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कोरोना वायरस: लॉकडाउन में हेल्थकेयर सर्विस की कमी पूरी कर सकती है टेलीमेडिसिन?

Sun, 10 May 2020 07:04 PM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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टेलीमेडिसिन(प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : DataLab
रीना आर्या गुजरात में रहती हैं। लॉकडाउन के दौरान वहां से 850 किलोमीटर दूर फरीदाबाद (हरियाणा) में रहने वाली उनकी 75 साल की मां को हाई ब्लड प्रेशर की दिक्कत ने कुछ ज्यादा ही परेशान कर दिया। ऐसे में उन्होंने ऑनलाइन मेडिकल सर्विस की मदद लेने की सोची। रीना ने बताया, "मैंने जीवा आयुर्वेद से सलाह लेने का फैसला किया। मैंने उन्हें अपनी मां का केस समझाया। जीवा आयुर्वेद वालों ने मुझे कुछ दवाइयां बताईं। इन दवाइयों से मेरी मां को आराम हुआ। मेरी मां हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज, दोनों की मरीज हैं।"

रीना की तरह लक्ष्मी ने भी अपनी मां के इलाज के लिए एक टेलीमेडिसिन प्रोवाइडर कॉल हेल्थ सर्विसेज का सहारा लिया। लक्ष्मी की मां पैरों के दर्द से परेशान थीं। उन्हें जिस दवा की जरूरत थी और वह कर्नाटक में उनके गांव रेंटाचिंटाला में नहीं मिल रही थी। लक्ष्मी हैदराबाद (तेलंगाना) में रहती हैं। वहां से दवा भेजने का उन्हें कोई जरिया नहीं मिल रहा था। लक्ष्मी ने कॉलहेल्थ की टीम को फोन किया उनसे सही दवा का नुस्खा मांगा।

ये दोनों मामले कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान टेलीमेडिसिन सर्विस की बढ़ती मांग के हैं। इन दिनों इनकी सेवाओं की मांग काफी बढ़ गई है क्योंकि लॉकडाउन के दौरान मरीजों का क्लीनिक पहुंचना मुश्किल हो रहा है। बीबीसी ने इस बारे में कई डॉक्टरों, हेल्थकेयर प्रोफेशनल और कंस्लटेंट्स से बात की। सबने टेलीमेडिसिन सर्विस मुहैया कराने वालों की बढ़ती मांग की तस्दीक की।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pixabay
वायरस से हर कोई डरा हुआ है
मदुरै (तमिलनाडु) के मिनाक्षी मिशन हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के डॉक्टर वेलकुमार मीनाक्षी ने बीबीसी को बताया उनके पास अब हर रोज 100 से 110 फोन कॉल और वीडियो कॉल आते हैं। जबकि लॉकडाउन के पहले इनकी संख्या 10 से भी कम होती थी। उन्होंने कहा कि लोग अब हमें फोन करके छोटी से छोटी बात भी पूछते हैं। क्योंकि कोरोना वायरस से हर कोई डरा हुआ है। छोटी सी तकलीफ में भी अब फोन या वीडियो कॉल के जरिए सलाह मांगते हैं।

लॉकडाउन के दौरान अपनी सेहत के बारे में डॉक्टरों से सलाह लेने की इस तरह की मांग ने देश में टेलीमेडिसिन की अहमियत को उभार दिया है। ऐस देश में जहां डॉक्टरों और नर्सों की कमी हो, खास कर ग्रामीण इलाकों में, वहां हेल्थकेयर मॉडल के संभावित विकल्प के तौर पर टेलीमेडिसिन आजकल चर्चा में है।

17 मई तक प्रभावी लॉकडाउन की वजह से सोशल डिस्टेंसिंग के नियम काफी कड़े कर दिए गए हैं ऐसे में चैट, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और जूम ऐप के जरिए डॉक्टरों और मरीजों के बीच बातचीत और सलाह-मशविरे ने स्वास्थ्य सुविधाओं की एक बड़ी कमी की भरपाई की संभावना दिखाई है।
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Telemedicine - फोटो : अमर उजाला
क्या हर बीमारी का ऑनलाइन इलाज है?
टेलीमेडिसिन से हेल्थकेयर सर्विस मुहैया कराने के मामले में गुणवत्ता के साथ कानूनी और नैतिक पहलू भी जुड़े हुए हैं। हेल्थकेयर विशेषज्ञ कहते हैं कि सवाल यह है कि क्या डॉक्टर इस तरह फोन, चैट या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मरीजों के लिए दवा लिख सकते हैं? ऐसी कौन सी बीमारियां हैं, जिनका ऑनलाइन इलाज हो सकता है?

