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अध्ययन: ऐसे कोविड-19 संक्रमितों में हो सकती है लॉन्ग-लास्टिंग इम्यूनिटी, कोरोना वायरस से मिलेगी जीवनभर की सुरक्षा

Sat, 29 May 2021 06:26 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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कोरोना से मिलेगी हमेशा सुरक्षा - फोटो : iStock
कोरोना संक्रमण के बाद शरीर में बनने वाली एंटीबॉडीज की प्रभाविकता और इसकी मियाद को लेकर काफी समय से चर्चा होती रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि सामान्य तौर पर कोविड से ठीक होने वाले लोगों के शरीर में बनी एंटीबॉडीज तीन से चार महीने में स्वत: नष्ट हो जाती हैं। हालांकि वैज्ञानिकों ने हालिया अध्ययन में एंटीबॉडीज की समयसीमा को लेकर बड़ा खुलासा किया है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि कुछ लोगों के शरीर में सक्रमण के बाद बनी एंटीबॉडीज ता-उम्र प्रभावी रह सकती हैं जो उन्हें कोरोना से स्थायी सुरक्षा प्रदान करती हैं।
आइए इस लेख में अध्ययन के बारे में  विस्तार से जानते हैं।
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एंटीबॉडी-उत्पादक प्रतिरक्षा कोशिकाएं देंगी सुरक्षा - फोटो : iStock
एंटीबॉडी-उत्पादक प्रतिरक्षा कोशिकाएं
अमेरिका के सेंट लुइस स्थित वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने कोरोना संक्रमण के बाद शरीर में बनीं एंटीबॉडीज को लेकर अध्ययन किया। इस अध्ययन के आधार पर अमेरिकी शोधकर्ताओं ने बताया कि कोविड के हल्के लक्षणों से ठीक होने वाले लोगों के शरीर में एंटीबॉडी-उत्पादक प्रतिरक्षा कोशिकाएं विकसित हो जाती हैं। यह कोशिकाएं व्यक्ति को पूरे जीवन वायरस से सुरक्षित रखने में मददगार हो सकती हैं।
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लॉंग-लास्टिंग इम्यूनिटी के बारे में अध्ययन - फोटो : Pixabay
पूरे जीवन मिलती है वायरस से सुरक्षा
अध्ययन से जुड़े प्रोफेसर अली एलेबेडी बताते हैं- 'कोरोना के पहली बार लक्षण दिखने के 11 महीने बाद तक लोगों में हमने एंटीबॉडी-उत्पादक प्रतिरक्षा कोशिकाएं देखी हैं। ये कोशिकाएं सक्रिय रहते हुए पूरे जीवन एंटीबॉडी का उत्पादन कर सकती हैं। इसे लॉन्ग-लास्टिंग इम्यूनिटी के उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है। 77 लोगों पर किए गए अध्ययन के आधार पर वैज्ञानिकों को इस बारे में पता चला  है।'

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बोन मैरो में जाकर कोरोना से सुरक्षा देती हैं कोशिकाएं - फोटो : Pixabay
अध्ययन में क्या पता चला?
वैज्ञानिक बताते हैं- किसी वायरल संक्रमण के दौरान एंटीबॉडी-उत्पादक प्रतिरक्षा कोशिकाएं तेजी से गुणा करके रक्त में फैलती हैं, जिससे उस समय एंटीबॉडी का स्तर काफी ज्यादा हो जाता है। हालांकि जैसे ही संक्रमण ठीक होता है इसमें से अधिकांश कोशिकाएं मर जाती हैं जिससे रक्त में एंटीबॉडी का स्तर गिर जाता है। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि इस दौरान थोड़ी सी मात्रा में एंटीबॉडी-उत्पादक कोशिकाएं (लॉंग लिब्ड प्लाजमा सेल्स) बोन मैरो में जाकर स्थिर हो जाती हैं। यहीं से ही यह कोशिकाएं रक्तप्रवाह में एंटीबॉडीज को पहुंचाती रहती हैं। यह प्रक्रिया ता-उम्र जारी रहती है।
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कई स्तर पर जारी है शोध - फोटो : Social Media
शोधकर्ताओं ने अध्ययन के लिए जिन 77 लोगों को शामिल किया था उनमें से अधिकांश में कोविड-19 के हल्के लक्षणों की शिकायत थी। इनमें से केवल 6 लोगों को ही अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। एलेबेडी और उनके सहयोगी कोविड-19 से ठीक हो चुके लोगों के रक्त में एंटीबॉडी को विभिन्न स्तर को जांचने के लिए शोध कर रहे हैं। 

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स्रोत और संदर्भ: 
SARS-CoV-2 infection induces long-lived bone marrow plasma cells in humans

अस्वीकरण नोट: यह लेख नेचर जर्नल में प्रकाशित वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। लेख में शामिल सूचना व तथ्य आपकी जागरूकता और जानकारी बढ़ाने के लिए साझा किए गए हैं। इसमें बताई गई किसी भी दवा के उपयोग को लेकर अमर उजाला कोई दावा नहीं करता है।
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