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कोरोना का दोबारा संक्रमण: क्या है बीमारी का लौट कर आना, क्या वैक्सीन के बाद भी रहेगा इसका खतरा?

Thu, 15 Oct 2020 05:42 PM IST
निलेश कुमार लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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कोरोना का दोबारा संक्रमण (Coronavirus Reinfection) - फोटो : iStock/Amar Ujala
कोरोना महामारी से जूझ रही दुनिया के सामने जो नई चुनौती आ खड़ी हुई है, वह है इसके दोबारा संक्रमण की। दुनिया के 210 से ज्यादा देश कोरोना वायरस संक्रमण से जूझ रहे हैं। जनसाधारण के लिए वैक्सीन की अनुपलब्धता के बीच हर दिन कोरोना के मामले बढ़ तो रहे हैं, लेकिन दवाओं और उपचार के अन्य तरीकों की बदौलत लोग तेजी से ठीक भी हो रहे हैं। हालांकि कोरोना से एक बार ठीक हो जाने के बाद लोग फिर से कोरोना संक्रमित हो रहे हैं और दोबारा संक्रमण के ऐसे मामलों ने चिंता बढ़ाई है। आईसीएमआर यानी भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के मुताबिक, भारत में भी दोबारा संक्रमण के तीन मामले सामने आए हैं। दोबारा संक्रमण के मामलों की पहली बार पुष्टि करते हुए आईसीएमआर के महानिदेशक बलराम भार्गव ने दोबारा संक्रमित होने की समय सीमा 100 दिन तय किए जाने की बात कही है। 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पिक्साबे
कोरोना के दोबारा संक्रमण के पहले मामले की आधिकारिक पुष्टि अगस्त के आखिरी सप्ताह में हुई थी, जब हांगकांग में 33 वर्षीय युवक के केस ने दुनियाभर के वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा। वह युवक मार्च में पहली बार संक्रमित हुआ था और फिर अगस्त में दोबारा कोरोना पॉजिटिव पाया गया। हालांकि अब भी कुछ विशेषज्ञों का यही कहना है कि दोबारा संक्रमण के मामले दुर्लभ हैं। उनके मुताबिक, जो मरीज इस वायरस से पूरी तरह रिकवर नहीं हो पाते तो ऐसी स्थिति में उसके दोबारा संक्रमण होने की संभावना बनी रहती है। इसे बीमारी का पलटना या वापस लौटना भी कहा जा सकता है।  
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कोरोना वायरस वैक्सीन - फोटो : iStock
आईसीएमआर के डीजी बलराम भार्गव का कहना है, "अबतक विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह नहीं बताया कि कोई व्यक्ति 90 दिन, 100 दिन या 120 दिन बाद दोबारा संक्रमित हो सकता है। लेकिन हमने इसकी समय सीमा 100 दिन तय कर दी है। किसी मरीज के ठीक होने के 100 दिन तक दोबारा संक्रमित होने का खतरा रहता है। डब्ल्यूएचओ की तरफ से हमें कुछ डाटा मिला है, जिसमें दुनियाभर में दोबारा संक्रमण के दो दर्जन मामलों की चर्चा है। दोबारा संक्रमित होने वाले लोगों से टेलीफोन पर बात कर कुछ और डाटा एकत्र करने की कोशिश की जा रही है।" 

