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What is Monkey Fever: कोरोना संक्रमण के बीच सामने आई ये नई मुसीबत, लक्षण से लेकर उपचार तक जानिए सबकुछ विस्तार से

Fri, 11 Feb 2022 04:04 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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केरल में ‘मंकी फीवर’ की दस्तक - फोटो : Amar Ujala
पिछले दो महीनों से जारी कोरोना के ओमिक्रॉन वैरिएंट के संक्रमण से पूरा देश परेशान है। हालांकि कुछ दिनों से रोजाना के कम होते संक्रमण के मामले थोड़ी राहत देने वाले है, इस बीच एक नई बीमारी ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक केरल के कुछ हिस्सों से क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज (केएफडी) संक्रमण के मामले रिपोर्ट किए गए हैं। आम भाषा में इसे मंकी फीवर के नाम से भी जाना जाता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हाल ही में वन विभाग से संबंधित एक व्यक्ति ने बुखार और बदन दर्द जैसे लक्षणों की शिकायत की, जिसकी जांच में मंकी फीवर का मामला सामने आया है। आसपास के 20 और लोगों की भी जांच की गई है, फिलहाल उनकी रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है।

केरल से पहले कर्नाटक में भी पिछले महीने मंकी फीवर के एक मामले की पुष्टि हुई थी, जिसके बाद स्वास्थ्य विभाग को अलर्ट पर रखा गया था। केरल में भी इससे पहले मंकी फीवर के मामले सामने आ चुके हैं। आमतौर पर प्रभावित क्षेत्रों में अक्टूबर-नवंबर में यह बीमारी शुरू होती है और जनवरी-अप्रैल के बीच पीक पर होती है। आइए आगे की स्लाइडों में मंकी फीवर के बारे में विस्तार से जानते हैं।

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रोगियों में बुखार जैसे लक्षण - फोटो : iStock
मंकी फीवर क्या है?
क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज (केएफडी) या मंकी फीवर एक वायरल रक्तस्रावी बुखार है, जो फ्लेविविरिड फैमिली से संबंधी वायरस से संक्रमण के कारण होने वाली बीमारी है। कई तरह के कीड़ों को इस वायरस का वाहक माना जाता है, इंसानों को इन कीड़ों के काटने से संक्रमण हो सकता है। मंकी फीवर एक वेक्टर जनित रोग है जो मुख्य रूप से बंदरों और मनुष्यों को प्रभावित करता है। आमतौर पर यह संक्रमण उन लोगों में फैलता है जो जंगलों से संबंधित व्यवसाय से जुड़े हैं या फिर संक्रमित बंदरों के संपर्क में रहते हैं। 
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मंकी फीवर के लक्षणों को लेकर रहें सावधान - फोटो : iStock
मंकी फीवर के क्या लक्षण होते हैं?
अध्ययनों मे पाया गया है कि संक्रमितों में इसके लक्षण हल्के से गंभीर स्तर को हो सकते हैं। मनुष्यों में, शुरुआती तीन से आठ दिनों में तेज बुखार और सिरदर्द की दिक्कत होती है। इसके बाद आंतरिक रक्तस्राव के कुछ लक्षण जैसे नाक, गले, मसूड़ों या आंतों से रक्तस्राव की समस्या देखी जा सकती है। संक्रमितों को उल्टी, सुस्ती, कंपकंपी, बेचैनी और चिंता का भी अनुभव होता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह रोग हमेशा घातक नहीं होता है। हर साल, लगभग 500 लोग इससे संक्रमित होते हैं, जिनमें से 15 से 50 लोगों की मृत्यु हो जाती है।

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क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज (केएफडी) के मामले - फोटो : iStock
संक्रमण का प्रसार कैसे होता है?
मेडिकल रिपोर्ट्स के मुताबिक संक्रमित गिलहरी, चूहे या अन्य कीड़ों के काटने से यह संक्रमण इंसानों में हो सकता है। हालांकि यह संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से नहीं फैलता है।  मृत संक्रमित बंदरों की देखरेख करने वाले लोगों में भी इस संक्रमण का खतरा हो सकता है। अधिकांश संक्रमित 15 से 20 दिनों में ठीक हो जाते हैं। हालांकि कुछ लोगों के उपचार की अवधि लंबी हो सकती है।
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मंकी फीवर का इलाज नहीं - फोटो : pixabay
मंकी फीवर का क्या इलाज है?
मंकी फीवर का वैसे तो कोई विशिष्ट उपचार नहीं है। हालांकि लक्षणों की पुष्टि हो जाने पर रोगी तो तत्काल चिकित्सा सहायता लेने की सलाह दी जाती है।  रोगियों में आम तौर पर डिहाइड्रेशन की समस्या हो जाती है, इससे बचाव के लिए ड्रिप्स लगाई जाती है। इसके साथ हेमरेजिक ब्लीडिंग की समस्या को नियंत्रित करने के लिए कुछ अन्य आवश्यक सुरक्षात्मक उपाय भी किए जाते हैं। डॉक्टर आमतौर पर बुखार से पीड़ित रोगियों को पूर्ण आराम करने के साथ खूब पानी या तरल पदार्थ, प्रोटीन युक्त आहार लेने की सलाह देते हैं। 
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बचाव के लिए टीकाकरण कराएं - फोटो : Pixabay
मंकी फीवर से बचाव के उपाय
स्वास्थ्य विशेषज्ञों से मुताबिक जिन क्षेत्रों में पहले लोगों को संक्रमण रह चुका है वहां पर बीमारी को फैलने से रोकने के लिए टीकाकरण करवाना बहुत जरूरी है। टीका आमतौर पर 7-65 वर्ष आयु वर्ग के लोगों के लिए उपलब्ध है। एक महीने की अवधि के भीतर इसके दो खुराक दिए जाते हैं। हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में बताया गया है कि एक बार जब व्यक्ति संक्रमित हो जाता है तो टीके प्रभावी नहीं होते हैं। ऐसे में लोगों को इससे बचाव करते रहना चाहिए।

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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सुझाव के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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