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ईरान-अमेरिका जंग का असर: भारतीयों में बढ़ रहा ‘साइलेंट हेल्थ रिस्क’, इन बीमारियों को लेकर अलर्ट

Sat, 14 Mar 2026 01:46 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

ईरान-अमेरिका के बीच जारी से जंग से उपजी परिस्थितियों ने लोगों के सामने स्वास्थ्य को लेकर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। विशेषतौर पर भारत में लोगों को फेफड़ों की समस्याओं को लेकर अलर्ट किया जा रहा है। 
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बायोमास ईंधन से फेफड़ों की बीमारी का खतरा - फोटो : Adobe Stock
पश्चिम एशिया में जारी जंग दुनियाभर के लिए कई तरह की मुश्किलें बढ़ाता जा रहा है। वैश्विक स्तर पर ईंधन की डिमांड और सप्लाई बिगड़ने लग गई है। ईरान-अमेरिका के बीच जारी तनाव की आंच भारत में भी अब स्पष्ट तौर पर महसूस की जाने लगी है। सरकारें भले ही दावा करती रहें कि देश में एलपीजी गैस की कोई कमी नहीं है, पर गैस एजेंसियों के बाहर लगी लंबी-लंबी कतारें कुछ अलग ही कहानी बयां कर रही हैं। मसलन देश 'एलपीजी क्राइसेस' का सामना कर रहा है, जिसे देखते हुए स्वास्थ्य विशेषज्ञ सेहत को लेकर भी लोगों को अलर्ट कर रहे हैं।

ईरान-अमेरिका जंग से उपजी परिस्थितियों ने लोगों के सामने स्वास्थ्य को लेकर भी गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। विशेषतौर पर भारत में लोगों को फेफड़ों की समस्याओं को लेकर अलर्ट किया जा रहा है।

अब आपके मन में भी सवाल आ रहा होगा कि ईरान-अमेरिका के बीच जारी विवाद, सुदूर भारत में बैठे लोगों की सेहत के लिए कैसे संकट पैदा करने वाला हो सकता है? आइए इस बारे में विस्तार से समझते हैं
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एलपीजी गैस की डिमांड-सप्लाई में कमी - फोटो : ANI
एलपीजी की कमी, बायोमास ईंधनों की तरफ बढ़ते लोग

देश के अलग-अलग हिस्सों से प्राप्त हो रही खबरों से साफ होता है कि लोग गैस सिलेंडर के लिए परेशान हैं। घंटों लाइन मे लगे रहने के बावजूद सिलेंडर नहीं मिल रहा है, मांग और सप्लाई में फिलहाल भारी कमी देखी जा रही है। लिहाजा बड़ी संख्या में लोग फिर से खाना पकाने के पारंपरिक तरीके लकड़ी-कोयले और उपलों की ओर बढ़ रहे हैं। 
 
  • एलपीजी की कमी के कारण लाखों परिवार बायोमास ईंधनों का इस्तेमाल करने पर मजबूर हो रहे हैं, इसी स्थिति को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ चिंतित हैं। 
  • दो दशकों पहले का फिर से लौटता दौर इनडोर प्रदूषण और इसके कारण सांस-फेफड़ों की समस्याओं के खतरे को लेकर चिंता बढ़ाने वाला हो सकता है।
  • विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि अगर एलपीजी में कमी जारी रहती है और बायोमास ईंधनों का उपयोग फिर से बढ़ता है तो इसके परिणामस्वरूप लोगों में फेफड़ों से संबंधित बीमारियों का संकट फिर से बढ़ सकता है।
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चूल्हे पर खाना पकाने से सेहत को खतरा - फोटो : Adobe Stock
बायोमास ईंधन सेहत के लिए हो सकते हैं खतरनाक

बायोमास ईंधन के इस्तेमाल को कम करने और इसके विकल्प के तौर पर एलपीजी गैस के उपयोग के बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने 1 मई 2016 प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की शुरुआत की थी। इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं को धुआं-मुक्त रसोई देना था ताकि उनमें सांस से जुड़ी समस्याओं के जोखिमों को कम किया जा सके।

हालांकि अब फिर से मजबूरी में ही सही बायोमास ईंधनों के उपयोग की तरफ लोगों का फिर से बढ़ना सेहत के लिए खतरा बढ़ाने वाला हो सकता है।
 

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फेफड़ों की बीमारी, टीबी का खतरा - फोटो : Adobe Stock
श्वसन रोगों का बढ़ता खतरा

मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि बायोमास ईंधन से भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और सूक्ष्म कण निकलते हैं, जिससे हवा की गुणवत्ता खराब होती है। खाना पकाने के लिए इसके इस्तेमाल से इनडोर प्रदूषण का खतरा बढ़ता है।

ईंधन से निकलने वाले धुंआ में हानिकारक गैसों के साथ सूक्ष्म कण होते हैं जो सांस के माध्यम से फेफड़ों में जा सकते हैं। इससे श्वसन संबंधी गंभीर रोग, फेफड़ों को गंभीर क्षति होने और कैंसर तक का जोखिम बढ़ जाता है।
 
  • बायोमास ईंधन के नियमित इस्तेमाल को सीओपीडी के जोखिम से जोड़कर देखा जाता रहा है। 
  • एक अध्ययन में पाया गया कि इस तरह के ईंधन का उपयोग करने वाले 91% प्रतिभागियों में श्वसन रोगों का उच्च जोखिम था।
  • हालांकि जब इनमें से बड़ी संख्या में लोगों ने स्वच्छ ईंधन (एलपीजी) का उपयोग करना शुरू कर दिया तो श्वसन समस्याओं का खतरा भी धीरे-धीरे कम होने लगा।
  • एलपीजी उपयोगकर्ताओं की तुलना में बायोमास उपयोगकर्ताओं में सांस फूलने, घरघराहट और क्रॉनिक खांसी का खतरा अधिक देखा जाता रहा है।
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स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा - फोटो : Adobe stock
फेफड़ों के अलावा कई अन्य समस्याओं का भी खतरा

लकड़ी-उपलों को जलाने से होने वाला प्रदूषण फेफड़ों की सेहत के लिए तो खतरनाक है ही, साथ ही इससे कई अन्य तरह की स्वास्थ्य समस्याएं भी उत्पन्न हो सकती हैं। 
 
  • बायोमास ईंधन और इसके धुएं के संपर्क में रहना गर्भवती महिलाओं की सेहत के लिए भी नुकसानदायक है। इससे जन्म के समय बच्चे का वजन कम होने, मृत शिशु के जन्म और शिशु मृत्यु दर में बढ़ोतरी का खतरा हो सकता है। 
  • धुएं के संपर्क में आने से मोतियाबिंद, आंखों में जलन और नाक में जलन की दिक्कतें ज्यादा देखी जाती  हैं।
  • धुएं में पॉलीसाइक्लिक कार्बनिक पदार्थ हो सकते हैं। इसमें बेंजोपाइरीन जैसे कैंसरकारी पदार्थ भी शामिल हैं, जिससे कैंसर का जोखिम भी बढ़ सकता है।


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स्रोत: 
Biomass fuel combustion and health


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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