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UN Report 2025: भारत में नवजात मृत्यु दर में 70 प्रतिशत की गिरावट, पीएमओ ने सराहा; जानिए कैसे मिली ये सफलता

Thu, 19 Mar 2026 07:46 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

यूनाइटेड नेशंस ने अपनी हालिया रिपोर्ट में भारत में बच्चों की मृत्यु दर में आई भारी गिरावट की सराहना की है। प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने भी इसका जानकारी सोशल मीडिया पर साझा की है।
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शिशु मृ्त्युदर में देखा गया सुधार - फोटो : Amarujala.com
साल 1990-2000 के दौरान भारत में शिशु मृत्युदर गंभीर चिंता का कारण था। साल 2000 में, भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 1000 बच्चों पर  92 से 99 थी। इस गंभीर समस्या को कम करने और शिशु मृत्युदर में सुधार के लिए भारत सरकार ने तमाम प्रयास किए जिसके अब सुखद परिणाम देखे जा रहे हैं।

यूनाइटेड नेशंस ने अपनी हालिया रिपोर्ट में भारत में बच्चों की मृत्यु दर में आई भारी गिरावट की सराहना की है। प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने भी इसका जानकारी सोशल मीडिया पर साझा की है।
 

संयुक्त राष्ट्र के बाल मृत्यु दर अनुमान के लिए इंटर एजेंसी ग्रुप (UNIGME) की नवीनतम रिपोर्ट 2025 के अनुसार, भारत बाल मृत्यु दर को कम करने में वैश्विक प्रगति में एक प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में उभरा है।

इस रिपोर्ट में जन्म के बाद बच्चों के जीवित रहने की दर को सुधारने की दिशा में देश के लगातार किए जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डाला गया है। विशेष रूप से नवजात और पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर से जुड़े संकेतकों के मामले में ये काफी बेहतर प्रयास है। 
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भारत में शिशु मृत्युदर में आई गिरावट - फोटो : Freepik.com
नवजात मृत्यु दर में 70 प्रतिशत की गिरावट 

हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत में नवजात मृत्यु दर में 70 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
 
  • ये 1990 में 57 से घटकर साल 2024 में 17 हो गई है।
  • पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में 79 प्रतिशत की भारी गिरावट देखी गई, जो 1990 में 127 से घटकर 2024 में 27 पर आ गई।

पिछले दो दशकों में, भारत ने दक्षिण एशिया क्षेत्र में बच्चों की मृत्यु दर कम करने के प्रयासों में एक अहम भूमिका निभाई है। इस क्षेत्र में 1990 के बाद से पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में 76 प्रतिशत और 2000 के बाद से 68 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है।

यह भारी कमी मुख्य रूप से भारत जैसे देशों द्वारा किए गए सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों, बेहतर संस्थागत प्रसव प्रणालियों और टीकाकरण के बढ़ते दायरे के कारण संभव हुई है। 

इस क्षेत्र में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में काफी गिरावट आई है, जो 2000 में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 92 मौतों से घटकर 2024 में लगभग 32 रह गई है। यह बच्चों के स्वास्थ्य परिणामों में लगातार हो रही प्रगति को भी दर्शाता है।
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नवजात की देखभाल में सुधार और बच्चों की सेहत - फोटो : Freepik.com
वैक्सीनेशन और शिशु देखभाल में सुधार का दिख रहा असर

यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने खास उपायों की मदद से निमोनिया, दस्त, मलेरिया और जन्म से जुड़ी दिक्कतों से होने वाली मौतों को कम करने में विशेष सफलता प्राप्त की है। विशेषज्ञ कहते हैं, शिशुओं में होने वाली की ज्यादातर मौतें रोकी जा सकती हैं या उनका इलाज मुमकिन है। 
 
  • भारत ने यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम (यूआईपी), अस्पतालों में नवजात की देखभाल और नवजात-बच्चों की बीमारियों के इंटीग्रेटेड मैनेजमेंट जैसे उपायों को बड़े पैमाने पर लागू करके बच्चों के जीवित रहने की दर में काफी सुधार किया है।
  • नवजातों के देखभाल सिस्टम में हुए सुधारों का असर भी स्पष्ट तौर पर देखा जा रहा है। 
  • पूरे दक्षिण एशिया में साल 2000 के बाद से नवजात बच्चों की मौतों में लगभग 60% की कमी आई है।
  • 1 से 59 महीने के बच्चों की मृत्यु दर में 75% से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई है।
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शिशु स्वास्थ्य में सुधार - फोटो : Freepik.com
बच्चों के मृत्युदर में सुधार के लिए भारत द्वारा किए गए कई प्रयासों की सराहना की गई है। प्रशिक्षित लोगों की मौजूदगी में प्रसव, स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (SNCUs) को मजबूत बनाना और प्रसव से पहले और बाद की देखभाल को बेहतर बनाने की इसमें बड़ा योगदान माना जा रहा है।

यहां गौर करने वाली बात ये भी है कि दुनियाभर में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की कुल मौतों के 25 प्रतिशत मामले अब भी दक्षिण एशिया से हैं, लेकिन इस क्षेत्र ने दुनिया में सबसे तेजी से मौतों की दर कम करने में भी अपनी पहचान बनाई है। 



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स्रोत:
Levels and trends in child mortality

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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