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Health Alert: बच्चों का घटता जा रहा है पढ़ाई से फोकस, हो रहे हैं चिड़चिड़े; डॉक्टर से जानिए इसकी वजह

Thu, 17 Jul 2025 05:17 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • क्या आप जानते हैं कि मोबाइल से दिनभर चिपके रहने की आदत सेहत के लिए गंभीर समस्याएं बढ़ाने वाली हो सकती है? विशेषतौर पर बच्चों के मानसिक सेहत पर इसका नकारात्मक असर देखा जा रहा है।
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बच्चों में फोकस की समस्या - फोटो : Freepik.com
Children Mental Health: आज के समय में मोबाइल फोन्स और कंप्यूटर हमारे जीवन के अहम हिस्सा बन चुके हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सभी इससे दिनभर चिपके रहते हैं। दुकान पर पेमेंट करने से लेकर ऑनलाइन सर्फिंग तक, हमारे दिन का एक लंबा समय मोबाइल फोन्स के साथ बीतता है। इस छोटे से उपकरण पर हमारी निर्भरता बीते कुछ वर्षों में काफी बढ़ गई है।

पर क्या आप जानते हैं कि मोबाइल से दिनभर चिपके रहने की ये आदत सेहत के लिए गंभीर समस्याएं बढ़ाने वाली हो सकती है? विशेषतौर पर बच्चों के मानसिक सेहत पर इसका नकारात्मक असर देखा जा रहा है।

कोरोना महामारी के बाद से ऑनलाइन पढ़ाई के बहाने मोबाइल फोन बच्चों की दिनचर्या में इस तरह घुसा कि अब इससे पीछा छुड़ाना मुश्किल होता जा रहा है। लिहाजा स्क्रीन टाइम की बढ़ती आदत ने बच्चों के फोकस, पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर दिया है।
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बच्चों के लिए नुकसानदायक है मोबाइल का अधिक इस्तेमाल - फोटो : Freepik.com
अध्ययनों से क्या पता चला?

जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (जामा) साइकेट्री जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक दिन में 2 घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम वाले बच्चों में ध्यान देने की क्षमता 60% तक कम हो जाती है। इतना ही नहीं मोबाइल फोन्स का बढ़ता इस्तेमाल बच्चों के मूड और व्यवहार में बदलाव का कारण बनता जा रहा है।

जिन बच्चों का स्क्रीन टाइम अधिक है उनमें चिड़चिड़ापन, अधीरता जैसी दिक्कतें भी अधिक देखी जा रही हैं। 
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मोबाइल फोन का अधिक इस्तेमाल - फोटो : Freepik
डिजिटल डिवाइस पर बढ़ती निर्भरता खतरनाक

एम्स द्वारा इसी संबंध में किए गए एक अध्ययन में विशेषज्ञों ने पाया कि भारत में 8 से 14 की आयु वाला हर 3 में से 1 बच्चा डिजिटल डिवाइस पर निर्भर हो चुका है, जो एक तरह की लत है। इसका असर ये है कि इससे उनके लिए किसी एक काम या पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना कठिन हो गया है। 

मोबाइल की लत से होने वाले नुकसान का दूसरा पहलू ये है कि ये बच्चों की नींद को प्रभावित कर रहा है। अध्ययन में पाया गया कि रात को स्क्रीन देखने से नींद की गुणवत्ता 45% तक घटती है, जिससे अगली सुबह स्कूल में एकाग्रता पर असर होता है।

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बच्चों में फोकस न बना पाने की समस्या - फोटो : Freepik.com
क्या है इसके पीछे की वजह?

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं, अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चे के ध्यान और एकाग्रता अवधि पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है, इसके पीछे का साइंस ये है कि स्क्रीन टाइम का बढ़ना बच्चों के संज्ञानात्मक कौशल के विकास को प्रभावित करता है। स्क्रीन वाले उपकरणों के साथ चिपके रहने के चलते बच्चे, अपने दोस्तों-साथियों से कम मिलते हैं जिसके कारण वह वास्तविकता से अलग आभासी दुनिया में ही जीते रहते हैं। 

इसके अलावा रील्स पर स्क्रॉल करते रहने की आदत ने बच्चों को अस्थिर बना दिया है, लिहाजा एक काम पर वे बहुत देर तक फोकस नहीं रह पाते हैं।
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कम कर दें मोबाइल फोन्स का अधिक इस्तेमाल - फोटो : Adobe Stock
इन समस्याओं को कम करने के लिए क्या करें?

डॉक्टर कहते हैं, स्क्रीन का इस्तेमाल बुरा नहीं है, लेकिन बिना कंट्रोल के स्क्रीन टाइम, बच्चों के भविष्य को स्क्रीन के पीछे छिपा सकता है। माता-पिता और स्कूल मिलकर एक ऐसी रणनीति बनाएं जिसमें टेक्नोलॉजी का उपयोग भी हो, लेकिन बच्चों का मानसिक और शैक्षणिक विकास भी बरकरार रहे।
  • रोज के स्क्रीन टाइम का लिमिट सेट करें, विशेषज्ञ 1 घंटे से अधिक स्क्रीन टाइम का इस्तेमाल न करने की सलाह देते हैं।
  • स्क्रीन पर अधिक समय बिताने के बजाय खेल, ड्राइंग, म्यूजिक या आउटडोर एक्टिविटी में बच्चों को व्यस्त रखें।
  • सोने से 1 घंटे पहले मोबाइल बंद करें। इससे नींद बेहतर होगी और अगला दिन फोकस में रहेगा।
  • ऑफलाइन पढ़ाई की आदत बनाएं। किताबों से पढ़ना फिर से नियमित करें, जिससे ध्यान और स्मृति बेहतर हो।




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नोट: यह लेख डॉक्टर्स का सलाह और मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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