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अध्ययन में चौंकाने वाला दावा: इलाज के बाद भी सालों तक दिमाग में छिपा रह सकता है यह वायरस, मौत का बन सकता है कारण

Sat, 12 Feb 2022 03:51 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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मस्तिष्क में लंबे समय तक देखा गया इबोला वायरस - फोटो : iStock
दुनियाभर में पिछले दो साल से अधिक समय से कोरोना का कहर जारी है। यह बेहद खतरनाक वायरस, वैश्विक स्तर पर अब तक लाखों लोगों की मौत का कारण बन चुका है। इस बीच एक हालिया अध्ययन में वैज्ञानिकों ने जो दावा किया है, उसने लोगों की चिंता काफी बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों के मुताबिक बेहद घातक माना जाने वाला इबोला वायरस इलाज के बाद भी पूरी तरह से खत्म नहीं होता है। इतनी ही नहीं इलाज से ठीक होने के बाद भी कई संक्रमितों के दिमाग में यह वायरस सालों तक छिपा रह सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के कई देशों में इबोला का कहर देखने को मिला है, ऐसे में इससे संक्रमित रह चुके लोगों को डॉक्टर की सलाह पर जांच करा लेनी चाहिए।

इबोला वायरस रोग (ईवीडी)  एक दुर्लभ और घातक बीमारी है। उप-सहारा अफ्रीका वाले हिस्सों में इसके संक्रमण के मामले ज्यादा देखे जाते रहे हैं। कोरोना की तरह ही यह भी ज्यादातर चमगादड़ों के कारण फैलता है। इसके अलावा इबोला वायरस से संक्रमित  या मृत व्यक्ति के सीधे संपर्क में आने से भी लोगों में ईवीडी होने की आशंका बढ़ जाती है। हालिया अध्ययन में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इसके मस्तिष्क में वर्षों तक मौजूद रहने के संकेत गंभीर समस्याओं का कारण बन सकते हैं। 
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इबोला का खतरा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock
इलाज के बाद भी खत्म नहीं होता इबोला वायरस
इबोला के खतरे को लेकर अध्ययनकर्ताओं की टीम ने उन प्रतिभागियों को शामिल किया जो अफ्रीका में हाल ही में इबोला वायरस के प्रकोप में संक्रमण से ठीक हुए थे। यू.एस. आर्मी मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ इंफेक्शियस डिजीज के प्रमुख डॉ ज़ेंग और उनकी टीम ने अध्ययन के दौरान पाया कि इलाज के बाद भी इबोला का वायरस शरीर से पूरी तरह खत्म नहीं होता है। कुछ लोगों के दिमाग में यह वर्षों तक छिपा रह सकता है, जिससे भविष्य में गंभीर समस्याओं का जोखिम बढ़ जाता है। 
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मस्तिष्क में देखा गया इबोला वायरस - फोटो : pixabay
क्या कहते हैं अध्ययनकर्ता?
अध्ययनकर्ता डॉ जेंग बताते हैं, यह पहला अध्ययन है जिससे पता चलता है कि इलाज के बाद भी लंबे समय तक इबोला वायरस शरीर में छिपा रह सकता है। इंसानों और बंदरों पर किए गए अध्ययन में इसके प्रमाण मिलते हैं। हमने पाया कि मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थेरेप्यूटिक्स के साथ घातक इबोला संक्रमण से ठीक हुए लगभग 20 प्रतिशत बंदरों में अभी भी संक्रमण पैदा करने वाले वायरस मौजूद थे। विशेष रूप से मस्तिष्क केवेंट्रिकुलर सिस्टम में वायरस की मौजूदगी देखी गई है। मस्तिष्क के इसी हिस्से में सेरेब्रोस्पाइन फ्ल्यूड का उत्पादन और संचय होता है। शरीर के सभी अंगों से वायरस के खत्म हो जाने के बाद भी यह मस्तिष्क में रह सकता है। 

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इबोला संक्रमण के लक्षणों को लेकर रहें सावधान - फोटो : iStock
बढ़ गई है वैज्ञानिकों की चिंता
अध्ययनकर्ताओं ने बताया कि जो लोग पहले इबोला से ठीक हो चुके थे उनमें दोबारा से बीमारी के लक्षण भी देखे गए। इसके अलावा एक अन्य मामले में पाया गया कि इबोला से बचाव का टीकाकरण करा चुके एक व्यक्ति की संक्रमण के छह महीने बाद मौत हो गई। संक्रमण के दौरान मोनोक्लोनल एंटीबॉडी चिकित्सीय के माध्मय से उसका इलाज किया गया था, हालांकि इसके बावजूद उसके मस्तिष्क में वायरस की मौजूदगी थी।
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भारत में इबोला आउटब्रेक 2021 - फोटो : iStock
भारत में इबोला का कहर
भारत के संदर्भ में बात करें तो यहां भी साल 2014 में केरल में इबोला का आउटब्रेक देखा गया थी। अफ्रीकी उपमहाद्वीप के संक्रमित क्षेत्रों से भारत आए लोगों के माध्यम से यह संक्रमण फैला था। इबोला वायरस से संक्रमितों में मलेरिया, टाइफाइड बुखार या मेनिनजाइटिस के समान लक्षण होते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ सभी प्रभावित क्षेत्र के लोगों को इस संक्रमण से बचाव की सलाह देते हैं। 


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स्रोत और संदर्भ 
Ebola virus persistence and disease recrudescence in the brains of antibody-treated nonhuman primate survivors

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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