57% ट्रांसजेंडर्स सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी कराना चाहते हैं
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अमर उजाला से बातचीत में दिल्ली की एक ट्रांसजेंडर सपना बताती हैं-
2016 में हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी कराई थी, लोगों से कर्ज लिए, उसे पूरा किया। अब सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी (एसआरएस) के लिए पैसों का इंतजाम कर रही हैं ताकि वह भी जीवन को सुखद बना सकें। 'आयुष्मान भारत' में शामिल होने से खुशी जाहिर करती सपना कहती हैं-
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भले ही हमें अधिकार दे दिए हों पर जमीनी स्तर पर हम हर पल एक ऐसी स्थिति से लड़ रहे हैं, जिसमें हमारी कोई गलती नहीं है। ईश्वर को कोसती हूं, आखिर कौन सा पाप किया था जो पृथ्वी पर इस तरह से जन्म दिया? बीमार हो जाएं तो अस्पतालों में सही से इलाज नहीं हो पाता, होता भी है तो कई दफा ऐसे माहौल का भी सामना करना पड़ता है, जब खुद को और ऊपर वाले को कोसने के अलावा कुछ नहीं सूझता। मोदी सरकार ने हमें अपना माना है, अगर सब कुछ सही रहा तो शायद मेरी भी सर्जरी 'आयुष्मान भारत' के तहत हो सकेगी। हमें खुश होने का मौका देने के लिए सरकार को धन्यवाद।
सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी के बारे में जानिए
सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी या एसआरएस उन प्रक्रियाओं को संदर्भित करती है, जो आपको अपने पसंद के जेंडर के रूप में अपनी पहचान बनाने में सहायक होती है। विशेषतौर पर यह उन लोगों के लिए काफी मददगार होती है जिनको आइडेंटिटी डिसऑर्डर या जेंडर डायसोफोरिया की समस्या होती है।
जेंडर डायसोफोरिया का मतलब शारीरिक बनावट पुरुषों की होने के बावजूद महिला की तरह या महिला की बनावट होने के बावजूद पुरुषों की तरह रहना, कपड़े पहनना उनके तरह व्यवहार करना है। ऐसे में मानसिक तौर पर भी वह व्यक्ति विपरीत लिंग की तरह जीवन जीने में सहज महसूस करता है, पर शारीरिक बनावट इसमें आड़े आती है। ऐसे लोग एसआरएस की मदद से अपने पसंद के जेंडर में परिवर्तन करा सकते हैं। ऐसा करना उनके मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता बेहतर करने में मददगार हो सकता है।
पश्चिमी देशों में सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी काफी सामान्य है, पर सामाजिक और आर्थिक कारणों से भारतीयों, विशेषकर ट्रांसजेंडर्स समुदाय के लिए यह काफी कठिन रहा है। अब इस सर्जरी को भी 'आयुष्मान भारत' योजना के अंतर्गत शामिल करने से एक सुखद बदलाव की उम्मीद की जा रही है।
ट्रांसजेंडर्स के लिए कई प्रकार की सामाजिक चुनौतियां
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सर्जरी की सुविधा के लिए बना है कानून, पर वहां भी लूप होल
भारतीय संसद ने ट्रांसजेंडर्स के लिए कानून भी बनाया है। ट्रांसजेंडर्स पर्सन (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 के अनुसार सभी सरकारों को ट्रांसजेंडर्स को अलग एचआईवी सर्विलांस सेंटर और सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी सहित स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करना सुनिश्चित करना चाहिए। इसमें सर्जरी से पहले और बाद में काउंसलिंग भी शामिल है। इसके अलावा प्रत्येक राज्य में कम से कम एक अस्पताल को हार्मोनल थेरेपी के साथ एसआरएस की सुविधा के लिए अनिवार्य करना सुनिश्चित करने की बात की गई थी।
कानून तो बन गए पर इसमें कई लूप होल्स रह गए जिसके कारण ट्रांसजेंडर्स के लिए सुविधाएं ले पाना, इस कानून के बनने से पहले जैसा ही कठिन बना हुआ है। अमर उजाला ने एक पड़ताल की, तो पता चला कि दिल्ली के 42 में से सिर्फ एक अस्पताल (लोकनायक) में ही यह सर्जरी मुफ्त उपलब्ध है। एम्स और सफदरजंग जैसे नामचीन अस्पतालों में यह सर्जरी होती ही नहीं है।
अब मामला आता है कि जिन अस्पतालों में सर्जरी होती भी है वहां राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त ट्रांसजेंडर प्रमाणपत्र और पहचान पत्र मांगा जाता है, पर इस समूह के लोगों का कहना है कि पहले तो उन्हें इस तरह के प्रमाणपत्र के बारे में पता ही नहीं था, अब इसे पाना भी कठिन है। अभी तक महज कुछ हजार को ही सारी कागजी कार्रवाई कर उचित प्रमाण पत्र दिया गया है।
