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Alert: आंखों की रोशनी संकट में, प्रदूषण के कारण बच्चों में बढ़ रही है 'अंधा बनाने वाली ये बीमारी'

Sun, 28 Sep 2025 08:13 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • आज दुनिया में लगभग एक तिहाई बच्चे और किशोर मायोपिया से पीड़ित हैं। इस समस्या में बच्चे दूर की चीजें साफ नहीं देख पाते और उम्र बढ़ने के साथ यह और गंभीर होती जाती है।  प्रदूषित हवा बच्चों की आंखों के कॉर्निया और आंख के आकार को प्रभावित करती है।
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बच्चों के आंखों की समस्या - फोटो : Freepik.com
Air Pollution: दुनियाभर में बढ़ता वायु प्रदूषण सेहत को गंभीर रूप से क्षति पहुंचाता दिख रहा है। जिस हवा में हम रोजाना सांस लेते हैं, उसमें कई प्रकार के हानिकारक गैस, रसायनों का स्तर बढ़ गया है। कई मेडिकल रिपोर्ट्स से साफ होता है कि वायु प्रदूषण के लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले लोगों में तमाम तरह की क्रॉनिक बीमारियों का जोखिम अधिक हो सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, प्रदूषित हवा में मौजूद हानिकारक कण (PM2.5) हृदय रोग, फेफड़ों की बीमारी से लेकर कैंसर तक के खतरे को बढ़ाने वाले हो सकते हैं। जहरीली गैसें और धुआं का असर हमारी आंखों की सेहत पर भी देखा जा रहा है। इसके कारण आंखों में जलन, लालिमा, सूजन और सूखापन जैसी समस्याएं पहले की तुलना में काफी बढ़ गई हैं।  

लगातार प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से आंखों की सतह पर मौजूद नमी कम होने लगती है और कॉर्निया पर भी असर पड़ सकता है। यह स्थिति लंबे समय में दृष्टि पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है और गंभीर स्थितियों में अंधेपन का खतरा भी बढ़ा सकती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, बच्चों के लिए यह खतरा और भी ज्यादा है। छोटे बच्चों की आंखें बहुत संवेदनशील होती हैं और प्रदूषण के छोटे-छोटे कण भी उनकी आंखों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। 
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वायु प्रदूषण का सेहत पर असर - फोटो : Freepik.com
वायु प्रदूषण का आंखों पर असर

विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों में एलर्जी से जुड़ी आंखों की बीमारियां जैसे एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस बढ़ते प्रदूषण की बड़ी देन है। वायु प्रदूषण आंखों की प्राकृतिक सुरक्षा को कमजोर कर देता है, इससे इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है।

साफ हवा केवल फेफड़ों के लिए नहीं बल्कि बच्चों की आंखों की रोशनी बचाने के लिए भी जरूरी है। अध्ययन में खुलासा हुआ है कि वायु प्रदूषण बच्चों में निकट दृष्टि दोष (मायोपिया) का बड़ा कारण बन रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण न सिर्फ आंखों में सूजन और तनाव पैदा करता है, बल्कि सूरज की रोशनी के संपर्क को भी कम करता है, जिससे आंख का आकार बदल सकता है और मायोपिया तेजी से बढ़ सकता है।
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मायोपिया का खतरा - फोटो : Freepik.com
मायोपिया की बढ़ रही है समस्या

अध्ययन के अनुसार आज दुनिया में लगभग एक तिहाई बच्चे और किशोर मायोपिया से पीड़ित हैं। इस समस्या में बच्चे दूर की चीजें साफ नहीं देख पाते और उम्र बढ़ने के साथ यह और गंभीर होती जाती है। मायोपिया की गंभीर स्थिति आंखों की रोशनी भी छीन सकती है।

शोधकर्ताओं ने पाया है कि दूषित हवा बच्चों की आंखों के कॉर्निया और आंख के आकार को प्रभावित करती है। जब रोशनी आंख में प्रवेश करती है तो वह रेटिना पर ठीक से केंद्रित नहीं हो पाती, जिसके चलते छवि धुंधली दिखाई देने लगती है।

भारत में भी बच्चों में मायोपिया की समस्या तेजी से बढ़ रही है। एम्स और एलवी प्रसाद आई इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार, शहरी इलाकों में 10 से15 साल के बच्चों में मायोपिया के मामले पिछले एक दशक में दोगुने हो गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदूषण के साथ मोबाइल का अत्यधिक इस्तेमाल भी इस समस्या को बढ़ा रहा है।
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प्रभावित हो रही हैं बच्चों की आंखें - फोटो : Freepik.com
हानिकारक रसायन डालते हैं सीधा असर

पीएनएएस नेक्सस जर्नल में प्रकाशित तियानजिन मेडिकल यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम सहित कई संस्थानों द्वारा किए गए अध्ययन से यह भी पता चला कि वायु प्रदूषण के प्रमुख तत्व नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ2) और महीन कण (पीएम2.5) बच्चों की दृष्टि पर सीधा असर डालते हैं।

ऐसे बच्चे जो साफ हवा वाले क्षेत्रों में रहते हैं, उनकी आंखें बिना चश्मे के भी ज्यादा स्वस्थ पाई गईं। अध्ययन में खासतौर पर छोटे बच्चों पर प्रदूषण के अधिक प्रभाव देखे गए। प्राथमिक स्कूल स्तर के बच्चों की दृष्टि सबसे ज्यादा संवेदनशील पाई गई, जबकि बड़े बच्चों में आनुवंशिकी कारक ज्यादा असर डालते हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि समय रहते कदम उठाए जाएं तो इस समस्या की गंभीरता को रोका जा सकता है।


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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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