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HGPS: इस बीमारी के कारण बच्चों का चेहरा भी दिखने लगता है बूढ़ों जैसा, कैसे कम होगा ये खतरा?

Tue, 21 Oct 2025 08:23 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

 कुछ बच्चे जन्म से ही तेजी से बूढ़े दिखने लगते हैं। यह हचिंसन-गिलफोर्ड प्रोजेरिया सिंड्रोम (एचजीपीएस) नामक दुर्लभ बीमारी का असर है लेकिन हाल में चीन के वैज्ञानिकों ने एक नई उम्मीद जगाई है। 
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उम्र बढ़ने की समय से पहले खतरा - फोटो : Adobe stock
उम्र बढ़ना एक सामान्य प्रक्रिया है। आमतौर पर 50 की उम्र के बाद त्वचा पर इसका असर दिखने लगता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आप अब बुढ़ापे की ओर बढ़ रहे हैं। हालांकि गड़बड़ होती दिनचर्या, खानपान की अशुद्धि के कारण लोगों में समय से पहले बुढ़ापा आने का खतरा बढ़ता जा रहा है। यह समस्या तेजी से युवाओं में बढ़ रही है। इतना ही नहीं, कुछ बच्चे जन्म से ही तेजी से बूढ़े दिखने लगते हैं।

जहां पहले झुर्रियां, सफेद बाल और थकान 50 की उम्र के बाद दिखते थे, वहीं अब यह संकेत 20 या 30 की उम्र में ही नजर आने लगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मानव शरीर की कोशिकाएं समय के साथ खुद को रिपेयर करती हैं, लेकिन जब जीवनशैली असंतुलित हो जाती है तो यह प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है। इससे त्वचा, हड्डियां और मांसपेशियां जल्दी कमजोर होने लगती हैं। 

यही कारण है कि आज कई युवा और बच्चे भी लगातार थकान, तनाव, बाल झड़ने, त्वचा ढीली पड़ने और एकाग्रता की कमी जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं, जो बुढ़ापे के शुरुआती संकेत हैं।
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त्वचा पर उम्र बढ़ने के निशान - फोटो : Adobe stock
गड़बड़ जीवनशैली से प्रभावित हो रही हैं त्वचा की कोशिकाएं

अध्ययन बताते हैं कि नींद की कमी, मोबाइल की ब्लू लाइट, जंक फूड, प्रदूषण, और मानसिक तनाव शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं और एजिंग हार्मोन कोर्टिसोल को सक्रिय कर देते हैं। यही वजह है कि आधुनिक जीवनशैली बच्चों के लिए भी हानिकारक होती जा रही है।

हचिंसन-गिलफोर्ड प्रोजेरिया सिंड्रोम

मेडिकल रिपोर्ट्स बताती हैं कि कुछ बच्चे जन्म से ही तेजी से बूढ़े दिखने लगते हैं। यह हचिंसन-गिलफोर्ड प्रोजेरिया सिंड्रोम (एचजीपीएस) नामक दुर्लभ बीमारी का असर है लेकिन हाल में चीन के वैज्ञानिकों ने एक नई उम्मीद जगाई है। उन्होंने पाया है कि यदि शरीर की कोशिकाओं में लाइसोसोम को सक्रिय किया जाए तो यह बीमारी और समय से पहले आने वाले सामान्य बुढ़ापे की प्रक्रिया दोनों को धीमा किया जा सकता है। यह अध्ययन ‘साइंस’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
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समय से पहले उम्र बढ़ने का खतरा - फोटो : Adobe Stock
अध्ययन में क्या पता चला?

पेइचिंग विश्वविद्यालय और कुनमिंग विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में यह पाया कि कोशिकाओं में मौजूद प्रोजेरिन नामक दोषपूर्ण प्रोटीन एचजीपीएस बीमारी का मुख्य कारण है। यह प्रोटीन कोशिकाओं की दीवार को नुकसान पहुंचाता है, डीएनए को क्षतिग्रस्त करता है और कोशिकाओं को समय से पहले बूढ़ा बना देता है।

शोध में बताया गया है कि सामान्य रूप से लाइसोसोम जिसे कोशिका का सफाईकर्मी कहा जाता है इन हानिकारक प्रोटीनों को हटाने का काम करता है लेकिन एचजीपीएस मरीजों में लाइसोसोम की कार्यक्षमता घट जाती है, जिससे प्रोजेरिन शरीर में जमा होकर बीमारी को बढ़ाता है। 
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उम्र बढ़ने की प्रक्रिया कैसे रोकें? - फोटो : Adobe stock
वैज्ञानिकों ने प्रोटीन काइनेज सी (पीकेसी) को सक्रिय करके और एमटीओआरसी1 नामक प्रोटीन कॉम्प्लेक्स को अवरुद्ध करके लाइसोसोम को दोबारा सक्रिय किया। इससे नए लाइसोसोम बनने लगे और कोशिकाओं से प्रोजेरिन को तेजी से साफ किया गया। इसके प्रभाव से कोशिकाओं में डीएनए की क्षति कम हुई और बुढ़ापे के लक्षणों में उल्लेखनीय कमी आई।

यह शोध संकेत देता है कि बुढ़ापा पूरी तरह अपरिवर्तनीय नहीं है। कोशिकाओं की प्राकृतिक सफाई प्रणाली  लाइसोसोम को पुनः सक्रिय कर इंसान के स्वास्थ्यकाल को बढ़ाया जा सकता है। बच्चों में आने वाले समयपूर्व बुढ़ापे की बीमारी से जूझ रहे परिवारों के लिए यह  खोज नई उम्मीद लेकर आई है।

यह प्रक्रिया महिला और पुरुष दोनों पर प्रभावी

लाइसोसोम को सक्रिय कर बुढ़ापे की प्रक्रिया को धीमा करना महिला और पुरुष दोनों में समान रूप से संभव है, क्योंकि यह कोशिकीय स्तर पर काम करने वाली जैविक प्रक्रिया है न कि लिंग-विशिष्ट। लाइसोसोम का कार्य शरीर की सभी कोशिकाओं में एक जैसा होता है। यह क्षतिग्रस्त प्रोटीन को हटाकर कोशिकाओं को पुनर्जीवित करता है।

जब वैज्ञानिकों ने पीकेसी को सक्रिय करने और एमटीओआरसी1 को अवरुद्ध करने के तरीके अपनाए, तो दोनों ही लिंगों की कोशिकाओं में लाइसोसोम की कार्यक्षमता बढ़ी और बुढ़ापे के संकेत धीमे हुए। चूंकि यह प्रक्रिया डीएनए मरम्मत, कोशिकीय चयापचय और अपशिष्ट निष्कासन से जुड़ी है, इसलिए यह पुरुष और महिला दोनों में समान रूप से प्रभावी मानी जाती है। हालांकि हार्मोनल अंतर इसकी गति और परिणाम को थोड़ा प्रभावित कर सकते हैं।


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स्रोत
Hutchinson–Gilford Progeria Syndrome: Clinical and Molecular Characterization

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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