एक महत्वपूर्ण प्रजनन हार्मोन है, जो पिट्यूटरी ग्रंथि से बनता है। महिलाओं में यह ओव्यूलेशन यानी अंडे के रिलीज होने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पीएमओएस में कुछ महिलाओं में एलएच का स्तर सामान्य से अधिक पाया जा सकता है। हालांकि, हर महिला में ऐसा हो, यह जरूरी नहीं है।
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एफएसएच क्या है?
एफएसएच यानी फॉलिकल स्टिमुलेटिंग हार्मोन भी पिट्यूटरी ग्रंथि से बनने वाला हार्मोन है। यह अंडाशय में फॉलिकल्स के विकास और अंडे के परिपक्व होने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मासिक धर्म चक्र के दौरान एफएसएच अंडाशय में फॉलिकल्स के विकास को बढ़ावा देता है। इससे आगे चलकर ओव्यूलेशन की प्रक्रिया में मदद मिलती है।
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पीएमओएस में एलएच और एफएसएच का क्या रोल है?
पीएमओएस में हार्मोनल बदलावों के कारण एलएच और एफएसएच के बीच संतुलन में बदलाव देखा जा सकता है। कुछ महिलाओं में एलएच अपेक्षाकृत अधिक हो सकता है, जबकि एफएसएच सामान्य या कम स्तर पर रह सकता है। इस तरह के हार्मोनल बदलाव का असर ओव्यूलेशन और मासिक धर्म चक्र पर पड़ सकता है।
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क्या एलएच-एफएसएच अनुपात से पीएमओएस का पता चलता है?
नहीं, केवल एलएच और एफएसएच के अनुपात के आधार पर पीएमओएस का निदान नहीं किया जाता। डॉक्टर आमतौर पर मासिक धर्म में अनियमितता, ओव्यूलेशन में समस्या, पुरुष हार्मोन का बढ़ना और अंडाशय से जुड़े अन्य संकेतों को ध्यान में रखते हैं। कुछ मामलों में डॉक्टर अल्ट्रासाउंड या एएमएच जैसी जांचों की मदद भी ले सकते हैं। इसलिए किसी एक हार्मोन की रिपोर्ट देखकर खुद से पीएमओएस का निष्कर्ष निकालना सही नहीं है।
अगर किसी महिला के पीरियड्स अनियमित हैं, ओव्यूलेशन में परेशानी है या हार्मोनल असंतुलन से जुड़े लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर स्थिति के अनुसार एलएच और एफएसएच सहित कुछ हार्मोन टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं। इन जांचों की रिपोर्ट को महिला की उम्र, मासिक धर्म चक्र, लक्षण और अन्य टेस्ट के साथ देखकर ही सही निष्कर्ष निकाला जाता है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।