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Coronavirus: क्यों खास है ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन, पुराने कोरोना संक्रमण से जुड़ी इस स्टडी से जानें

Mon, 20 Jul 2020 04:47 PM IST
निलेश कुमार लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Coronavirus New Research - फोटो : Pixabay/Amar Ujala
कोरोना वायरस का बढ़ता संक्रमण देश और दुनिया के लिए चिंता का सबब बना हुआ है। इस महामारी के संक्रमण से कैसे बचा जा सकता है, इसको लेकर दुनियाभर में तमाम तरह के शोध हो रहे हैं। भारत समेत अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन आदि देश इसकी वैक्सीन बनाने के नजदीक हैं। इसके साथ ही कोरोना वायरस के अन्य उपायों पर भी काम हो रहे हैं। कोरोना संक्रमण से उबरे लोगों में इसके खिलाफ इम्यूनिटी विकसित हो जाती है, लेकिन हाल ही में सिंगापुर के शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि जिन लोगों को कोरोना संक्रमण नहीं हुआ है, उनके अंदर भी इसके खिलाफ इम्यूनिटी हो सकती है। कहा जा रहा है कि इस शोध की मदद से कोरोना महामारी से बचने के तरीके ढूंढने में मदद मिल सकती है। 
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वायरस - फोटो : Pixabay
  • जिस वायरस से कोविड(COVID-19) महामारी फैली है, वह SARS C0V-2 कोरोना वायरस फैमिली का हिस्सा है। जानकर आश्चर्य होगा कि सर्दी, खांसी जैसे सामान्य रोग भी इसी फैमिली के सामान्य वायरस से होते हैं। साल 2003 में फैला SARS (Sever Acute Respiratory Syndrome) वायरस भी कोरोना फैमिली का सदस्य है। साइंस रिसर्च जर्नल 'नेचर' में प्रकाशित शोध अध्ययन के मुताबिक, सार्स जैसे पुराने कोरोना वायरस का संक्रमण झेल चुके लोगों में इस नए कोरोना वायरस से लड़ने की क्षमता हो सकती है। 
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वायरस - फोटो : Pixabay
  • साल 2003 में फैले SARS (Sever Acute Respiratory Syndrome) बीमारी की वजह भी कोरोना वायरस ही था। दुनिया के कई हिस्से में बड़ी आबादी को इसने अपनी चपेट में लिया था, हालांकि इसका भारत में ज्यादा असर नहीं देखा गया था। शोधकर्ताओं का कहना है कि इसका संक्रमण झेल चुके लोगों में सालों बाद लोगों के शरीर में कोरोना से लड़ने की क्षमता मौजूद है। 

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Blood Cells - फोटो : Britanica
  • इस शोध अध्ययन में कहा गया है कि कुछ लोगों के शरीर में टी-सेल्स (खास तरह के श्वेत रक्त कण या ल्यूकोसाइट) होते हैं, जिनका काम संक्रमण को ढूंढकर उसे खत्म करना होता है। वायरस में एक खास तरह का स्ट्रक्चरल प्रोटीन (nucleocapsid) होता है और जब वायरस शरीर के किसी सेल यानी कोशिका को संक्रमित करता है, तो एनएसपी यानी नॉन-स्ट्रक्चरल वायरल प्रोटीन (NSP) पैदा होते हैं। टी-सेल्स में इन दोनों की पहचान करने की क्षमता होती है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
  • रिसर्च के दौरान शोधकर्ताओं को पता चला कि साल 2003 में फैले SARS के 17 साल बाद भी कुछ लोगों में ऐसी टी-कोशिकाएं मौजूद थी, जो SARS-Cov-2 संक्रमण की भी पहचान करने में सक्षम थी। यहां तक कि ऐसे मरीज जिन्हें SARS या COVID-19 नहीं भी रहा या ऐसे संक्रमितों से कॉन्टैक्ट न भी रहा हो, उनमें भी ये टी-कोशिकाएं पाई गईं। ऐसे लोग जो कोविड से ठीक हो चुके हैं, उनमें ऐसे भी ऐसी टी-कोशिकाएं थी, जो वायरस के स्ट्रक्चरल प्रोटीन को बेहतर तरीके से पहचान रही थीं। 
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Blood Cells - फोटो : Youtube Grab
  • शोध अध्ययन में खास बात यह पता चली कि जिन लोगों को पहले इन दोनों में से कोई संक्रमण नहीं हुआ था, उनमें भी ऐसी टी-कोशिकाएं थीं, जो SARS-CoV-2 की पहचान कर पा रही थीं। इस आधार पर शोधकर्ताओं का कहना है कि बड़ी संख्या में लोगों में दूसरे कोरोना वायरस की पैदा की हुई इम्यूनिटी होती है। इंसानों के बीच कोरोना फैमिली के कई वायरल संक्रमण पहले से ही होते आए हैं जो आमतौर पर SARS-CoV-2 की तरह जानलेवा नहीं होते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन क्यों है खास?
  • शोधकर्ताओं की इस रिसर्च के मुताबिक, ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन को खास माना जा रहा है। इस वैक्सीन के ह्यूमन ट्रायल के नतीजे सकारात्मक आए हैं। जिन लोगों पर ट्रायल किया गया था, उनमें केवल एंटीबॉडी ही पैदा नहीं हुई, बल्कि टी-कोशिकाएं भी पैदा हुई है। हालांकि एंटीबॉडी बनना ही वैक्सीन की सफलता के लिए काफी होता है। लेकिन एंटीबॉडी की तुलना में टी-कोशिकाओं द्वारा ज्यादा इम्यूनिटी पैदा होती है। 
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कोरोना वैक्सीन - फोटो : social media
  • सिंगापुर की इस ताजा शोध अध्ययन से इस बात को भी बल मिलता है कि लोगों के शरीर में 17 साल बाद तक टी-कोशिकाएं पाई गईं। एंटीबॉडी के साथ शरीर में टी कोशिकाएं बनाने वाली ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन से ब्रिटेन समेत दुनियाभर की उम्मीद जुड़ी हुई है। मालूम हो कि इस वैक्सीन के सफल होने पर भारतीय कंपनी सीरम इंडिया इंस्टीट्यूट भी उत्पादन करेगी। 
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