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चेतावनी: करोड़ों भारतीय महिलाएं इनफर्टिलिटी का कारण बनने वाली इस बीमारी का शिकार, पर 70% से ज्यादा इससे अनजान

Mon, 05 Oct 2026 01:22 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Endometriosis In India Risk: एंडोमेट्रियोसिस महिलाओं में होने वाली ऐसी बीमारी है जो सिर्फ पीरियड्स के दर्द तक सीमित नहीं रहती। गंभीर मामलों में आंत, मूत्राशय, नसें और दूसरे अंग भी प्रभावित हो सकते हैं। लंबे समय तक बीमारी रहने पर फर्टिलिटी तक प्रभावित हो सकती है।
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महिलाओं में एंडोमेट्रियोसिस का बढ़ता जोखिम - फोटो : Amarujala.com/AI
क्या आपको भी पीरियड्स के दौरान दर्द बना रहता है? मासिक धर्म के दौरान हर बार इतनी दिक्कत होती है कि रोजमर्रा का सारा कामकाज मुश्किल हो जाता है? स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, हर बार पीरियड्स के दौरान होने वाला इस तरह का दर्द एंडोमेट्रियोसिस जैसी समस्याओं की ओर भी संकेत हो सकता है, जिसे लेकर सभी महिलाओं को अलर्ट रहना चाहिए। आंकड़ों से पता चलता है कि दुनियाभर में लगभग हर सात में से एक महिला एंडोमेट्रियोसिस से प्रभावित है। समय रहते इस समस्या पर ध्यान न दिया जाए या फिर इलाज न हो पाए तो इससे इनफर्टिलिटी का भी खतरा हो सकता है।

महिलाएं अक्सर पीरियड्स के दौरान दर्द को सामान्य मान लेती हैं, यही कारण कि वर्षों तक इसकी असली वजह सामने ही नहीं आ पाती। लेकिन अगर यही दर्द पीरियड्स के दौरान बार-बार लौटे, आपका काम प्रभावित होने लगे और धीरे-धीरे रोजमर्रा की जिंदगी मुश्किल होने लगे, तो इसे सिर्फ पीरियड की समस्या मानकर इग्नोर नहीं किया जाना चाहिए। समय पर अपने डॉक्टर से मिलकर एंडोमेट्रियोसिस की जांच जरूर करा लें।

अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट में हमने  टीवी एक्ट्रेस सुमोना चक्रवर्ती में एंडोमेट्रियोसिस की समस्या के बारे में बताया था। आइए जानते हैं कि इस बीमारी को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
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पीरियड्स के समय दर्द? - फोटो : Amarujala.com/AI
एंडोमेट्रियोसिस और इसका खतरा

एंडोमेट्रियोसिस में गर्भाशय की अंदरूनी परत (एंडोमेट्रियम) जैसी कोशिकाएं गर्भाशय के बाहर (ओवरी, फैलोपियन ट्यूब, पेल्विस) बढ़ने लगती हैं। ये कोशिकाएं हर महीने हार्मोन के प्रभाव में सक्रिय होती हैं, लेकिन शरीर से बाहर नहीं निकल पातीं। इसके कारण सूजन, रक्तस्राव, सिस्ट और लगातार दर्द की समस्या पैदा हो सकती है। लंबे समय तक बीमारी रहने पर गर्भधारण में परेशानी  हो सकती है। हैरानी की बात यह है कि दुनिया में बड़ी संख्या में महिलाएं इससे प्रभावित हैं, फिर भी 70% से ज्यादा को इसकी जानकारी नहीं हैं, यही कारण है कि समय रहते इसका पहचान और इलाज नहीं हो पाता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, यह बीमारी डायबिटीज से भी ज्यादा आम है, लेकिन इसके बावजूद इसके बारे में बहुत कम बात होती है। ये बीमारी महिलाओं की कामकाजी जिंदगी और करियर के कई वर्षों पर असर डाल सकती है। हालांकि, समय पर सही पहचान और उचित इलाज से इसके कारण होने वाली समस्याओं को काफी हद तक रोका जा सकता है।
 
  • लंबे समय तक अगर एंडोमेट्रियोसिस की समस्या बनी रहती है तो इससे बांझपन और गर्भधारण करने में परेशानी हो सकती है। 
  • बीमारी अंडाशय और फैलोपियन ट्यूब यानी अंडाशय से गर्भाशय तक अंडाणु पहुंचाने वाली नलियों को नुकसान पहुंचा सकती है। 
  • इसके अलावा, इस बीमारी की वजह से शरीर में लंबे समय तक सूजन जैसी स्थिति बनी रहती है। 
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एंडोमेट्रियोसिस और पीरियड्स में दर्द की समस्या - फोटो : Freepik.com
क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ?

