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Alert: रील्स देखने की आदत कहीं बन न जाए जानलेवा, टाइमपास समझकर आप भी तो नहीं कर रहे बड़ी गलती?

Tue, 24 Feb 2026 11:40 AM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

औसतन एक व्यक्ति रोजाना 2-4 घंटे मोबाइल स्क्रीन पर बिताता है, जिसमें रील्स और शॉर्ट वीडियो का हिस्सा तेजी से बढ़ रहा है। यह आदत केवल समय की बर्बादी नहीं है, बल्कि यह शरीर, दिमाग और मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डालती है।
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मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल खतरनाक - फोटो : Adobe stock
मोबाइल की स्क्रीन से चिपके रहना, स्क्रॉल करते रहना और रील्स देखना हमारे दैनिक जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है। बच्चे-युवा तो छोड़िए, बड़ी संख्या में बुजुर्गों में भी रील्स देखते रहने की आदत बढ़ती जा रही है। स्वास्थ्य विशेष इस बढ़ते खतरे को लेकर काफी चिंतित हैं। डॉक्टरों ने अलर्ट किया है कि अक्सर रील देखते रहने की आदत ने कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के खतरे को काफी बढ़ा दिया है। ऐसे लोगों में जानलेवा जोखिम भी हो सकते हैं, जिसको लेकर सावधान रहने की आवश्यकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं रील्स का एल्गोरिदम इस तरह डिजाइन किया जाता है कि यूजर एक के बाद एक वीडियो देखते रहें, जिससे समय का पता ही नहीं चलता। अध्ययनों से पता चलता है कि औसतन एक व्यक्ति रोजाना 2-4 घंटे मोबाइल स्क्रीन पर बिताता है। यह आदत केवल समय की बर्बादी नहीं है, बल्कि यह शरीर, दिमाग और मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डालती है।

लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहना आपको शारीरिक रूप से निष्क्रिय बनाता जाता है जो कई ऐसी बीमारियों की जड़ है जिसे जानलेवा माना जाता है।
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रील्स देखते रहने के कई नुकसान - फोटो : Freepik
रील्स देखने की आदत क्यों खतरनाक?

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, रील्स देखने के दौरान व्यक्ति लंबे समय तक बैठा रहता है, जिससे शरीर की मांसपेशियां सुस्त हो जाती हैं। रील्स देखने से दिमाग में डोपामिन नामक हार्मोन रिलीज होता है, जो खुशी और संतुष्टि से जुड़ा होता है। बार-बार डोपामिन रिलीज होने से दिमाग को इसकी आदत पड़ जाती है, जिससे व्यक्ति बार-बार मोबाइल देखने के लिए मजबूर होता है।
 
  • अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार, जो लोग रोज 6-8 घंटे से ज्यादा बैठे रहते हैं, उनमें हृदय रोगों का खतरा 20-30% तक बढ़ सकता है। 
  • शारीरिक गतिविधि कम होने से कैलोरी बर्न कम होती है, जिससे मोटापा और मेटाबॉलिक समस्याएं बढ़ती हैं।
  • हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के अनुसार, यह आदत ध्यान की क्षमता को कम कर सकती है और एंग्जायटी व स्ट्रेस का कारण बन सकती है।
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मोबाइल से चिपके रहने की आदत के हो सकते हैं कई नुकसान - फोटो : Freepik.com
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

लखनऊ स्थित लोहिया संस्थान में कॉर्डियोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. भुवन चन्द्र तिवारी कहते हैं, यदि आप या आपके बच्चे को मोबाइल पर रील्स देखने की लत है तो तुरंत इसमें सुधार कर लें। 

ये जाने-अनजाने आपकी सेहत को नुकसान पहुंचा रही है। ये आपकी शारीरिक गतिविधियों को कम कर रहा है  इससे दिल का बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। युवा ही नहीं, बल्कि बच्चे और बुजुर्ग भी घंटों तक स्क्रीन पर रील्स देख रहे हैं। ये दिल की सेहत के लिए काफी खतरनाक आदत हो सकती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, दिल और शरीर की अच्छी सेहत के लिए रोजाना 10 हजार कदम चलने की सलाह दी जाती है। इसे दो से तीन हिस्सों में भी बांट सकते हैं। मसलन सुबह दोपहर व शाम को पैदल चलकर इस लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं। हालांकि लगातार रील देखने से व्यक्ति लंबे समय तक बैठे रहता है, इससे शारीरिक गतिविधि कम हो जाती है।
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कंधे का दर्द - फोटो : Adobe Stock
बढ़ रही है टेक्स्ट नेक सिंड्रोम की समस्या

स्मार्टफोन के लंबे समय तक इस्तेमाल, रील्स की आदत के कारण लोगों में टेक्स्ट नेक सिंड्रोम की समस्या बढ़ रही है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ हेल्थ साइंसेज एंड रिसर्च (आईजेएचएसआर) ने एक रिपोर्ट में बताया कि 15-20 वर्ष की आयु वाले लोग गर्दन में इस तरह की तकलीफ के लिए सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं।

खराब पॉश्चर में या फिर लंबे समय तक गर्दन को झुकाकर मोबाइल फोन चलाते रहने, रील्स देखते रहने की आदत गर्दन में दर्द और जकड़न बढ़ाने वाली हो सकती है। कुछ स्थितियों में ये समस्या काफी असहज कर देने वाली हो सकती है जिसके कारण आपके लिए दैनिक जीवन के कामकाज भी कठिन हो सकते हैं। 



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नोट: 
यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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