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G6PD Deficiency: पुरुषों में खून की इस बीमारी का बढ़ता खतरा, तेजी से घटने लगते हैं रेड ब्लड सेल्स

Thu, 26 Feb 2026 06:47 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

जी6पीडी की कमी एक आनुवंशिक ब्लड डिसऑर्डर है, जिसमें शरीर में मौजूद एंजाइम ग्लूकोज-6-फॉस्फेट डिहाइड्रोजनेज की कमी हो जाती है। यह एंजाइम लाल रक्त कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव डैमेज से बचाने का काम करता है। 
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पुरुषों में G6PD डिफिशिएंसी का खतरा - फोटो : Adobe stock
शरीर स्वस्थ रहे, सभी अंग ठीक तरीके से काम करते रहें इसके लिए खून का संचार ठीक तरीके से होते रहना जरूरी है। खून के माध्यम से सभी अंगों तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचते रहते हैं। हालांकि कुछ प्रकार की स्वास्थ्य स्थितियों में आपमें खून की कमी (लाल रक्त कोशिकाओं की कमी) होने का खतरा बढ़ जाता है। G6PD डिफिशिएंसी एक ऐसी ही स्थिति है जिसको लेकर सभी लोगों को सावधान रहने की जरूरत होती है।

जी6पीडी (ग्लूकोज-6-फॉस्फेट डिहाइड्रोजनेज) एक प्रकार का एंजाइम है जो आपके रेड ब्लड सेल्स को क्षतिग्रस्त होने से बचाता है। जब शरीर में इसकी कमी हो जाती है तो लाल रक्त कोशिकाएं तेजी से डैमेड होने लगती हैं। लाल रक्त कोशिकाएं ही फेफड़ों से पूरे शरीर में ऑक्सीजन ले जाने का मुख्य कार्य करती हैं। इसकी कमी हो जाए तो खून की कमी या एनीमिया होने का खतरा बढ़ जाता है।

जी6पीडी की कमी एक जेनेटिक बीमारी है, यानी ये आपको माता-पिता से विरासत में मिलती है। इसकी वजह से आपके G6PD का लेवल बहुत कम हो जाता है। अध्ययनों से पता चलता है कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में इस समस्या का खतरा अधिक होता है।
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रेड ब्लड सेल्स डैमेज होने की समस्या - फोटो : Adobe Stock Images
जी6पीडी की कमी का खतरा

मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि जी6पीडी की कमी होना काफी आम है। दुनियाभर में 40 से 50 करोड़ लोग इससे प्रभावित हैं। 
  • ज्यादातर लोगों में इसके लक्षण नहीं दिखते, इसलिए समय रहते इसकी पहचान भी नहीं हो पाती है।
  • हालांकि कुछ दवाओं जैसे ट्रिगर के कारण हीमोलिटिक एनीमिया जैसे गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। इसमें बहुत सारे रेड ब्लड सेल्स क्षति ग्रस्त होकर डेड होने लग जाते हैं। 
  • जी6पीडी की कमी वाले नए जन्मे बच्चों को गंभीर पीलिया हो सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जी6पीडी की कमी से आमतौर पर कोई लक्षण नहीं होते, जब तक कि कोई ट्रिगर आपके रेड ब्लड सेल्स पर दबाव न डाले और उनके टूटने (हीमोलिसिस) का कारण न बने।
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जी6पीडी की कमी से क्या दिक्कतें होती हैं? - फोटो : Freepik.com
जी6पीडी की कमी की पहचान क्या हैं?

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, जी6पीडी की कमी के कारण रेड ब्लड सेल्स में होने वाला डैमेज कई तरह की दिक्कतों का कारण बन सकता है।
 
  • आपको अक्सर थकान-कमजोरी लग सकती है।
  • दिल की धड़कन तेज होने की समस्या (टैकीकार्डिया)
  • सांस लेने में तकलीफ की समस्या (डिस्पेनिया)
  • बार-बार पीलिया होने की समस्या।
  • पेशाब का रंग गहरा, पीला-नारंगी या चाय के रंग जैसा हो सकता है।
  • जब ये लक्षण तेज़ी से और गंभीर होते हैं, तो इसे हीमोलिटिक क्राइसिस कहते हैं। इसमें तुरंत डॉक्टरी मदद जरूरी हो जाता है।

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एनीमिया और इसका खतरा - फोटो : Freepik.com
जी6पीडी की कमी क्यों होती है?

मेडिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि मुख्य रूप से जेनेटिक म्यूटेशन को इसका कारण माना जाता है। कुछ प्रकार की दवाएं जैसे एंटीबायोटिक्स, मलेरिया की दवाएं, दर्द निवारक दवाएं, संक्रमण इसके लक्षणों को ट्रिगर कर सकती हैं।
 
  • कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, फवा बीन्स खाना सबसे आम ट्रिगर है। जब जी6पीडी की कमी वाला कोई व्यक्ति फवा बीन्स खाता है और उसे हीमोलिटिक एनीमिया हो सकता है।
  • हेपेटाइटिस-ए और हेपेटाइटिस-बी, टाइफाइड बुखार और निमोनिया के कारण ये ट्रिगर होता है।
  • स्मोकिंग और शराब पीना भी आपके लिए मुश्किलें बढ़ाने वाला हो सकता है।
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जी6पीडी की कमी कैसे ठीक करें? - फोटो : Adobe Stock Photo
कैसे ठीक करें ये समस्या?

जिन मरीजों का सीबीसी (कम्पलीट ब्लड काउंट) टेस्ट बार-बार लो रहता है, उनमें डॉक्टर जी6पीडी की कमी को चेक करने के लिए टेस्ट कर सकते हैं। 

जी6पीडी की कमी का वैसे तो कोई इलाज नहीं है, लेकिन इसे ट्रिगर करने वाली चीजें से बचाव करके आप खतरे को कम कर सकते हैं। जिन लोगों को पीलिया की दिक्कत होती है डॉक्टर उसके लिए दवाएं और अन्य उपचार दे सकते हैं। 

जी6पीडी की कमी वाले ज्यादातर लोगों को शायद कभी पता नहीं चलता क्योंकि उनमें लक्षण नहीं होते। हालांकि जिनका ब्लड काउंट हमेशा कम रहता है उन्हें डॉक्टर की सलाह जरूर ले लेनी चाहिए।




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नोट: 
यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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