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Mental Health: क्या है पोस्टपार्टम डिप्रेशन? लाखों महिलाएं हैं शिकार, आपको भी तो नहीं होती हैं ये दिक्कतें

Sat, 03 May 2025 03:11 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

दुनियाभर में, प्रसवोत्तर अवसाद (पीपीडी) लगभग 10-20% माताओं को प्रभावित करता है। विकासशील देशों में यह अधिक है, कुछ अध्ययनों में इन क्षेत्रों में 20% तक की दर बताई गई है। ये  प्रसव के बाद शुरू होती है और महिला को उदासी, थकावट, चिंता, और नकारात्मक विचारों से प्रभावित करती है।
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महिलाओं में पोस्टपार्टम डिप्रेशन का खतरा - फोटो : Freepik.com
मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं जैसे स्ट्रेस-एंग्जाइटी के मामले दुनियाभर में काफी तेजी से बढ़े हैं। इन स्थितियों पर अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए तो इसके कारण डिप्रेशन का खतरा हो सकता है, जिसे गंभीर समस्या माना जाता है। क्या आप जानते हैं एक प्रकार का डिप्रेशन सिर्फ महिलाओं को होता है? इसे पोस्टपार्टम डिप्रेशन के नाम से जाना जाता है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि दुनियाभर में लाखों महिलाएं इस समस्या का शिकार हैं, भारतीय महिलाओं में भी इसका खतरा देखा जाता रहा है जिसको लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ सभी लोगों को अलर्ट रहने की सलाह देते हैं।

प्रसवोत्तर अवसाद या पोस्टपार्टम डिप्रेशन (पीपीडी) एक प्रकार का मनोदशा विकार है जो प्रसव के बाद महिलाओं को प्रभावित कर सकता है। इसमें महिलाओं को तीव्र उदासी, चिंता और डिप्रेशन के अन्य लक्षणों का अनुभव हो सकता है। कई बार ये स्थिति इतना खतरनाक हो सकती है कि मां के लिए अपने बच्चे की देखभाल करना भी कठिन हो जाता है।
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स्ट्रेस और डिप्रेशन के मामले - फोटो : Freepik.com
दुनियाभर में देखे जा रहे हैं इसके मामले

दुनियाभर में, प्रसवोत्तर अवसाद (पीपीडी) लगभग 10-20% माताओं को प्रभावित करता है। विकासशील देशों में यह अधिक है, कुछ अध्ययनों में इन क्षेत्रों में 20% तक की दर बताई गई है।

भारतीय आबादी के लिए बई ये गंभीर चिंता का कारण रही है। यहां सबसे बड़ी चिंता ये है कि लोग इस समस्या का पहचान नहीं पाते और अक्सर इसका निदान भी नहीं हो पाता है। समय पर इसका इलाज न हो पाने के कारण जटिलताओं के बढ़ने का खतरा रहता है। 

भारत में आर्थिक कठिनाइयां, घरेलू हिंसा, मानसिक बीमारी का इतिहास, वैवाहिक कलह और परिवार से समर्थन की कमी जैसी स्थितियों के चलते पीपीडी के मामले अधिक देखे जाते रहे हैं।
 
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प्रसव के बाद होने वाला अवसाद - फोटो : Freepik.com
पोस्टपार्टम डिप्रेशन और इसके क्या कारण हैं?

पोस्टपार्टम डिप्रेशन एक मानसिक स्वास्थ्य स्थिति है जो प्रसव के बाद शुरू होती है और महिला को उदासी, थकावट, चिंता, और नकारात्मक विचारों से प्रभावित करती है। यह जन्म के बाद पहले कुछ हफ्तों या महीनों में कभी भी शुरू हो सकता है। कई नई माताओं को प्रसव के बाद "बेबी ब्लूज़" का अनुभव होता है। 

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, इस तरह के अवसाद का कोई एक कारण नहीं है। आनुवंशिकी, शारीरिक परिवर्तन और भावनात्मक स्थितियां इसके लिए जिम्मेदार हो सकती हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि जिन लोगों में इसका पारिवारिक इतिहास रहा हो उनमें खतरा अधिक रहता है।

इसके अलावा बच्चे के जन्म के बाद, आपके शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन में परिवर्तन के कारण आपको ये समस्या हो सकती है। 

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अवसाद में आ सकते हैं आत्महत्या के विचार - फोटो : freepik.com
पोस्टपार्टम डिप्रेशन में होता क्या है?

पोस्टपार्टम डिप्रेशन के कारण कई प्रकार की भावनात्मक और शारीरिक समस्याएं हो सकती हैं, जिनपर महिला का स्वयं और घर वालों को भी विशेष ध्यान देते रहना चाहिए। 

पोस्टपार्टम डिप्रेशन की स्थिति में अत्यधिक उदासी या अक्सर रोने का मन करता रहता है, चिड़चिड़ापन या गुस्सा बना रहता है, अपने बच्चे से जुड़ाव महसूस नहीं हो पाता और कई बार आप खुद को अयोग्य मां समझने लगती हैं। कई बार आपको आत्मघाती विचार भी आ सकते हैं।
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डॉक्टर की सलाह जरूरी - फोटो : Adobe Stock
इसका बचाव और इलाज क्या है?

सबसे पहले जरूरी है कि आप पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षणों की पहचान करके डॉक्टर से मिलें। आमतौर पर लक्षणों को कम करने वाली कुछ दवाओं, मनोचिकित्सा जैसे कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (सीबीटी) थेरेपी की मदद से लक्षणों को कम करने में मदद मिल सकती है। परिवार और दोस्तों का सहयोग लक्षणों को जल्द ठीक करने में मददगार माना जाता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, अगर लक्षण 2 हफ्ते से अधिक समय तक बने रहें, आत्महत्या या बच्चे को नुकसान पहुंचाने के विचार आएं या फिर अपने आप को असहाय, अयोग्य मां महसूस करने लगें तो समय रहते डॉक्टर की सलाह और इलाज लें।


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नोट: 
यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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