वायु प्रदूषण से होने वाले खतरे
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प्रदूषण कैसे बढ़ा रहे हैं आत्महत्या के खतरे
शोधकर्ताओं ने इसके कारणों को समझाते हुए बताया कि आर्सेनिक, लेड, लिथियम या नाइट्रेट जैसे पदार्थों से होने वाला वायु और जल प्रदूषण, क्रॉनिक इंफ्लेमेशन और तंत्रिका तंत्र पर असर डाल सकता है। तंत्रिका तंत्र वह व्यवस्था है जो दिमाग और शरीर के अलग-अलग हिस्सों के बीच संदेश पहुंचाती है।
- क्रॉनिक इन्फ्लेमेशन और नसों को नुकसान के कारण दिमाग के सामान्य कामकाज पर असर पड़ सकता है और व्यक्ति के मूड तथा तनाव से निपटने की क्षमता में बदलाव आ सकता है।
- इसी तरह ट्रैफिक और दूसरे पर्यावरणीय शोर के साथ-साथ रोशनी का प्रदूषण भी तनाव बढ़ाने से जुड़ा हो सकता है।
- लगातार शोर या रात में ज्यादा रोशनी शरीर की बॉडी क्लॉक यानी सोने-जागने और शरीर के दूसरे कामों को नियंत्रित करने वाली प्राकृतिक घड़ी को प्रभावित कर देती है, जिसके कारण तनाव प्रबंधन और समस्याओं से निपटना कठिन हो जाता है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
ऑस्ट्रेलिया की कर्टिन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ पॉपुलेशन हेल्थ के प्रोफेसर बेन मुलिंस कहते हैं, यह उन शुरुआती बड़े विश्लेषणों में से एक है, जिसमें वायु प्रदूषण और आत्महत्या के बीच संबंध को एक साथ कई अध्ययनों के आधार पर देखा गया है। यह पहले से पता है कि कई वायु प्रदूषक शरीर और दिमाग पर अलग-अलग तरह के तंत्रिका संबंधी प्रभाव डाल सकते हैं। इनका संबंध अवसाद और चिंता जैसी समस्याओं से भी देखा गया है।
हालांकि प्रोफेसर मुलिंस कहते हैं, अध्ययनों का सैंपल साइज छोटा था। साथ ही, शोधकर्ताओं ने ऐसे दूसरे कारणों को पर्याप्त रूप से नहीं देखा, जो नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए इसकी पुष्टि करने के लिए और ज्यादा अध्ययनों की जरूरत है।
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स्रोत:
Environmental exposure and risk of death by suicide, attempted suicide and suicide ideation: a systematic review and meta-analysis
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