एक प्राइवेट अस्पताल के डॉक्टर ने कहा कि टेलीमेडिसिन की स्क्रीनिंग वैल्यू मरीज के लिए मददगार साबित हो सकती है लेकिन यह सीधे डॉक्टर से आमने-सामने ली गई सलाह की जगह नहीं ले सकती। अपोलो हॉस्पिटल ग्रुप के प्रेसिडेंट डॉक्टर हरि प्रसाद ने बीबीसी से कहा, "सामने बैठे डॉक्टर और टेलीमेडिसिन से ली गई सलाह की तुलना नहीं की जा सकती। टेलीमेडिसिन के जरिए ली गई सलाह में कोई न कोई कसर रह ही जाएगी।"

उन्होंने कहा कि कई कॉल ऐसे मरीजों की स्क्रीनिंग के लिए आते हैं जिनमें बीमारी के लक्षण लंबे समय से होते हैं। ऐसे कई मरीज अपने घरेलू नुस्खे फेल होने या मर्जी से ली गई दवाइयों के बेअसर होने के बाद डॉक्टर को कॉल करते हैं। जीवा आयुर्वेद का कहना है कि कोरोना वायरस संक्रमण के इस कठिन दौर में लोग आधुनिक दवाइयों के अलावा आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का भी खासा इस्तेमाल कर रहे हैं।

जीवा आयुर्वेद के डायरेक्टर मधुसूदन चौहान ने कहा, "हम लोगों को हर दिन कई कॉल मिलते हैं। लोग फोन करके हमसे अपने शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए घरेलू नुस्खे बताने को कहते हैं।" अमूमन लोगों के पास सही जानकारी नहीं होती है। हम उन्हें सही जानकारी देते हैं और गलत नुस्खों के साइड इफेक्ट्स के बारे में सतर्क करते हैं।

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AIIMS - फोटो : file photo
टेलीमेडिसिन में कितनी संभावनाएं?
देश के शहरों और गांवों को कोरोना वायरस संक्रमण से बचाने के लिए पीएम नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च को लॉकडाउन का ऐलान कर दिया था। इस दिन आधी रात से यह लागू हो गया था। इसी के साथ सरकार ने देश में पहली बार टेलीमेडिसिन से जुड़ी गाइडलाइंस जारी की।

देश के स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा-निर्देश में कहा गया कि ऐसे हालात में यह ठीक रहेगा। डॉक्टर मरीजों की दिक्कतों का मूल्यांकन कर उन्हें इलाज सुझा सकेंगे। रजिस्टर्ड डॉक्टर डायग्नोसिस के लिए वॉयस, वीडियो और टेक्स्ट का इस्तेमाल कर सकते हैं। वे मरीजों को सलाह देने और इलाज सुझाने के लिए वॉट्सऐप, फेसबुक, मैसेंजर या मोबाइल हेल्थ ऐप का सहारा ले सकते हैं।

एटन हेल्थ इंटरनेशनल में पॉपुलेशन हेल्थ के वाइस प्रेसिडेंट डॉक्टर स्नेह खेमका कहते हैं, " टेलीमेडिसिन के जरिए लोग बुखार, खांसी, ठंड लगने, डायरिया, गैस्ट्रिक और दूसरी बीमारियों का इलाज करवा रहे हैं।" वे कहते हैं, "कुछ लोग हाई ब्लड प्रेशर, डाइबिटीज और ऐसी ही अपनी पुरानी बीमारियों का भी इलाज करा रहे हैं। कुछ लोग वैकल्पिक चिकित्सा के बारे में भी पूछते हैं। कुछ सेकंड ओपिनियन के लिए भी टेलीमेडिसिन सर्विस का सहारा ले रहे हैं। खान-पान, स्ट्रेस मैनेजमेंट और आम सेहत ठीक रखने के लिए भी लोग सलाह ले रहे हैं।"
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Computer data Feeding - फोटो : pixa
डेटा का सवाल
एक अरब से ज्यादा की आबादी वाले इस देश में हेल्थकेयर सुविधाओं का क्या हाल है, यह किसी से छिपा नहीं है। टेलीमेडिसिन से हालात बेहतर करने में मदद मिल सकती है। क्योंकि इस सर्विस के जरिए लोगों से जुड़े जो आंकड़े (डेटा) इकट्ठा होंगे, उससे देश में पब्लिक हेल्थ (जन-स्वास्थ्य) की अंदरूनी तस्वीर सामने आ सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह जो डेटा इकट्ठा होंगे, उससे हेल्थकेयर प्रोफेशनलों को ग्रामीण और शहरी, दोनों इलाकों में अपनी सेवाओं का दायरा बढ़ाने में मदद मिलेगी। नोएडा स्थित नेशनल एक्रिडेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर्स प्रोवाइडर्स (NABH) की टेक्निकल कमेटी के सदस्य ऋषि भटनागर ने कहा कि टेलीमेडिसिन से डायग्नोसिस से लेकर इलाज की पूरी प्रक्रिया की लास्ट माइल कनेक्टिविटी बढ़ जाएगी।