2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में लगभग 4,88,000 ट्रांसजेंडर्स हैं। नवंबर 2020 में राष्ट्रीय पोर्टल के शुभारंभ के बाद से उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, अब तक सिर्फ 10,639 लोगों ने प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया है। इसमें से 8,080 को ही आईडी जारी हो पाए हैं। लगभग 2,314 आवेदनों की स्वीकृति लंबित है। अधिकारियों को उम्मीद है कि स्वास्थ्य पैकेज के शुरू होने के बाद प्रमाणीकरण के लिए पोर्टल पर पंजीकरण बढ़ेगी।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 2017 के एक
रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में ट्रांसजेंडर समुदाय के केवल 16.6% लोगों के पास किसी भी तरह के पहचान के तौर पर आधार कार्ड था। रिपोर्ट में बताया गया है कि शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक-राजनीतिक रूप में दखल में कमी के कारण इनके कानूनी दस्तावेजों की प्रक्रिया हमेशा से परेशानी का कारण बनी हुई है।
सर्जरी करा पाना आसान नहीं
ट्रांसजेंडर सपना ने हमसे बातचीत के दौरान बताया- सरकारी अस्पतालों में सर्जरी करा पाना कई कारणों से मुश्किल होता है और निजी अस्पताल बहुत महंगे होते हैं, इस वजह से हमारे लिए सबकुछ कठिन होता है।
हजारों ट्रांसजेंडर्स संघर्ष कर रहे हैं कि कैसे भी पैसे इकट्ठा करके यह सर्जरी कराई जा सके, पर अब ऐसा लगता है कि हमें इस दिशा में सरकार की तरफ से बड़ा उपहार मिला है। जरा सोच के देखिए आपका शरीर और मन अगर आपके लैंगिक पहचान से मैच न करे तो यह कितना घुटन वाला अनुभव होता है? यह हमारे मानसिक सेहत पर भी गंभीर असर डालता है, पर अफसोस भी इसी बात का है कि हम अपना दर्द उन्हीं से कहने को मजबूर हैं जो पहले से ही उसी दर्द से पीड़ित हैं, क्योंकि समाज तो हमें सुनने और समझने में सहज ही नहीं है।
ट्रांसजेंडर्स के बेहतर सेहत के लिए नई उम्मीद की किरण
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क्या है सर्जन की राय?
सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी और इसकी जटिलताओं के बारे में जानने के लिए हमने दिल्ली में वरिष्ठ प्लास्टिक सर्जन डॉ समीर प्रभाकर से संपर्क किया। डॉ समीर बताते हैं, अन्य सर्जरी की तुलना में सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी काफी अलग और कई स्तर पर चुनौतीपूर्ण होती है। जिन लोगों को यह सर्जरी करानी होती है, उनके काउंसिलिंग की जरूरत होती है। यही कारण है कि इस सर्जरी में सर्जन के साथ मनोचिकित्सकों की भी विशेष भूमिका होती है।
मनोचिकित्सक उनसे कई स्तर से बातचीत करके स्थिति को समझाते हैं, क्योंकि एक बार सर्जरी हो जाने के बाद दोबारा इसमें कोई फेरबदल नहीं किया जा सकता है। मनोचिकित्सकों की तरफ से हरी झंडी मिलने के बाद ही आगे की प्रक्रिया को किया जाता है।
डॉ समीर कहते हैं, दुखद बात यह है कि सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी जितनी संवेदनशील और कठिन प्रक्रियाओं वाली है, फिर भी अक्सर ब्लैक मार्केट में इस तरह की सर्जरी के बारे में सुनने को मिलता है। जहां न तो मनोचिकित्सक की काउंसिलिंग होती है न ही सर्जन प्रशिक्षित और प्रमाणित होते हैं। इस तरह की सर्जरी के बाद कई तरह की जटिलताओं और कुछ गड़बड़ होने पर जान जाने तक का भी खतरा हो सकता है।
ट्रांसजेंडर्स के लिए नई उम्मीद की किरण
'आयुष्मान भारत' योजना के अंतर्गत ट्रांसजेंडर्स को भी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए शामिल करने के ऐलान के बाद से इस समुदाय को लोगों की उम्मीद तो जगी है, पर अशिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण ज्यादातर लोगों के पास रजिस्ट्रेशन और प्रमाण पत्र न हो पाना अब भी बड़ी चुनौती है। अधिकारियों का मानना है कि इस ऐलान के बाद पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन का आंकड़ा बढ़ेगा, लोग खुलकर सामने आएंगे। सुप्रीम कोर्ट से अधिकार मिलने के बाद भी वर्षों से तमाम मूलभूत सुविधाओं से वंचित ट्रांसजेंडर्स समाज के लिए केंद्र सरकार की यह योजना उनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए 'आयुष्मान भव' साबित होने की उम्मीद है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेख स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सुझाव और साझा की गई जानकारियों के साथ मेडिकल रिपोर्ट्स/अध्ययनों के आधार पर तैयार किया गया है। संबंधित अध्ययनों की कॉपी और विशेषज्ञों का परिचय साथ में संलग्न है। लेख का उद्देश्य स्वास्थ्य के प्रति लोगों को जागरूक करना है।