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Health Tips: अकेले में खुद से बातें करना पागलपन है या स्मार्टनेस? जानें इसके पीछे का मनोविज्ञान

Fri, 28 Nov 2025 06:53 PM IST
शिखर बरनवाल हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Benefits Of Self-Talk: अकेले में खुद से बातें करना सामान्य तौर पर एक अच्छा और हेल्दी तरीका है। मगर हमारे समाज में इसे कई बार मानसिक संतुलन ठीक न होने के नजरिए से देखा जाता है। इसलिए आइए इस लेख में इसी के बारे में विस्तार जानते हैं कि ये तरीका कितना सही है।
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खुद से बातें करना - फोटो : Adobe Stock
Talking to Yourself Psychology: अकेले में खुद से बातें करना एक ऐसा व्यवहार है जिसे समाज में अक्सर अजीब या यहां तक कि पागलपन का संकेत माना जाता है। मगर मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यह आदत पागलपन नहीं, बल्कि एक सामान्य और प्रभावी मानसिक क्रिया है, जो कई मायनों में हमारी स्मार्टनेस और समस्या-समाधान के क्षमता को बढ़ाती है। इसे अक्सर सेल्फ-टॉक या इनर स्पीच कहा जाता है। 

जब हम खुद से बात करते हैं तो हम अपने विचारों को व्यवस्थित कर रहे होते हैं, समस्याओं को कई दृष्टिकोणों से देख रहे होते हैं, और अपने अगले कदम की योजना बना रहे होते हैं। यह क्रिया मस्तिष्क को उस जानकारी को तेजी से संसाधित करने में मदद करती है जो हमारे दिमाग के अंदर बिखरी हुई होती है। यह बच्चों में संज्ञानात्मक विकास का भी एक नेचुरल हिस्सा है। इसलिए यह आदत अक्सर अधिक एकाग्रता और आंतरिक मार्गदर्शन का संकेत होती है।
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खुद से बातें करना - फोटो : Adobe Stock
एकाग्रता और समस्या-समाधान में सहायक
मनोविज्ञान के अनुसार खुद से बातें करना एकाग्रता बढ़ाने का एक अच्छा तरीका है। जब आप किसी जटिल काम के दौरान खुद से निर्देश देते हैं, जैसे 'पहले यह करो, फिर वह', तो यह आपके दिमाग को ट्रैक पर रखता है और ध्यान भटकने से रोकता है।

यह प्रॉब्लम सॉल्विंग क्वालिटी को भी बढ़ाता है क्योंकि जब आप खुद से बात करते हैं तो तब आप अपनी समस्या को अच्छे से सुनकर उसे अधिक तार्किक तरीके से तोड़ते हैं और अलग-अलग समाधानों का मूल्यांकन करते हैं।
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खुद से बातें करना - फोटो : Adobe Stock
विचारों को स्पष्टता देना 
सेल्फ-टॉक हमारे अव्यवस्थित विचारों को स्पष्टता देने का काम करता है। हमारे दिमाग में जो विचार तेजी से आते-जाते रहते हैं, उन्हें जोर से बोलने पर वे व्यवस्थित रूप ले लेते हैं। यह आपको अपनी भावनाओं को समझने और खुद के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ने में मदद करता है। यह एक प्रकार का आंतरिक पूर्वाभ्यास है जो आपको किसी बड़ी बातचीत या प्रस्तुति के लिए तैयार करता है।

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खुद से बातें करना - फोटो : Adobe Stock
तनाव और भावनाओं का प्रबंधन
खुद से बात करना तनाव और भावनाओं को प्रबंधित करने का एक नेचुरल तरीका है। कठिन परिस्थितियों में खुद को सकारात्मक शब्द (जैसे, 'तुम कर सकते हो,' या 'शांत हो जाओ') बोलना आत्मविश्वास को बढ़ाता है और चिंता को कम करता है। इसे सकारात्मक सेल्फ-टॉक कहा जाता है, जो कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) के स्तर को कम करके मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है।

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खुद से बातें करना - फोटो : Adobe Stock
कब हो सकता है यह चिंता का विषय?
खुद से बात करना सामान्य है, लेकिन यह तब चिंता का विषय बन सकता है जब व्यक्ति हकीकत से कटकर बातें करे, या वह ऐसी आवाजें सुने जो वास्तव में वहां मौजूद न हों। अगर आप खुद से बात करते समय सामाजिक रूप से पीछे हटने लगे हैं, या यह आपकी दिनचर्या में बाधा डाल रहा है, तो किसी मनोवैज्ञानिक से सलाह लेना उचित है।

नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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