महामारी ने बच्चों के टीकाकरण में डाली बाधा
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महामारी के दौरान जरूरी टीकाकरण में आई बाधा
वैश्विक स्तर पर कोरोना महामारी के दौरान बच्चों के नियमित टीकाकरण में बाधा देखी गई। जन्म से लेकर दो साल तक बच्चों को आवश्यक टीके दिए जाते हैं जो उनमें गंभीर बीमारियों से बचाव के लिए प्रतिरक्षा बनाने में मदद करती है। कोरोना संक्रमण के दौरान, विशेषकर पहली-दूसरी लहर में लोग घरों में बंद रहे, जिसके कारण बच्चों को आवश्यक टीके नहीं मिल पाए।
डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ द्वारा
प्रकाशित आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, साल 2020 में 23 मिलियन (2.3 करोड़) बच्चे नियमित टीकाकरण से वंचित रह गए। भारत सहित दुनियाभर के देशों में यह समस्या देखी गई। बच्चों को शुरुआती वैक्सीन न मिल पाने के कारण उनमें भविष्य में संक्रामक बीमारियों का खतरा अधिक देखा जा रहा है।
- डीटीपी की पहली डोज न लेने वालों में भारत सबसे आगे
डीटीपी- डिप्थीरिया, टेटनस और पर्टुसिस (काली खांसी) से सुरक्षा देने वाली वैक्सीन है। इसकी पांच खुराक 2, 4 और 6 महीने, 15-18 महीने और 4-6 साल में दी जाती है।
यूनिसेफ के आंकड़ों से पता चलता है कि जिन बच्चों को इसके शुरुआती डोज नहीं मिल पाएं हैं, उनमें भारत शीर्ष पर है। साल 2019 में भारत में 14.03 लाख बच्चे शुरुआती खुराक से वंचित थे, यह आंकड़ा अगले साल बढ़कर 30.38 लाख हो गया। इसके बाद के देशों में दूसरे स्थान पर पाकिस्तान और फिर इंडोनेशिया, फिलिपिंस, मैक्सिको और मोज़ाम्बिक है।
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ रोहित बताते हैं, साल 1920 के दशक के दौरान, डिप्थीरिया के कारण हजारों मौतें हो जाती थीं। डिप्थीरिया बैक्टीरिया का संक्रमण रक्त में विषाक्तता पैदा करता है, जो हृदय, किडनी और तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकती है। वैक्सीनेशन इस जोखिम को कम कर देती है।
कोरोना के कारण टीकाकरण में आई बाधा को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस एडनॉम घेब्रेयसस ने कहा था, ''जब पूरी दुनिया कोविड-19 के टीकों के लिए संघर्ष कर रही थी उसी दौरान हम बच्चों के लिए आवश्यक अन्य टीकाकरण में पीछे छूट गए, जिससे भविष्य में बच्चों को खसरा, पोलियो जैसी बीमारियों का खतरा हो सकता है। बच्चों के टीकाकरण में तेजी लाना और हर बच्चे को जल्द टीका मिले यह सुनिश्चित करना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है।''
- समय पर टीकाकरण न होने के क्या नुकसान हो सकते हैं?
डॉ रोहित जोशी कहते हैं, जन्म के बाद से ही टीकाकरण की शुरुआत हो जाती है, ये टीके उन्हें पोलियो, हैपेटाइटस-बी, खसरा, जैसी गंभीर बीमारियों से बचाने के लिए जरूरी होते हैं। कुछ दशक पहले तक इनमें से कई बीमारियों के कारण मृत्युदर अधिक देखा जा रहा था, हालांकि टीकाकरण के माध्यम से समय के साथ इसमें काफी नियंत्रण पा लिया गया है।
महामारी के दौरान संक्रमण के जोखिम के कारण स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुईं, जिससे बड़ी संख्या में नवजात को आवश्यक टीके नहीं मिल पाए। इससे बीमारियों के खिलाफ बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने में कमी आ सकती है, जो उन्हें भविष्य में संक्रामक बीमारियों के प्रति संवेदनशील बना सकती है। इस तरह के खतरे से बचाव के लिए संक्रमण की रफ्तार कम होने के साथ ही छूटे बच्चों को टीके दिए जाने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
- जिन बच्चों का टीकाकरण छूट गया है उनके माता-पिता क्या करें?
डॉ रोहित बताते हैं, कोविड की रफ्तार कम होने के बाद ज्यादातर माता-पिता ने वैक्सीनेशन को कैचअप तो कर लिया है, हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में इसको लेकर चुनौतियां हो सकती हैं। शुरुआत के 12 माह के टीके समय पर लगवाने चाहिए, डेढ़ साल के बाद के अधिकतर टीके, बूस्टर डोज के तौर पर दिए जाते हैं।
जिन बच्चों का कोविड के दौरान वैक्सीनेशन नहीं हो पाया है उन्हें जल्द से जल्द टीके लगवाए जाने चाहिए। कुछ टीके जन्म के बाद ही लगा दिए जाते हैं, शेष बचे वैक्सीन को जल्द लगवाया जाना चाहिए।
शहरी क्षेत्रों में टीकाकरण की रफ्तार में तेजी आई और महामारी के दौरान छूटे ज्यादातर बच्चों का वैक्सीनेशन हो गया है, हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी बड़ी बाधा बन रही है। इसपर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।