अगर आप भी अक्सर घर और दफ्तर की परेशानियों में उलझे रहते हैं तो ये खबर आपके लिए है। एक रिसर्च में कहा गया कि अगर आप अपने दिमाग को खाली रखते है तो आपकी बहुत सी परेशानियों का हल आपको चुटकी में ही मिल जाता है। कई बार तो ऐसे क्रिएटिव आईडिया भी दिमाग में आ जाते हैं जिनके बारे में आपने कभी सोचा भी नहीं होता।
विज्ञापन
2 of 5
दिमाग को सुकून दें
दुनिया के बड़े बड़े विचारक भी इस बात का समर्थन करते हैं कि दिमाग को हर वक़्त किसी ना किसी काम में उलझा कर नहीं रखना चाहिए। उनका कहना है कि अपने दिमाग को सुकून से काम करने का मौका देना चाहिए। अमरीकी मनोविज्ञानी एमी फ़्राइस का कहना है कि जब हमारा ज़हन सुकून में होता है, तो वो हमारी पुरानी यादों तक पहुंचता है।
ऐसे समय में अपका दिमाग खुद ही आपकी मौजूदा स्थिति को उन पुरानी यादों से जोड़ता है। जिसके बाद एक नई सोच और आइडिया का जन्म होता है। आपने खुद भी कई बार नोटिस किया होगा कि जब आप तमाम फिक्रों से आज़ाद होकर कोई बात सोचते हैं तो जल्द ही आपको आपकी समस्या का हल मिल जाता है।
विज्ञापन
3 of 5
रात में सुकून की नींद लें
अमरीका की ग्राफिक डिजाइनर मेगन किंग का कहना है कि कभी कभी वो पूरा दिन किसी प्रोजेक्ट पर काम करती हैं, लेकिन एक भी नया आइडिया उनके जहन में नहीं आ पाता। लेकिन जब वो रात में सुकून की नींद लेकर उठती हैं, तो 15 मिनट में ही कई नए आइडियाज के साथ काम करना शुरू कर देती हैं।
लेकिन ऐसा करने का मौका उन्हें कम ही मिल पाता है क्योंकि वो ज्यादातर समय अपने स्मार्ट फोन पर ही बिजी रहती हैं। रिसर्च करने वाली कंपनी नील्सन के मुताबिक अमरीका में ज़्यादातर लोग रोजाना साढ़े दस घंटे गैजेट्स पर बिताते हैं। ब्रिटेन में भी कुछ ऐसा ही हाल है।
4 of 5
खुद के साथ बिताएं वक्त
वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च के तहत कुछ लोगों को 6 से 15 मिनट के लिए बिना किसी गैजेट के खामोश अकेले में बैठने को कहा और कुछ को इलैक्ट्रिक शॉक लेने का विकल्प दिया। हैरत की बात थी कि ज़्यादातर ने दूसरे विकल्प को चुना। अमरीका की वर्जिनिया यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर डेनियल विलिंघम का कहना है कि हमारा दिमाग खाली वक्त में अलग तरह से सोचता है और जब हम कंप्यूटर, लैपटॉप या स्मार्टफ़ोन ताक रहे होते हैं, तो दिमाग अलग तरह से काम करता है।
हमारे दिमाग के दो हिस्से होते हैं। एक बाहरी और एक अंदरूनी। दिमाग का अंदरूनी हिस्सा दिन में ज़्यादा एक्टिव रहता है। इसे डिफॉल्ट नेटवर्क कहते हैं। दिमाग का ये हिस्सा उस वक़्त ज़्यादा शिद्दत से काम करता है, जब आप खुद अपने बारे में सोच रहे होते हैं। हालांकि दिमाग के ये दोनों हिस्से एक दूसरे से जुड़े होते हैं। लेकिन कभी भी एक साथ एक ही समय पर काम नहीं करते। इसका सीधा मतलब ये हुआ कि हमारे दिमाग का एक ही हिस्सा अक्सर काम करता रहता है। ऐसे में जब आप किसी गैजेट के साथ होते हैं तो दिमाग क्रिएटिव नहीं हो पाता।
प्रोफेसर एमी फ़्राइस का कहना है कि अगर आप ज़्यादा क्रिएटिव होना चाहते हैं तो ऐसे काम ज़्यादा कीजिए जिसमें आपको बहुत फोकस करने की ज़रूरत ना हो। जैसे खाली वक्त खुद से बातें करें या टहलने निकल जाएं। दिन में खाली बैठकर ख़्वाब देखने की कोशिश करें। जो सपने आप देखें, उन्हें पूरा करने के लिए दिमाग को थोड़ा वक़्त दीजिए।
संतुलित आहार लीजिए, नियम से वर्ज़िश करें। सबसे ज़्यादा जरूरी है कि अच्छी नींद लें। अगर ये सब कर लिया तो आपको तो क्रिएटिव होने से कोई नहीं रोक सकता। इस बात की आदत डालना जरूरी है कि आप अपने लिए खाली वक्त निकालें। खुद से बातें करें। सपने देखें और दिमाग को समय दें कि वो उन सपनों को पूरा करने के लिए सोच सके।