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एंटीबॉडी परीक्षण - फोटो : social media
शरीर में कबतक बनी रह सकती है एंटीबॉडी? 
हांगकांग वाले मामले में साढ़े चार महीने के अंदर शख्स के शरीर में कोरोना वायरस के खिलाफ बनी एंटीबॉडी खत्म हो गई थी। आईसीएमआर के मुताबिक, कई अध्ययनों में भी यह सामने आया है कि एक बार संक्रमित होने वाले व्यक्ति के शरीर में आमतौर पर चार महीने तक एंटीबॉडीज मौजूद रहती है। इससे पहले 50 दिन के अंदर एंटीबॉडी खत्म होने की भी बात कही जा चुकी है। वहीं, मुंबई के जेजे अस्पताल में की गई एक स्टडी में पाया गया कि तीन से पांच हफ्ते पहले कोरोना पॉजिटिव हुए लोगों में से 90 फीसदी लोगों में महज 38.8 फीसदी एंटीबॉडी ही बची थी। 
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COVID-19 research - फोटो : ANI
अमेरिका की एरिजोना विश्वविद्यालय में हुए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि एक बार कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद शरीर में कम से कम पांच महीने के लिए कोरोना महामारी के प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है। शोधकर्ताओं ने कोरोना वायरस से संक्रमित हुए लगभग छह हजार लोगों के नमूनों में उत्पन्न हुए एंडीबॉडी का अध्ययन करने के बाद यह बात कही है। शोध के मुताबिक, जब वायरस कोशिकाओं को पहली बार संक्रमित करता है तब प्रतिरक्षा तंत्र, वायरस से लड़ने के लिए कुछ देर जीवित रहने वाली प्लाज्मा कोशिकाओं को तैनात करता है जो एंटीबॉडी उत्पन्न करती हैं। यह एंटीबॉडी पांच महीने तक रह सकती है। 
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Coronavirus Research - फोटो : iStock/Amar Ujala
क्या वैक्सीन के बाद भी रहेगा खतरा?
एक सवाल यह भी है कि वैक्सीन से विकसित हुई एंटीबॉडी लोगों के शरीर में कितने दिनों तक रह पाएगी! या फिर टीकाकरण अभियानों से पैदा हुई हर्ड इम्यूनिटी की स्थिति कबतक कोरोना से बचा पाएगी? न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुरोध पर रिपोर्ट की समीक्षा करने वालीं येल यूनिवर्सिटी के इम्यूनोलॉजिस्ट यानी प्रतिरक्षाविद् अकीको इवासाकी का कहना है कि टीकाकरण के बाद इस संभावना पर तो विराम लगेगा। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक रूप से विकसित हुई इम्यूनिटी बीमारी को रोकती है, लेकिन दोबारा संक्रमण को भी किस हद तक रोकेगी, यह कह पाना थोड़ा मुश्किल है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
विशेषज्ञों के मुताबिक, वायरस या बैक्टीरिया संक्रमण होने पर शरीर में एंटीबॉडीज बनती हैं। अलग-अलग बीमारियों में एंटीबॉडीज बनने का समय अलग-अलग होता है। कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद शरीर में वायरस से लड़ने के लिए विकसित होने वाली एंटीबॉडी ही वायरस को दोबारा लौटने से रोकती है। लेकिन इस एंटीबॉडी की भी वैधता होती है। इवासाकी ने कहा कि हर्ड इम्यूनिटी विकसित करने के लिए एक मजबूत, सुरक्षित और कारगर वैक्सीन की जरूरत पड़ेगी, जो बीमारी और दोबारा संक्रमण की संभावना, दोनों को रोके। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
दोबारा संक्रमण की समय-सीमा 100 दिन 
आधिकारिक तौर पर कोरोना वायरस के दोबारा संक्रमण के बहुत सारे मामले सामने नहीं आए हैं। इसलिए अभी यह कह पाना मुश्किल है कि आखिर पहली बार संक्रमण होने के कितने दिन बाद तक दोबारा संक्रमण हो सकता है। हालांकि आईसीएमआर ने इसकी समय-सीमा 100 दिन तय कर दी है। कारण कि करीब इतने ही दिनों तक शरीर में एंटीबॉडी रहने की संभावना रहती है। यानी 100 दिन के बाद शरीर में कोरोना के खिलाफ बनीं एंटीबॉडी नष्ट हो सकती है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
100 दिन बाद दोबारा संक्रमण को नया केस माना जाएगा?
आईसीएमआर के मुताबिक, कोरोना से उबरने के 100 दिन बाद यदि मरीज फिर से संक्रमित होता है तो उसे दोबारा संक्रमण नहीं माना जाएगा, बल्कि उसे कोरोना का नया मामला माना जाएगा। दोबारा संक्रमण का मतलब है कि पहली बार संक्रमण से ठीक होने के बाद मरीज के शरीर में जो एंटीबॉडीज बनी थी वो नष्ट हो गई। डॉयचे वेले की एक रिपोर्ट के मुताबिक, आईसीएमआर का मानना है कि अगर कोविड-19 से ठीक हुए किसी व्यक्ति को 100 दिनों के बाद फिर से संक्रमण हो जाता है तो उसे दोबारा संक्रमण का मामला नहीं कहा जाएगा। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
कोरोना वायरस का आनुवंशिक विश्लेषण करते हुए शोधकर्ताओं ने पाया था कि दोबारा संक्रमण के पहले मामले में हांगकांग निवासी वह युवक वायरस के अलग-अलग स्ट्रेन से संक्रमित हुआ था। पिछले दिनों राम मनोहर लोहिया अस्पताल, नई दिल्ली के विशेषज्ञ डॉ. ए के वार्ष्णेय ने आकाशवाणी के एक साक्षात्कार में कहा था, "कई बार ऐसा होता है कि वायरस अपना रूप बदल कर आता है। ऐसे में पहले वाली एंटीबॉडी प्रभावी तौर पर अपना काम नहीं कर पातीं।"
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Coronavirus Reinfection - फोटो : iStock/Amar Ujala
डॉ. वार्ष्णेय का कहना था कि कोरोना की जांच नाक और मुंह से की जाती है, लेकिन कई बार वायरस का प्रभाव फेफड़े में रह जाता है। ऐसे में बाद में उसके प्रभावित करने की संभावना रह सकती है। इसलिए कम मामलों से किसी नतीजे पर पहुंचना सही नहीं है। हालांकि अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि पहले संक्रमण से पूरी तरह ठीक हो जाने के बाद लोगों को दोबारा संक्रमण हुआ, या फिर उनके शरीर में पहले संक्रमण का वायरस मौजूद ही रह गया था। विशेषज्ञों का मत है कि दोबारा कोरोना संक्रमण होने और एंटीबॉडी की वैधता पर विस्तार से शोध अध्ययन की जरूरत है। 

(नोट: यह रिपोर्ट कोरोना वायरस संबंधित शोध अध्ययनों और विशेषज्ञों की राय के आधार पर तैयार की गई है। इस मामले में आईसीएमआर समेत अन्य संस्थानों द्वारा शोध जारी हैं, इसलिए इसे अंतिम परिणाम नहीं माना जा सकता।)
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