प्रतीकात्मक फोटो
क्लिनिकल ट्रायल
प्रोफेसर मुनीर पीर मोहम्मद आगे बताते हैं, "ड्रग रिपोजिशनिंग का सबसे बड़ा फायदा यह है कि बनाई गई दवाइयां इंसानों पर टेस्ट की जा चुकी होती है। इसलिए इसकी सुरक्षित होने को लेकर डेटाबेस मौजूद होता है कि कैसे यह काम करता है। सिर्फ एक ही बात जाननी होती है कि यह किसी बीमारी विशेष पर काम कर रहा या नहीं।"
पीर मोहम्मद हालांकि यह स्पष्ट करते हैं कि इंसानों को सीधे देने से पहले इनका क्लिनिकल ट्रायल जरूरी होता है क्योंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं होती है कि यह काम करेगा कि नहीं। यह अलग परिस्थितियों में कितना कारगर है, इसका पता सिर्फ क्लिनिकल ट्रायल में ही लगाया जा सकता है।
समय की बचत के साथ-साथ निश्चित तौर पर पैसे की भी इस प्रक्रिया में बचत होती है। ऑस्ट्रेलिया के यूनिवर्सिटी ऑफ मर्डोक के फॉर्माकोलॉजी के प्रोफेसर इयान मुलाने कहते हैं, "एक दवा कंपनी दो बिलियन डॉलर एक नई दवा की खोज पर खर्च करता है, जिसे बाजार में पहुंचने में सालों लगते हैं।"