एंडोमेट्रियोसिस सर्जन और इंडियन सेंटर फॉर एंडोमेट्रियोसिस (आईसीई) के निदेशक डॉ. अभिषेक मंगेशिकर कहते हैं, एंडोमेट्रियोसिस को सिर्फ महिलाओं की प्रजनन प्रणाली से जुड़ी बीमारी नहीं माना जाना चाहिए। यह शरीर के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकती है। इसमें गर्भाशय की अंदरूनी परत जैसी दिखने वाली और उसी तरह प्रतिक्रिया करने वाली कोशिकाओं के ऊतक गर्भाशय के बाहर बढ़ने लगते हैं। यह ऊतक शरीर के ऐसे हिस्सों में भी पहुंच सकते हैं, जहां आमतौर पर इसकी उम्मीद नहीं की जाती। 
 
  • भारत में लाखों महिलाओं के लिए एंडोमेट्रियोसिस सिर्फ एक बीमारी नहीं है। लगातार रहने वाला दर्द और दूसरे लक्षण उनकी नौकरी, काम करने की क्षमता और करियर में आगे बढ़ने पर भी असर डालते हैं।
  •  एंडोमेट्रियोसिस सोसाइटी ऑफ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक भारत में करीब 2.7 करोड़ महिलाएं इस बीमारी से प्रभावित हैं।
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एंडोमेट्रियोसिस के कारण होने वाली दिक्कतें - फोटो : Freepik.com
कैंसर की सर्जरी से भी ज्यादा जटिल हो सकता है गंभीर मामलों का इलाज

डॉ. मंगेशिकर कहते हैं, एडवांस्ड यानी गंभीर एंडोमेट्रियोसिस का इलाज केवल सामान्य स्त्री रोग विशेषज्ञ के स्तर पर ही कराना संभव नहीं होती है। गंभीर बीमारी में आंत, मूत्राशय, यूरेटर्स और  पेट के निचले हिस्से और प्रजनन अंगों से जुड़ी नसें भी प्रभावित हो सकती हैं। ऐसे मामलों में सर्जरी बहुत जटिल हो सकती है और कई बार इसकी जटिलता कुछ कैंसर की सर्जरी से भी ज्यादा हो सकती है।

जब डॉक्टरों को कैंसर का संदेह होता है तो वे आमतौर पर मरीज को तुरंत कैंसर विशेषज्ञ यानी ऑन्कोसर्जन के पास भेजते हैं। एंडोमेट्रियोसिस के गंभीर मामलों में भी वैसी ही विशेषज्ञ रेफरल व्यवस्था होनी चाहिए जैसी गंभीर कैंसर के मामलों में अपनाई जाती है।

लाइफस्टाइल डिजीज नहीं है एंडोमेट्रियोसिस

विशेषज्ञ ने यह भी साफ किया कि एंडोमेट्रियोसिस लाइफस्टाइल डिजीज यानी खराब खान-पान या गलत जीवनशैली से होने वाली बीमारी नहीं है। किसी महिला को यह बीमारी इसलिए नहीं होती कि उसका खान-पान खराब है। अभी यह पूरी तरह पता नहीं है कि इस बीमारी के पीछे कौन से फैक्टर जिम्मेदार हैं। यह भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि बीमारी किसी महिला में कितनी तेजी से बढ़ेगी, कितनी आक्रामक होगी या शरीर के कौन-कौन से अंगों को प्रभावित करेगी? इन सभी पहलुओं पर अभी शोध चल रहा है।
 
  • हालांकि, इतना जरूर पता है कि एंडोमेट्रियोसिस शरीर में सूजन से जुड़ी बीमारी है। इसलिए शरीर में सूजन को बढ़ाने वाली चीजें महिलाओं में बीमारी के लक्षणों को ज्यादा खराब कर सकती हैं। 
  • लंबे समय तक रहने वाली एंडोमेट्रियोसिस की बीमारी अंडाशय और फैलोपियन ट्यूब को नुकसान पहुंचा सकती है। साथ ही शरीर में बनी रहने वाली सूजन की वजह से भ्रूण का गर्भाशय की अंदरूनी परत में ठीक से चिपकना मुश्किल हो सकता है।
  •  एंडोमेट्रियोसिस में कुछ प्रकार की सिस्ट के उम्र बढ़ने के साथ कैंसर में बदलने का खतरा भी रहता है। ज्यादा उम्र की महिलाओं में यह जोखिम थोड़ा बढ़ सकता है। 
 
मसलन ये बीमारी महिलाओं की सेहत उनके काम-काज, करियर और प्रजनन तक सभी को प्रभावित करने वाली हो सकती है, जिसको लेकर अलर्ट रहना जरूरी है। समय पर पहचान और इलाज से जोखिमों को कम किया जा सकता है।



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स्रोत: 
Factors contributing to the delayed diagnosis of endometriosis—a systematic review and meta-analysis


अस्वीकरण: ये रिपोर्ट पीटीआई की कॉपी के आधार पर तैयार की गई है। अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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