लेकिन कानूनी विशेषज्ञ टेलीमेडिसिन कंपनियों और ई-कंस्लटेशन कंपनियों के रेगुलेशन (नियमन) का सवाल उठाते हैं। उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि ये कंपनियां मरीजों के डेटा का दुरुपयोग कर सकती हैं। लीगल एक्सपर्ट सिद्धार्थ चंद्रशेखर ने बीबीसी से कहा, "डेटा प्राइवेसी को लेकर चिंता बनी रहेगी। क्योंकि मरीज के पूरे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ा डेटा धोखाधड़ी करने वाले तत्वों में हाथों में पड़ सकता है। वे इसका दुरुपयोग कर सकते हैं।"
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
भारत में काम करने वाले एडवोकेसी ग्रुप इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने अप्रैल में एक रिपोर्ट जारी की थी। इसमें कहा गया था कि टेलीमेडिसिन एप्स के जरिए इकट्ठा संवेदनशील मेडिकल और पर्सनल डेटा तक किसकी (किस संगठन की) पहुंच होगी, इस पर पारदर्शिता नहीं है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस डेटा तक किसकी पहुँच होगी, इस बारे में स्पष्ट तौर पर कुछ भी नहीं कहा गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल में डेटा सिक्योरिटी और प्राइवेसी को लेकर सरकार के ऐप आरोग्य सेतु पर सवाल उठाए थे। हालांकि सरकार ने उनके आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया था।

लॉकडाउन के दौरान डॉक्टरों, मरीजों और दवा दुकानदारों को आपस में जोड़ने वाली प्रैक्टो (Practo) जैसी टेलीमेडिसिन कंपनियों के ग्राहकों की तादाद में खासा इजाफा हुआ है। इससे पता चलता है कि लोग अपनी सेहत को लेकर कितने फिक्रमंद है। कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक यह कोरोना वायरस संक्रमण के मौजूदा समय में 499 रुपए ( 6।7 डॉलर) में 'अनलिमिटेड ऑनलाइन कंस्लटेशन' का ऑफर दे रही है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : pixabay
प्रैक्टो के चीफ हेल्थ स्ट्रेटजी ऑफिसर डॉ. अलेक्जेंडर कुरुविला एक बयान में कहते हैं, "प्रैक्टो से जुड़ा हर जनरल फिजिशियन अमूमन एक दिन में 25 से 30 मरीजों को सलाह देता है। लेकिन पिछले तीन सप्ताह के दौरान मरीजों की संख्या तीन से चार गुना बढ़ गई है।"

उन्होंने बताया- इसलिए पिछले चार सप्ताह में हमें अपने डॉक्टरों का बेस लगभग 50 फीसदी बढ़ाना पड़ा। अभी तक मरीजों को डॉक्टरों से संपर्क करने में कोई दिक्कत नहीं आ रही है। उन्हें लगातार सलाह और इलाज मिल रहा है।

प्रैक्टो के डेटा देखने से पता चलता है कि ज्यादातर लोगों ने कफ, ठंड लगने, गले में सूजन और बदन दर्द की शिकायत की वजह से सलाह ली थी। इस दौरान प्रैक्टो के डॉक्टरों को किए जाने वाले कॉल में 50 फीसदी का इजाफा दर्ज किया गया। सलाह लेने वालों में अधिकतर कॉलर 20 से 30 साल तक की उम्र के हैं। पूरी दुनिया कोरोना वायरस की चपेट में है। हर तरफ एक ही सवाल पूछा जा रहा है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pixabay
मरीजों को स्पेशलाइज्ड क्लीनिकल केयर से जोड़ने वाली कंपनी प्रिस्टिन केयर (Pristyn Care) के सह-संस्थापक हरसिमरबीर सिंह कहते हैं, "अप्रैल की शुरुआत से हमारे यहां आने वाले कॉल की संख्या लगातार बढ़ी है। बड़े शहरों के बाहर से पूछताछ करने वालों की संख्या तो सात गुना बढ़ गई है। पूरे देश से इलाज और सलाह के बारे में जो पूछताछ की जा रही है उसमें दस गुना इजाफा हुआ है।" हालांकि कई डॉक्टरों और मेडिकल कंस्लटेंट का कहना है कि भारत में टेलीमेडिसिन को एक बेहतरीन रेगुलेशन (नियमन) वाली सेवा बनाने की लिए अभी काफी कुछ किए जाने की जरूरत है।

