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Epilepsy: मिर्गी को आप भी तो नहीं मानते हैं भूत-प्रेत की समस्या? जानिए इस रोग के बारे में सबकुछ आसान भाषा में

Mon, 09 Feb 2026 07:36 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

International Epilepsy Day 2026: मिर्गी से पीड़ित व्यक्तियों को अक्सर गलत धारणाओं, अंधविश्वास और सामाजिक कलंक के कारण भेदभाव का सामना करना पड़ता है। अक्सर लोग इसे  भूत-प्रेत शैतानी समस्या मान लेते हैं। आयुष मंत्रालय ने रोगियों के लिए जागरूकता, समझ और सामाजिक समावेश पर जोर दिया है।
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मिर्गी की समस्या के बारे में जानिए - फोटो : Adobe Stock
लाइफस्टाइल और आहार में गड़बड़ी के कारण दुनियाभर में कई तरह की बीमारियों का बोझ लगातार बढ़ रहा है। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सभी इसका शिकार देखे जा रहे हैं। अमर उजाला में प्रकाशित हालिया रिपोर्ट में हमने बताया कि किस तरह से मोटापे की स्थिति को स्वास्थ्य विशेषज्ञ तेजी से बढ़ती महामारी के रूप में देख रहे हैं। इससे एक-दो नहीं 60 से अधिक तरह की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर भी एक बड़ी और गंभीर चुनौती बनकर उभर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, न्यूरोलॉजिकल रोग दुनियाभर में कई गंभीर बीमारियों और विकलांगता के प्रमुख कारणों में से एक हैं। इन बीमारियों में मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी और नसों से जुड़ी समस्याएं आती हैं। इनमें मिर्गी, अल्जाइमर, पार्किंसन और माइग्रेन जैसी स्थितियां प्रमुख हैं।

वैश्विक स्तर पर बढ़ती मिर्गी की समस्या, इससे जुड़े मिथ्स को दूर करने और जागरूकता बढ़ाकर रोगियों के प्रति भेदभाव को कम करने के उद्देश्य से हर साल फरवरी के दूसरे सोमवार (9 फरवरी, 2026) को अंतरराष्ट्रीय मिर्गी दिवस मनाया जाता है। कहीं आप भी तो इसे भूत-प्रेत की दिक्कत तो नहीं मानते आ रहे हैं?
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न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है मिर्गी - फोटो : Adobe Stock
मिर्गी रोग और अंधविश्वास

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, मिर्गी से पीड़ित व्यक्तियों को अक्सर गलत धारणाओं, अंधविश्वास और सामाजिक कलंक के कारण भेदभाव का सामना करना पड़ता है। भारत में ज्यादातर लोग मिर्गी के मरीजों को अक्सर पाप या भूत-प्रेत शैतानी समस्या से जोड़कर देखते हैं। इसके कारण रोगियों को सामाजिक भेदभाव का तो सामना करना ही पड़ता है साथ ही उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर पड़ता है।
 
  • मिर्गी एक सामान्य न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है, जिसमें दौरे पड़ते हैं। इस दौरान पीड़ित व्यक्ति हाथ-पैर झटक सकता है, मुंह से झाग आ सकता है, और आंखें ऊपर की ओर चढ़ सकती हैं। 
  • इसके कारण दौरे पड़ने, असामान्य व्यवहार, संवेदनाओं में कमी और कभी-कभी  बेहोशी की समस्या भी हो सकती है। 
  • स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, मिर्गी के इलाज के लिए झाड़-फूंक और अंधविश्वास के चक्करों में पड़ने से बचना चाहिए। दवाइयों और उपचार के अन्य माध्यमों से इसे ठीक किया जा सकता है। 
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मिर्गी को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत - फोटो : Adobe Stock Photo
आयुष मंत्रालय ने जागरूकता बढ़ाने पर दिया जोर

अंतरराष्ट्रीय मिर्गी दिवस के अवसर पर भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने रोगियों के लिए जागरूकता, समझ और सामाजिक समावेश पर जोर दिया है। मंत्रालय ने अपील की है कि समाज मिलकर मिर्गी से जुड़े कलंक को कम करे और सूचित, सहानुभूतिपूर्ण बातचीत को बढ़ावा दे।
 
  • देश के कई हिस्सों में सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों से यह समस्या और मुश्किल हो जाती है। कई लोग मिर्गी को बुरी आत्माओं का प्रभाव, पिछले जन्म के पाप या अलौकिक शक्तियों से जोड़ते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को गलत उपचार, हानिकारक प्रथाओं और कलंक झेलना पड़ता है।
  • यही नहीं, मिर्गी शिक्षा, रोजगार, विवाह और सामाजिक जीवन पर बुरा असर डालती है। रोजगार के मामले में स्थिति बहुत चिंताजनक है।

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मिर्गी की दिक्कत - फोटो : Adobe Stock
रोगियों पर बेरोजगारी की मार

केरल के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि मिर्गी से पीड़ित 58 प्रतिशत लोग बेरोजगार थे, जबकि सामान्य लोगों में यह आंकड़ा सिर्फ 19 प्रतिशत तक था।

नियोक्ता अक्सर ऐसे लोगों को नौकरी देने से भी हिचकिचाते हैं। दौरे पड़ने पर सामाजिक कलंक बढ़ता है, जिससे व्यक्ति को कम वेतन वाली नौकरी या बेरोजगारी का सामना करना पड़ता है। कई मामलों में नौकरी छूट जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि समय के साथ शिक्षा और सामाजिक स्तर में सुधार हुआ है, लेकिन मिर्गी के प्रति धारणा, कलंक और भेदभाव में खास बदलाव नहीं आया। इससे अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ती हैं।
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किसे मिर्गी ज्यादा होता है? - फोटो : Adobe Stock
पुरुषों में मिर्गी का जोखिम अधिक 

इंडियन एपिलेप्सी एसोसिएशन के प्रयासों से भारतीय न्यायपालिका ने स्पष्ट किया है कि मिर्गी को मानसिक बीमारी नहीं माना जाना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि मिर्गी के बोझ को कम करने के लिए जागरूकता जरूरी है। इसमें बेहतर देखभाल, रोकथाम, जन जागरूकता अभियान और मौजूदा कार्यक्रमों में मरीजों की देखभाल को शामिल करना शामिल है।

मिर्गी किसी को भी हो सकती है, लेकिन आमतौर पर छोटे बच्चों और बुजुर्गों में इसका जोखिम अधिक होता है। साल 2021 में प्रकाशित शोध के अनुसार, महिलाओं की तुलना में पुरुषों में मिर्गी का जोखिम अधिक देखा गया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मिर्गी से पीड़ित लगभग आधे से अधिक लोगों में इसका कारण निर्धारित नहीं किया जा सकता है।



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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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