कोरोना वायरस की जांच
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आसान प्रोसेस
सुमिति बताती हैं कि पहले उनका एक ब्लड टेस्ट हुआ, जिससे देखा गया कि उनके शरीर में एंटबॉडी है या नहीं, उनका हिमोग्लोबिन कितना है, एचआईवी और हेपेटाइटिस जैसी कोई बीमारी तो नहीं। सब चीजें ठीक मिलने के बाद उन्हें प्लाज्मा डोनेट करना था। वो बताती हैं कि उन्हें बस एक सूई लगने भर का दर्द हुआ। उनके शरीर से जो खून निकल रहा था, उसकी ट्यूब एक मशीन में जा रही थी। वो मशीन प्लाज्मा (पीले रंग का) और खून को अलग कर देती थी। उसके बाद खून को वापस उनके शरीर में भेज दिया जाता था।
सुमिति ने 21 अप्रैल को प्लाज्मा डोनेट किया था। डॉक्टर्स ने उन्हें बताया कि उनका प्लाज्मा दो दिन पहले ही एक मरीज को दिया गया है। जिसके बाद मरीज की हालत अब स्थिर है। मरीजों को इससे कितना ज्यादा फायदा मिला है, अभी इसका पता चलने में थोड़ा वक्त और लगेगा। कोरोना से ठीक हुए किसी भी व्यक्ति में अगर एंटीबॉडी मिलती है, अब कोई दवाई नहीं चल रही है, कोई और बीमारी नहीं है तो वो प्लाज्मा डोनेट करने के लिए आगे आ सकता है।
सुमिति कहती हैं, "कोरोना पेशेंट को 10 से 20 दिन अस्पताल में भर्ती रहना पड़ता हैं। इस दौरान हर दो या तीन दिन में ब्लड टेस्ट लिया जाता है या स्वाब टेस्ट होते हैं। ये सभी बहुत अनकंफर्टेबल होता है। कोई भी नहीं चाहता कि प्रिक लगे और कोई इसे इंज्वाय नहीं करता। लेकिन जब आप अस्पताल से बाहर आ जाते हैं तो आपको लगता है कि बस अब ये सब खत्म हो गया। लेकिन जब कोई कहता है कि आपको प्लाज्मा देना है तो आप सोचने लगते हैं कि फिर से उन सब चीजों से गुजरना होगा।"