हेल्थकेयर सुविधाएं बढ़ाने की जरूरत
मरीजों तक पहुंचने के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने वाले डॉक्टरों को भी इसकी सीमाओं का अंदाजा है। डॉक्सऐप (DocsApp) में मेडिकल ऑपरेशन्स की हेड डॉक्टर गौरी कुलकर्णी का कहना है कि ऑनलाइन सलाह के जरिए 70 फीसदी स्वास्थ्य समस्याओं को डायग्नोस कर उनका इलाज किया जा सकता है। लेकिन जब लगता है कि मरीज के शरीर को हाथ लगाए बगैर इलाज संभव नहीं है तो उन्हें कहा जाता है कि वे आमने-सामने ही इलाज कर सकते हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pixabay
सरकार ने अपने निर्देशों में प्राइमरी हेल्थकेयर की जगह टेलीमेडिसिन को विकल्प बनाने की कोई बात नहीं की है। जबकि हकीकत यह है कि देश में हेल्थ प्रोफेशनल्स की कमी की वजह से वैकल्पिक चिकित्सा सुविधाओं की भारी जरूरत है। वॉशिंगटन स्थित सेंटर फॉर डिजिज डायनेमिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी (CDDEP) के मुताबिक भारत में अभी और छह लाख डॉक्टर और 20 लाख नर्सों की जरूरत है।

सेंटर फॉर डिजिज डायनेमिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी का कहना है कि डॉक्टरों और नर्सों की कमी से उन लोगों पर दबाव काफी बढ़ जाता है, जो महंगा इलाज नहीं करवा सकते। देश में इलाज के 65 फीसदी बिल इतने अधिक हैं कि इस वजह से 57 लोग हर साल गरीबी की गर्त में पहुंच जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ( WHO ) ने कहा है कि हर 1000 लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए लेकिन भारत में यह अनुपात प्रति दस हजार लोगों पर एक डॉक्टर का है।
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telemedicine - फोटो : datalab
चुनौती है मरीजों से संपर्क
इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI) के मुताबिक भारत में 2019 के आखिर में इंटरनेट के 45 करोड़ एक्टिव यूजर थे। लेकिन इनमें से ज्यादातर शहरी इलाकों के मोबाइल यूजर थे। गांवों में इंटरनेट यूजर्स की संख्या, शहरी इलाकों के यूजर्स से काफी कम है। इसके बावजूद भारत में ऑनलाइन मीडियम के जरिए डॉक्टरों की सलाह लेने का चलन बढ़ रहा है। फोर्टिस, अपोलो, मैक्स, टाटा हॉस्पिटल और मेट्रोमेडि जैसी प्राइवेट हॉस्पिटल चेन ने अपनी ई-कंस्लटेशन चेन शुरू कर दी है।

हालांकि विशेषज्ञ डॉक्टरों को इस बात की चिंता है कि ज्यादातर मरीज उनकी सलाहों को समझने में नाकाम रह सकते हैं। मदुरै की फोर्टिस मलार हॉस्पिटल में बर्थ एजुकेटर और लेक्टेशन कंस्लटेंट डॉ. जयश्री जयकृष्णन के मरीज पूरे तमिलनाडु में हैं। वह गर्भवती महिलाओं और युवा माताओं को सलाह देती हैं। लॉकडाउन के दौरान उन्होंने फोन और वीडियो कॉल के जरिए अपने मरीजों को सलाह दी थी। लेकिन डॉक्टर जयकृष्णन इससे संतुष्ट नहीं दिखतीं। 

बीबीसी से उन्होंने कहा, "ज्यादातर मरीजों को हमारी सलाह समझने में दिक्कत आती है। उन्हें सलाहों के मुताबिक करके दिखाना पड़ता है। इसके अलावा कनेक्टिविटी की भी दिक्कत है। करूर, त्रिची और मदुरै के मरीज इतनी आसानी से इंटरनेट एक्सेस नहीं कर पाते।"
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