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प्रेग्नेंसी टेस्ट गाइड: गर्भावस्था में कौन सी जांच कब करानी जरूरी है? हर महीने की लिस्ट देख लें

Fri, 18 Sep 2026 01:16 PM IST
Shruti Gaur हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Important Pregnancy Scans Month Wise: हर गर्भवती को इस बारे में जानकारी होनी चाहिए कि कौन से महीने में आपको कौन सी जांच करानी चाहिए। आइए जानते हैं इस लेख में। 
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प्रेग्नेंसी टेस्ट गाइड - फोटो : AI
Women Health Tip: प्रेग्नेंसी एक महिला के जीवन का सबसे खूबसूरत और संवेदनशील समय होता है, जिसमें एक छोटी सी लापरवाही भी मां और बच्चे दोनों की सेहत पर भारी पड़ सकती है। अक्सर देखा जाता है कि महिलाएं प्रेग्नेंसी कंफर्म होने के बाद डॉक्टर को दिखाती तो हैं, लेकिन सही समय पर जरूरी जांचे और स्कैन नहीं करातीं, जिससे कई बार जोखिम का पता देर से चलता है।

हर महीने होने वाली जांचों का अपना अलग महत्व होता है, जो बच्चे के विकास और मां की हेल्थ के बारे में सही जानकारी देती है। अगर आप भी प्रेग्नेंट हैं या परिवार में कोई प्रेग्नेंट है, तो यह जानना बहुत जरूरी है कि किस महीने में कौन सा टेस्ट और स्कैन कराना अनिवार्य है।

 
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प्रेग्नेंसी टेस्ट गाइड - फोटो : AI
गर्भावस्था में कब-कब कौन सी जांच जरूरी है?

पहली तिमाही — पहले तीन महीने

लगभग 6 से 8 सप्ताह में पहला अल्ट्रासाउंड किया जाता है। इससे गर्भावस्था की स्थिति और स्थान तथा बच्चे की धड़कन की जानकारी मिलती है। 11 से 13 सप्ताह के बीच एनटी स्कैन और डबल मार्कर जांच की जाती है। इन जांचों से बच्चे में डाउन सिंड्रोम जैसी कुछ गुणसूत्र संबंधी असामान्यताओं के जोखिम का आकलन किया जाता है।
 
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प्रेग्नेंसी टेस्ट गाइड - फोटो : AI
दूसरी तिमाही — चौथे से छठे महीने तक

यह गर्भावस्था का एक महत्वपूर्ण चरण होता है। लगभग 18 से 20 सप्ताह में लेवल-2 या एनोमली स्कैन किया जाता है। इसमें बच्चे के मस्तिष्क, हृदय, हड्डियों, गुर्दों और शरीर के अन्य अंगों की बनावट और विकास की जांच की जाती है। लगभग 24 से 28 सप्ताह में मौखिक ग्लूकोज़ सहनशीलता जांच (ओजीटीटी/जीटीटी) की जाती है, जिससे गर्भावस्था के दौरान होने वाली मधुमेह की पहचान की जा सके। इसी अवधि में हीमोग्लोबिन की जांच से खून की कमी यानी एनीमिया का भी पता लगाया जाता है।

 

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प्रेग्नेंसी टेस्ट गाइड - फोटो : AI
तीसरी तिमाही — सातवें से नौवें महीने तक

लगभग 28 से 32 सप्ताह में ग्रोथ स्कैन के माध्यम से बच्चे के विकास, अनुमानित वजन और गर्भ में पानी की मात्रा का आकलन किया जा सकता है। 32 से 36 सप्ताह के बीच जरूरत के अनुसार डॉप्लर स्कैन किया जाता है, जिससे बच्चे और गर्भनाल की ओर रक्त प्रवाह की स्थिति देखी जाती है। गर्भावस्था के अंतिम महीनों में डॉक्टर रक्तचाप, वजन, पेशाब की जांच और एनएसटी जैसी जांचों की सलाह दे सकते हैं। इनसे मां और बच्चे की स्थिति पर नजर रखने तथा प्रसव की योजना बनाने में मदद मिलती है।

 
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प्रेग्नेंसी टेस्ट गाइड - फोटो : AI
 
गर्भावस्था में जांच कराते समय इन बातों का ध्यान रखें

1. बिना सलाह के खाली पेट न जाएं


एनोमली स्कैन या ग्रोथ स्कैन से पहले डॉक्टर के निर्देश के बिना खाली पेट न रहें। कुछ अल्ट्रासाउंड में बच्चे की स्थिति और गतिविधि देखना जरूरी होता है, इसलिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार हल्का भोजन करके जाना उचित हो सकता है। वहीं ओजीटीटी या कुछ अन्य रक्त शर्करा जांचों के लिए खाली पेट रहना जरूरी हो सकता है, इसलिए जांच से पहले प्रयोगशाला या डॉक्टर के निर्देश जरूर जान लें।

2. जांच सही समय पर कराएं

एनटी स्कैन आमतौर पर 11 से 13 सप्ताह के बीच और एनोमली स्कैन लगभग 18 से 20 सप्ताह के बीच किया जाता है। इन जांचों का सही समय डॉक्टर आपकी गर्भावस्था की स्थिति के अनुसार बताते हैं।

3. पुरानी रिपोर्टें साथ लेकर जाएं

हर बार डॉक्टर से मिलने पर अपनी पिछली जांच रिपोर्ट, अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट और वर्तमान में ली जा रही दवाइयों की सूची साथ रखें। इससे डॉक्टर गर्भावस्था की प्रगति को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।

4. डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही जांच कराएं

इंटरनेट पर जानकारी देखकर या किसी दूसरी महिला की गर्भावस्था से तुलना करके अपने-आप कोई जांच न कराएं। हर गर्भावस्था अलग होती है। आपकी स्थिति के अनुसार डॉक्टर जिन जांचों की सलाह दें, उन्हें प्राथमिकता दें।

5. पानी और पेशाब से जुड़ी तैयारी का ध्यान रखें

गर्भावस्था के शुरुआती कुछ अल्ट्रासाउंड में कभी-कभी भरा हुआ मूत्राशय उपयोगी हो सकता है। इसलिए जांच से पहले डॉक्टर या जांच केंद्र से पूछ लें कि पानी पीकर आना है या नहीं। गर्भावस्था के बाद के महीनों में इसकी आवश्यकता आमतौर पर अलग हो सकती है।

 
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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