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Health Alert: इस तरह से पानी पीना कहीं आपमें बढ़ा न दे कैंसर का खतरा? आप भी तो नहीं कर रहे ये भूल

Sat, 16 Aug 2025 10:08 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • कैंसर विशेषज्ञ बताते हैं, बाजार में आसानी से उपलब्ध प्लास्टिक की बोतलों से पानी नहीं पीना चाहिए। इसमें बिस्फेनॉल ए (बीपीए) नामक रसायन होता है जिसमें कैंसरकारक तत्व पाए जाते हैं।
  • बच्चों को भी प्लास्टिक की बोतलों से दूध न पिलाएं। इससे उनकी सेहत पर भी कई तरह से नकारात्मक असर हो सकता है।
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प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल हानिकारक - फोटो : Adobe Stock
अच्छी सेहत के लिए खान-पान को ठीक रखने, नियमित व्यायाम के साथ दिनभर में खूब मात्रा में पानी पीते रहने की सलाह दी जाती है। ये शरीर से विषाक्तता को दूर करने, खून को पतला रखने, शरीर का तापमान ठीक रखने के साथ कई प्रकार की बीमारियों से बचाए रखने में भी आपके लिए मददगार हो सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ सभी लोगों को दिनभर में कम से कम 2-3 लीटर पानी जरूर पीते रहने की सलाह देते हैं।

अब अगर आपसे कहा जाए कि आपके पानी पीने का तरीका ठीक नहीं है, इससे कैंसर का खतरा हो सकता है। क्या आप इसपर भरोसा करेंगे? कई अध्ययनों की रिपोर्ट ऐसा ही कुछ बताती हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, गिलास या अन्य धातुओं से बने बर्तन में पानी पीना सुरक्षित है, पर अगर आप प्लास्टिक की बोतलों से पानी पीते हैं तो ये आपकी सेहत के लिए कई प्रकार से नुकसानदायक हो सकता है। विशेषज्ञ कहते हैं, प्लास्टिक की बोतलों को बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले रसायन कुछ परिस्थितियों में पानी में घुल सकते हैं, जिससे शरीर में माइक्रोप्लास्टिक और हानिकारक रसायनों के कारण कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का जोखिम हो सकता है।

आइए इसको विस्तार से समझते हैं।
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पानी पीते समय बरतें ये सावधानी - फोटो : Amarujala.com
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

नई दिल्ली स्थित कैंसर हीलर सेंटर के प्रबंध निदेशक और ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. तरंग कृष्णा ने एक पॉडकास्ट में बताया कि बाजार में आसानी से उपलब्ध प्लास्टिक की बोतलों से पानी नहीं पीना चाहिए। इसमें बिस्फेनॉल ए (बीपीए) नामक रसायन होता है जिसमें कैंसरकारक तत्व पाए जाते हैं। 

अगर आपकी गाड़ी में प्लास्टिक की बोतल में पानी रखा है, आप लौटकर आते हैं और उस पानी को पी लेते हैं तो ये बड़ा नुकसानदायक हो सकता है। प्यासे रह जाओ पर इस तरह का पानी नहीं पीना चाहिए।

प्लास्टिक की बोतलों में पानी जब पैक होता है, उसके बाद इसका रखरखाव सही तरीके से नहीं होता है। ये धूप के भी संपर्क में आती हैं। धूप के कारण बोतलों को बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला रसायन पानी के साथ मिल सकता है, जिसको पीना कैंसर जैसी कई बीमारियों का खतरा बढ़ाने वाला माना जाता रहा है।
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प्लास्टिक की बोतलों में हो सकते हैं हानिकारक रसायन - फोटो : Adobe Stock
माइक्रोप्लास्टिक-नैनोप्लास्टिक भी बड़ा खतरा

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की एक रिपोर्ट के मुताबिक बोतलबंद पानी में माइक्रोप्लास्टिक (5 मिमी से छोटे कण) और उससे भी छोटे नैनोप्लास्टिक हो सकते हैं। साल 2024 के एक अध्ययन में पाया गया कि प्रति लीटर बोतलबंद पानी में औसतन 2.4 लाख नैनोप्लास्टिक कण हो सकते हैं। 

साल 2019 की वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट कहती है कि माइक्रोप्लास्टिक्स युक्त पानी तुरंत कोई बड़ा स्वास्थ्य-जोखिम नहीं दिखता लेकिन दीर्घकालिक रूप में इसके कई दुष्प्रभाव हो सकते हैं।

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स्वास्थ्य को लेकर बरतें सावधानी - फोटो : Freepik.com
इन सावधानियों को जानना जरूरी
 
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, अगर प्लास्टिक की बोतल धूप में या गर्म जगह रखी हो तो केमिकल्स पानी में ज्यादा तेजी से मिलते हैं। गाड़ी में रखी बोतल का पानी या धूप में पड़े पैकेज का पानी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। एक अध्ययन में पाया गया कि गर्म तापमान पर पानी में बीपीए का स्तर कई गुना बढ़ जाता है।

ज्यादातर लोग एक बार इस्तेमाल होने वाली बोतल को कई बार भरकर पीते हैं। बार-बार इस्तेमाल से बोतल की सतह पर छोटे-छोटे दरारें आ जाती हैं। इन दरारों में बैक्टीरिया और केमिकल्स जमा हो सकते हैं, जो पानी को दूषित कर देते हैं।

इसके अलावा प्लास्टिक बोतलों से माइक्रोप्लास्टिक पानी में घुल जाते हैं। इनके लंबे समय तक शरीर में रहने से सूजन, हार्मोनल बदलाव और कोशिकाओं की क्षति का खतरा रहा है जो कैंसरकारक हो सकते हैं।
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प्लास्टिक की बोतल से बच्चों को न पिलाएं दूध - फोटो : Freepik.com
बच्चों को न पिलाएं प्लास्टिक की बोतलों से दूध

प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल शिशु की सेहत के लिए भी ठीक नहीं है। इससे न सिर्फ शरीर में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा बढ़ने की आशंका रहती है, बल्कि इससे क्रॉनिक बीमारियों का भी खतरा हो सकता है।

स्वीडन स्थित कार्लस्टेड यूनिवर्सिटी में पब्लिक हेल्थ साइंसेज के प्रोफेसर कार्ल गुस्ताफ बोर्नहैग कहते हैं, प्लास्टिक की चीजों को बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले रसायन बिस्फेनॉल एफ के कारण शरीर में कई प्रकार के ऐसे परिवर्तन आ सकते हैं जिससे बच्चों की दिमागी क्षमता प्रभावित हो सकती है।

अध्ययनों में पाया गया है कि ये रसायन ऐसे जीन में परिवर्तन ला सकते हैं जो तंत्रिका संबंधी विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं।  भ्रूण अवस्था के दौरान इस रसायन के संपर्क में आने से  सात साल की उम्र में बच्चों का आईक्यू लेवल कम हो सकता है। यहां पढ़िए पूरी रिपोर्ट


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स्रोत और संदर्भ

DNA methylation at GRIN2B partially mediates the association between prenatal bisphenol F exposure and cognitive functions in 7-year-old children in the SELMA study


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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