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Lungs Cancer Day: क्या बच्चों को भी हो सकता है फेफड़ों में कैंसर? स्मोकिंग नहीं, तो फिर क्या हैं इसके कारण

Sat, 01 Aug 2026 02:17 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

अध्ययनों के अनुसार, वायु प्रदूषण, सेकेंड हैंड स्मोक, कुछ रसायनों का संपर्क, फेफड़ों की बीमारी और कैंसर के खतरे को बढ़ा सकती हैं। क्या बच्चों में भी लंग्स कैंसर का खतरा रहता है?
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बच्चों में लंग्स कैंसर के मामले - फोटो : Amarujala.com/AI
लंग्स कैंसर वैश्विक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बना हुआ है, ये कैंसर से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण भी है। आंकड़ों के मुताबिक हर साल करीब 25 लाख लोगों में इस कैंसर का पता चलता है और लंग्स कैंसर के कारण करीब 18 लाख लोगों की मौत हो जाती है।

फेफड़ों के कैंसर को लंबे समय से धूम्रपान करने वालों की बीमारी माना जाता रहा है। लेकिन वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट में हमने बताया था कि अब ये कैंसर उन लोगों में भी बढ़ता जा रहा है जिन्होंने कभी सिगरेट को हाथ तक नहीं लगाया है। प्रदूषण और रसायनों के साथ सेकेंड हैंड स्मोकिंग को इसके लिए जिम्मेदार माना जाता रहा है। बच्चे भी प्रदूषित हवा, कई तरह के रसायनों और सेकेंड हैंड स्मोकिंग के संपर्क में आ सकते हैं।

ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि क्या बच्चों में भी लंग्स कैंसर हो सकता है?
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फेफड़ों में बढ़ते कैंसर के मामले - फोटो : Adobe Stock
कम उम्र वालों में बढ़ते लंग्स कैंसर के मामले

दुनियाभर में लंग्स कैंसर को लेकर जागरूकता बढ़ाने, बीमारी का जल्द पता लगाने और प्रभावित लोगों की मदद करने के लिए हर साल 1 अगस्त को 'वर्ल्ड लंग कैंसर डे' मनाया जाता है। 

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, कैंसर का खतरा अब कम उम्र वालों में भी बढ़ता देखा जा रहा है। बच्चे भी इसका शिकार हो सकते हैं। हालांकि बच्चों में लंग्स कैंसर को लेकर स्थिति थोड़ी अलग है। उनमें फेफड़ों का प्राथमिक कैंसर बहुत कम होता है। हालांकि यदि बच्चा लंबे समय तक सेकेंड हैंड स्मोकिंग, वायु प्रदूषण जैसी परिस्थितियों के संपर्क में रहता है तो भविष्य में जोखिम बढ़ सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, बच्चों में फेफड़ों का कैंसर बहुत दुर्लभ माना जाता है। बच्चों में होने वाले सभी तरह के कैंसर में लंग्स कैंसर के मामले 0.2% से भी कम है। 
 
  • वयस्कों की तुलना में, बच्चों में फेफड़ों के ट्यूमर का संबंध शायद ही कभी धूम्रपान या पर्यावरण के प्रदूषकों से होता है। 
  • इसके लिए मुख्य रूप से जेनेटिक कारणों, जीन में म्यूटेशन या रेडॉन गैस जैसे दुर्लभ पर्यावरणीय कारणों से होता है।
  • धूम्रपान जैसी जीवनशैली से जुड़ी आदतों के कारण बच्चों में लंग्स कैंसर का जोखिम नहीं देखा जाता है। 
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पैसिव स्मोकिंग का असर - फोटो : Adobe Stock
सेकेंड हैंड स्मोकिंग हो सकता है बड़ा कारण

यदि आप स्वयं धूम्रपान नहीं करते, लेकिन घर-ऑफिस या सार्वजनिक स्थानों पर लगातार तंबाकू के धुएं के संपर्क में रहते है, तो इसे सेकेंड हैंड स्मोक कहा जाता है। 
 
  • बच्चों में भी ये फेफड़ों की बीमारी और गंभीर तरह के कैंसर को बढ़ाने वाली हो सकती है।
  • बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों पर इसका प्रभाव अधिक गंभीर हो सकता है। 
  • ऐसे वातावरण में रहने वाले बच्चों में लंबे समय में फेफड़ों की गंभीर समस्याओं का जोखिम हो सकता है।

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वायु प्रदूषण का क्या असर होता है? - फोटो : Adobe Stock
वायु प्रदूषण भी बड़ा जोखिम

बढ़ता वायु प्रदूषण भी अब फेफड़ों के कैंसर के प्रमुख जोखिम कारकों में से एक है। 
 
  • पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्म कण फेफड़ों की गहराई तक पहुंचकर कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं। 
  • लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने वाले लोगों में कैंसर सहित कई श्वसन रोगों का खतरा बढ़ सकता है। 
  • बच्चों के फेफड़े विकसित हो रहे होते हैं, इसलिए प्रदूषण का प्रभाव उन पर अधिक पड़ सकता है। 
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फेफड़ों की समस्याओं के बारे में जानिए - फोटो : Adobe Stock
आनुवंशिक कारणों का जोखिम

कुछ लोगों में फेफड़ों के कैंसर का जोखिम आनुवांशिक या जीन में बदलाव के कारण अधिक हो सकता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि बीमारी निश्चित रूप से होगी, लेकिन ऐसे लोगों को नियमित स्वास्थ्य जांच की जरूरत होती है। यदि परिवार में पहले किसी को कम उम्र में फेफड़ों का कैंसर हुआ हो, तो ऐसे लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए।


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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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