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Imposter Syndrome: सफलता मिलने के बाद भी नहीं होती खुशी? कहीं आप भी तो नहीं हैं इम्पोस्टर सिंड्रोम का शिकार

Fri, 31 Jul 2026 08:17 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

इम्पोस्टर सिंड्रोम एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है, जिसमें व्यक्ति अपनी उपलब्धियों और क्षमताओं पर भरोसा नहीं कर पाता। चाहे उसने अपनी मेहनत से सफलता हासिल की हो, फिर भी उसे लगता है कि वह उस सफलता का असली हकदार नहीं है। ऐसे लोगों को अक्सर डर रहता है कि एक दिन लोग उन्हें अयोग्य या फर्जी समझ लेंगे।
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इंपोस्टर सिंड्रोम की समस्या - फोटो : Freepik.com
क्या आपने कभी कोई बड़ी उपलब्धि हासिल करने के बाद भी यह महसूस किया है कि आप वास्तव में इतने काबिल नहीं हैं? क्या तारीफ मिलने पर आपको लगता है कि लोग आपकी क्षमता को बढ़ा-चढ़ाकर देख रहे हैं? अगर ऐसा अक्सर होता है, तो यह सिर्फ आत्मविश्वास की कमी नहीं, बल्कि इंपोस्टर सिंड्रोम का लक्षण हो सकता है। यह कोई मानसिक बीमारी नहीं है, लेकिन यह व्यक्ति के आत्मविश्वास, कॅरिअर, पढ़ाई और रिश्तों पर गहरा असर डाल सकता है।

आइए जानें कि इंपोस्टर सिंड्रोम क्या है, इसके संकेत क्या हैं और इससे कैसे बाहर निकला जा सकता है?
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खुद को योग्य न मानने की स्थिति - फोटो : Freepik.com
क्या है इंपोस्टर सिंड्रोम

इंपोस्टर सिंड्रोम एक ऐसी मनोवैज्ञानिक स्थिति है, जिसमें व्यक्ति अपनी उपलब्धियों के बावजूद खुद को योग्य नहीं मानता है। उसे हर समय ऐसा लगता है कि उसे सफलता मेहनत या प्रतिभा की वजह से नहीं, बल्कि किस्मत, सही समय या दूसरों की मदद से मिली है। ऐसे लोग अक्सर इस डर में रहते हैं कि एक दिन लोगों को उसकी असलियत पता चल जाएगी कि वह उतने सक्षम नहीं हैं, जितना उन्हें समझा जा रहा है। यह समस्या किसी भी उम्र में प्रभावित कर सकती है। छात्र, नौकरीपेशा लोग, डॉक्टर, इंजीनियर, कलाकार, उद्यमी और यहां तक कि बेहद सफल लोग भी इसका अनुभव कर सकते हैं।


इसके लक्षणों को पहचानिए
  • अपनी सफलता का श्रेय खुद को देने से बचना।
  • लगातार दूसरों से अपनी तुलना करना।
  • हर काम में परफेक्ट होने का दबाव महसूस करना।
  • तारीफ मिलने पर असहज महसूस करना।
  • छोटी-सी गलती पर भी खुद को असफल समझ लेना।
  • नई जिम्मेदारियां लेने से डर लगना।
  • हमेशा यह चिंता रहना कि कहीं लोग आपकी कमियां न पकड़ लें।
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मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा - फोटो : Freepik.com
क्या हैं इसके पीछे के कारण?

इंपोस्टर सिंड्रोम के पीछे कोई एक निश्चित कारण नहीं होता, बल्कि कई मनोवैज्ञानिक और सामाजिक परिस्थितियां मिलकर इसे बढ़ा सकती हैं।
 
  • बचपन में बार-बार दूसरों से तुलना किया जाना या केवल बेहतरीन प्रदर्शन पर ही तारीफ मिलना व्यक्ति के भीतर खुद को लगातार साबित करने का दबाव पैदा कर सकता है।
  • इसके अलावा, हर काम को बिना गलती के करने की आदत भी इस भावना को बढ़ाती है, क्योंकि ऐसे लोग छोटी-सी कमी को भी बड़ी असफलता मान लेते हैं।
  • नई नौकरी, प्रमोशन, कॉलेज में प्रवेश या किसी नए क्षेत्र में शुरुआत करते समय भी व्यक्ति अपनी क्षमता पर संदेह करने लग सकता है।
  • वहीं, सोशल मीडिया पर दूसरों की उपलब्धियां लगातार देखने से तुलना बढ़ती है और अपनी सफलता कम लगने लगती है।

अगर लंबे समय तक इंपोस्टर सिंड्रोम बना रहे, तो यह तनाव, चिंता, आत्मविश्वास में कमी और काम से जुड़ी थकान (बर्नआउट) का कारण बन सकता है। कुछ लोग अपनी क्षमता साबित करने के लिए जरूरत से ज्यादा काम करने लगते हैं, जबकि कुछ लोग असफल होने के डर से नए अवसरों से बचने लगते हैं।
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समय पर लें डॉक्टरी सलाह - फोटो : Adobe Stock
इससे बाहर निकलने के तरीके

इंपोस्टर सिंड्रोम से बाहर निकलने के लिए सबसे पहले अपनी छोटी-बड़ी उपलब्धियों को स्वीकार करना जरूरी है। अपनी सफलताओं की सूची बनाएं और समय-समय पर उसे पढ़ें, ताकि आपको अपनी मेहनत और क्षमता का अहसास हो सके।
 
  • जब भी मन में यह विचार आए कि “मैं इसके लायक नहीं हूं”, तो उस नकारात्मक सोच को चुनौती दें और खुद से पूछें कि क्या इसके पीछे कोई वास्तविक प्रमाण है।
  • दूसरों से तुलना करने के बजाय अपनी प्रगति पर ध्यान दें, क्योंकि हर व्यक्ति की परिस्थितियां और सफर अलग होते हैं।

अपनी गलतियों को असफलता मानने के बजाय सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा समझें। साथ ही, अपनी भावनाओं को दबाने के बजाय किसी भरोसेमंद दोस्त, परिवार के सदस्य, मेंटर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से साझा करें। इससे मन का दबाव कम हो सकता है और आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

अगर खुद को अयोग्य समझने की यह भावना लंबे समय तक बनी रहे और इसकी वजह से आपके काम, पढ़ाई, रिश्तों या रोजमर्रा की जिंदगी पर असर पड़ने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि इसके साथ लगातार चिंता, उदासी, तनाव या आत्मविश्वास में गंभीर कमी महसूस हो रही है, तो किसी मनोवैज्ञानिक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर विकल्प हो सकता है। समय पर सही मार्गदर्शन और सहायता मिलने से इस स्थिति से बाहर निकलना आसान हो सकता है।
 

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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें। 
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