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EPTB: 50% लोगों में बिना खांसी-बलगम को हो रही है टीबी, फेफड़े के अलावा इन अंगों में भी हो रहा संक्रमण

Tue, 29 Apr 2025 07:47 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

ग्रेटर नोएडा स्थित  राजकीय आयुर्विज्ञान संस्थान (जिम्स) में बीते वर्ष 1,000 से अधिक मरीजों की टीबी की जांच की गई है। इसमें से 50 फीसदी मरीज एस्क्ट्रा पल्मोनरी टीबी के मामले सामने आ रहे हैं। 
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फेफड़ों की बीमारी, टीबी - फोटो : Adobe Stock
ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) रोग वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का कारण बना हुआ है। भारतीय आबादी में भी ये बीमारी तेजी से बढ़ रही है। भारत ने इस साल (2025) तक देश को टीबी मुक्त बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया था, हालांकि अब भी ये लक्ष्य काफी दूर नजर आ रहा है। 

टीबी एक गंभीर बीमारी है जो किसी भी उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकती है। भारत में वैसे तो व्यापक जागरूकता अभियानों के चलते टीबी के मामलों में काफी कमी आई है, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं के लिए ये अब भी बड़ा दबाव बना हुआ है। 

13 दिसंबर 2024 को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने लोकसभा में बताया-भारत में टीबी के मामलों की दर कम हुई है। साल 2015 में प्रति एक लाख की जनसंख्या पर 237 लोगों को ये बीमारी थी जो 2023 में 17.7 प्रतिशत घटकर प्रति एक लाख की जनसंख्या पर 195 हो गई है। टीबी से होने वाली मौतों में भी 21.4 प्रतिशत की कमी आई है, जो 2015 में प्रति लाख जनसंख्या पर 28 से घटकर 2023 में प्रति लाख जनसंख्या पर 22 हो गई है।
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फेफड़ों में संक्रमण की स्थिति हो सकती है खतरनाक - फोटो : Adobe Stock
टीबी संक्रमण और इसका जोखिम

टीबी माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नामक बैक्टीरिया के कारण होने वाला संक्रामक रोग है। ये मुख्य रूप से वायुजनित ड्रॉपलेट्स के माध्यम से फैलता है। टीबी रोग वाले लोगों की खांसी या छींक से निकलने वाले बूंदों के माध्यम से आसपास के अन्य लोगों में संक्रमण का खतरा हो सकता है। यही कारण है कि स्वास्थ्य सेवा कर्मियों के बीच टीबी की घटनाओं को लेकर विशेषज्ञों ने चिंता जाहिर की है। 
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टीबी के मामलों बढ़ोतरी - फोटो : Freepik.com
एस्क्ट्रा पल्मोनरी टीबी के मामलों में बढ़ोतरी

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया कि बड़ी संख्या में ऐसे मरीजों का निदान किया जा रहा है जिनमें संक्रमण के कोई लक्षण नहीं होते हैं। जब उनकी इम्युनिटी कमजोर होने लगती है तो इसके स्पष्ट संकेत दिखने लगते हैं। आमतौर पर 15 दिन से अधिक समय तक खांसी, बलगम का आना टीबी के लक्षण माने जाते हैं, लेकिन बिना खांसी- बलगम के भी यह बीमारी को सकती है।

ग्रेटर नोएडा स्थित  राजकीय आयुर्विज्ञान संस्थान (जिम्स) में बीते वर्ष 1,000 से अधिक मरीजों की टीबी की जांच की गई है। इसमें से 50 फीसदी मरीज एस्क्ट्रा पल्मोनरी टीबी के मामले सामने आ रहे हैं। ऐसे मरीज खांसी-बलगम के बिना सामने आ रहे हैं।

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फेफड़े के अलावा भी कई अंगों में हो सकती है ये बीमारी - फोटो : Adobe Stock
शरीर के कई अंगों में हो सकती है ये बीमारी

चिकित्सकों की मानें तो बच्चेदानी, रीढ़ की हड्डी, मस्तिष्क, गर्दन समेत शरीर के विभिन्न अंगों में टीबी की गांठ बन रही है। यह रोग संक्रामक है, जो फेफड़ों के अलावा अन्य अंग में होता है। जबकि पल्मोनरी टीबी फेफड़े से जुड़ी होती है। इनमें खांसी, बलगम आना प्रारंभिक लक्षण होते हैं। इसकी जानकारी होने पर लोग आसानी से जांच करा लेते है। मरीजों में एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी की पहचान करना काफी चुनौतीपूर्ण होता है।

अस्पताल में हर महीने करीब 35 से 40 नए मरीज इस बीमारी के पहुंच रहे हैं। यह बीमारी शरीर में अधिकतर गर्दन के आसपास अधिक पाई जाती है।
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कई अंगों में हो सकती है ये बीमारी - फोटो : Adobe Stock
कई अंगों में हो सकता है टीबी का संक्रमण

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि फेफड़ों के अलावा टीबी मस्तिष्क, हड्डियों और जोड़ों, किडनी और आंतों के साथ हृदय को भी प्रभावित कर सकता है।

मस्तिष्क के साथ-साथ कुछ लोगों को हड्डियों और जोड़ों में भी टीबी का संक्रमण हो सकता है। इसे ट्यूबरकुलस ऑस्टियोमाइलाइटिस के नाम से भी जाना जाता है। इस टीबी के कारण प्रभावित हड्डी या जोड़ों में दर्द के साथ सूजन और हड्डियों में विकृति होने का खतरा हो सकता है।

इसके अलावा किडनी में भी टीबी हो सकता है। फेफड़ों से होते हुए संक्रमण आपकी किडनी में भी पहुंच जाता है। किडनी में टीबी के मामले बहुत कम देखे जाते रहे हैं। हालांकि अगर इसका समय पर पहचान और इलाज न किया जाए तो यह गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकता है।


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नोट: 
यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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