मासिक धर्म को लेकर वर्षों से चली आ रही सोच में बदलाव की जरूरत
- फोटो : istock
रूढ़िवादिता का दंश झेलती महिलाएं
केस के अंत में एक सवाल बना हुआ था कि आखिर हमारे समाज में पीरियड्स को लेकर इतनी रूढ़िवादिता क्यों है? इस बारे में जानने के लिए हमने कुछ विशेषज्ञों से बात की। वह बताते हैं कि संभवत: प्रतिबंधों को बनाया तो अच्छे के लिए गया था, लेकिन उसे प्रयोग गलत तरीके से लाया जा रहा है। चूंकि पहले परिवार लंबे होते थे, जिसमें घर पर चक्की पीसने, कुएं से पानी लाने जैसे महिलाओं को कई तरह के मेहनत के काम करने होते थे। पीरियड्स के दिनों में उन्हें आराम मिल सके, इस सोच के साथ उन्हें घर के काम नहीं करने दिए जाते थे, हालांकि समाज में इस सोच को गलत तरीके से प्रचारित किया गया, जिसका खामियाजा दशकों से महिलाएं झेल रही हैं।
इस पूरे केस का सार माहवारी को लेकर समाज में व्याप्त रूढ़िवादिता और महिलाओं के सेहत पर पड़ते इसके दुष्प्रभावों के आसपास घूमती नजर आती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बारे में विशेष जागरूकता की आवश्यकता है। पीरियड्स कोई पाप नहीं है, यह एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है, इसे शर्म का विषय क्यों माना जाता रहा है? इस बारे में सभी लोगों को स्व-विचार की आवश्यकता है। हमें अपनी सोच बदलने की जरूरत है, वरना देश में यह कोई अकेला केस या अकेला गांव नहीं है, ऐसे न जाने कितने गांवों में महिलाएं जाने-अनजाने अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ करती आ रही होंगी।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेख स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सुझाव और साझा की गई केस की जानकारी के साथ मेडिकल रिपोर्ट्स/अध्ययनों के आधार पर तैयार किया गया है। अध्ययन की कॉपी संलग्न है।