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- फोटो : Amar Ujala
पास्चर इंस्टीट्यूट में हालांकि उन्हें सहायक लाइब्रेरियन का पद मिला लेकिन बैक्टीरियोलॉजी का अपना अध्ययन उन्होंने जारी रखा, जो जल्द ही हैजा की वैक्सीन बनाने की ओर मुड़ गया। हाफकिन ने इस वैक्सीन का पहले मुर्गे और गिनीपिग पर परीक्षण किया और फिर खुद को वैक्सीन का इंजेक्शन लगाया। उन्होंने जो वैक्सीन तैयार की, उसके दो इंजेक्शन एक तय अंतराल में लगवाने पड़ते थे। संतुष्ट होने पर जब उन्होंने इसके बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की बात सोची तो तमाम विशेषज्ञ उनसे असहमत दिखाई दिए। यहां तक कि उनके गुरु लुई पास्चर भी उनसे सहमत नहीं थे।
भारत में भारी विरोध
पहले ही एक वैक्सीन का दावा गलत साबित हो चुका था और यह कहा जाने लगा था कि हैजा मुख्य रूप से आंतों के भीतर का रोग है और इसमें वैक्सीन कामयाब नहीं हो सकती। इस बीच संयोग से हाफकिन की मुलाकात लॉर्ड फ्रेडरिक हेमिल्टन डफरिन से हुई जो उस समय पेरिस में ब्रिटिश राजदूत थे और इसके पहले भारत के वाइसराय भी रह चुके थे। भारत में बड़े पैमाने पर हैजा फैल चुका था। लॉर्ड फ्रेडरिक का मानना था कि इस वैक्सीन का इस्तेमाल बंगाल में होना चाहिए। उनकी कोशिशों ने जल्द ही हाफकिन को भारत पहुंचा दिया।