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सावधान: अकेलेपन की स्थिति सिर्फ चिंता-अवसाद ही नहीं, डायबिटीज का भी बढ़ा रही है खतरा, अध्ययन में दावा

Mon, 03 Oct 2022 04:27 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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अकेलेपन के कारण होने वाली समस्याएं - फोटो : istock
डायबिटीज के बढ़ते वैश्विक जोखिम को लेकर विशेषज्ञ चिंतित हैं। साल-दर-साल इस मेटाबॉलिक रोग के मामले बढ़ते जा रहे हैं। 42 करोड़ से अधिक लोग इस गंभीर स्वास्थ्य समस्या के शिकार हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, गड़बड़ लाइफस्टाइल और आहार से संबंधित समस्याओं के कारण लोगों में इस विकार के मामले काफी तेजी से बढ़ गए हैं, यह समस्या किसी भी उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकती है, जिससे बचाव करते रहना आवश्यक है। इस बीच टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम कारकों के बारे में जानने के लिए शोध कर रही विशेषज्ञों की टीम ने बड़ा दावा किया है।

जर्नल ऑफ यूरोपियन एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ डायबिटीज में हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में शोधकर्ताओं की टीम ने बताया कि जो लोग अकेलेपन के शिकार है, उनमें अन्य लोगों की तुलना में टाइप-2 डायबिटीज विकसित होने का जोखिम अधिक हो सकता है।

मानसिक स्वास्थ्य के डायबिटीज से संबंधों के बारे में जानने के लिए अध्ययन कर रही वैज्ञानिकों की टीम ने पाया कि लोनलीनेस एक गंभीर स्थिति है जिससे न सिर्फ अवसाद और अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम होता है साथ ही यह डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों के विकसित होने का भी कारण बन सकती है। आइए इस अध्ययन के बारे में आगे विस्तार से समझते हैं।
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अकेलेपन और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा - फोटो : istock
अकेलेपन की भावना और टाइप-2 डायबिटीज

वेस्टर्न नॉर्वे यूनिवर्सिटी ऑफ एप्लाइड साइंसेज में एसोसिएट प्रोफेसर रोजर ई. हेनरिक्सन और उनके सहयोगियों द्वारा किए गए इस अध्ययन में अकेलेपन की स्थिति को टाइप-2 डायबिटीज को बढ़ाने वाला एक कारक पाया है। शोधकर्ताओं की टीम ने पाया कि अकेलेपन की भावना क्रोनिक या फिर लंबे समय तक चलने वाली समस्याएं पैदा कर सकती है, जो शारीरिक तनाव प्रतिक्रिया को सक्रिय कर सकता है।

इसे टाइप-2 डायबिटीज के विकास में एक कारक के तौर पर देखा गया है। इस तरह के परिवर्तन के कारण कोर्टिसोल हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है जिसे  इंसुलिन प्रतिरोध के कारक के तौर पर जाना जाता है। 
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अकेलेपन के कारण बढ़ती स्वास्थ्य समस्याएं - फोटो : istock
अध्ययन में क्या पता चला?

इस शोध के लिए वैज्ञानिकों की टीम ने 2.30 लाख से अधिक लोगों के मेडिकल परीक्षण और ब्लड सैंपल के डेटा का अध्ययन किया। कई स्तर पर किए गए इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन लोगों में किसी भी कारणवश अकेलेपन की दिक्कत थी, उनमें समय के साथ टाइप-2 डायबिटीज विकसित होने की आशंका अधिक पाई गई। ऐसे लोगों में पुरुषों की संख्या अधिक थी।

13 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अकेलेपन की भावनाओं की सूचना दी थी। आगे के विश्लेषण से पता चला कि अनिद्रा भी इस जोखिम को बढ़ाने वाला कारक हो सकती है। डायबिटीज के बढ़ते खतरे को ध्यान में रखते हुए सभी लोगों सावधानी बरतते रहने की सलाह दी जाती है।

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टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम कारकों को जानिए - फोटो : iStock
क्या कहते हैं शोधकर्ता?

अध्ययन से प्राप्त परिणाम के आधार पर शोधकर्ता सलाह देते हैं कि अकेलेपन को भी टाइप-2 डायबिटीज  से संबंधित नैदानिक विश्लेषणों में शामिल किया जाना चाहिए। प्रोफेसर रोजर कहते हैं, यह महत्वपूर्ण है कि डॉक्टर्स नैदानिक परामर्श के दौरान व्यक्ति की चिंताओं के बारे में भी बातचीत करें जिसमें अकेलेपन और सामाजिक संपर्क के संबंधों का अंदाजा लगया जा सके।

यदि रोगियों में अकेलेपन की स्थिति के बारे में पता चलता है तो इस बारे में किसी मनोरोग विशेषज्ञ से जरूर सलाह ली जानी चाहिए, क्योंकि ऐसी स्थिति में मनोवैज्ञानिक समस्याओं का इलाज भी डायबिटीज को ठीक करने में आवश्यक हो सकता है। 
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अकेलेपन का मानसिक स्वास्थ्य पर असर - फोटो : istock
अकेलेपन की समस्या गंभीर

अध्ययनकर्ता कहते हैं, इस अध्ययन से पता चलता है कि लोगों से कट कर रहना या अकेलेपन से परेशान रहना न सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य बल्कि शारीरिक समस्याओं के लिए भी हानिकारक स्थिति है। यदि आप भी अकेलेपन के शिकार हैं तो इस बारे में किसी मनोरोग विशेषज्ञ से संपर्क करके स्थिति का सही प्रबंधन सुनिश्चित करें, ऐसा करके भविष्य में डायबिटीज के शिकार होने के जोखिम को कम किया जा सकता है।

शोधकर्ता कहते हैं, मानसिक स्वास्थ्य की अन्य स्थितियां किस प्रकार से डायबिटीज को प्रभावित करती है इस बारे में जानने के लिए शोध किया जा रहा है। 



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स्रोत और संदर्भ
Loneliness associated with double the risk of developing diabetes

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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